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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 267 में से

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३२ शब्द संग्रह
माया कारन स्रम अति करै । सो माया लै गाड़ै नै ॥६॥
अति संचै समझै नहिं मूढ़ । धन धरती तन ह्वै गयो धूड़१॥७
काम क्रोध त्रिसना अति जरै । साधु संगत कबहूँ नहिं करै ॥८
कहत नामदेव ता चीआन², निरभय ह्वै भजिये भगवान ॥९
रैदासजी
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ ६५ संतवानी संग्रह भाग १ ]
॥ चितावनी ॥
कहु मन राम नाम सँभारि ।
माया के भ्रम कहाँ भूल्यो, जाहुगे कर झारि ॥ टेक
देखि धौं इहाँ कौन तेरो, सगा सुत नहिं नारि ।
तोर उतंग सब दूरि करिहैं, देहिंगे तन जारि ॥१॥
प्रान गये कहो कौन तेरा, देखि सोच बिचारि ।
बहुरि येहि कलि काल नाहीं, जीति आवै हारि ॥२॥
यहु माया सब थोथरी रे, भगति दिस प्रतिहारि ।
कह रैदास सत बचन गुरु के, सो जिव तैं न बिसारि ॥३
॥ बिनय ॥
(१)
नरहरि³ चंचल है मति मेरी, कैसे भगति करूँ मैं तेरी ॥ टेक
तूँ मोहिं देखै हौं तोहि देखूँ, प्रीति परसपर होई ।
तूँ मोहिं देखै तोहि न देखूँ, यह मति सब बुधि खोई ॥१॥
सब घट अंतर रमसि निरंतर, मैं देखन नहिं जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, कृत उपकार न माना ॥२॥
मैं तैं तोरि मोरि असमझि सौं, कैसे करि निस्तारा ।
कह रैदास कृष्ण करुनामय, जै जै जगत अधारा ॥३॥
(१) धूल । (२) चिल्ला कर, पुकार कर । (३) नरसिंह ईश्वर का एक अवतार ।