संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
कबीर साहिब १९
बिन जल बूँद परत जहँ झारी, नहिँ मीठा नहिँ खारा ।
सुन्न-महल में नौबत बाजै, किंगरी बीन सितारा ॥२॥
बिन बादर जहँ बिजुरी चमकै, बिन सूरज उँजियारा ।
बिना सीप जहँ मोती उपजै, बिन सुर सबद उचारा ॥३॥
जोति लजाय ब्रह्म जहँ दरसै, आगे अगम- अपारा ।
कह कबीर वहँ रहनि हमारी, बूझै गुरुमुख प्यारा ॥४॥
(३)
रेख़ता
गंग औ जमुन के घाट को खोजि ले,
भँवर गुंजार तहँ करत भाई ।
सरसुती नीर तहँ देखु निर्मल बहै,
तासु के नीर पिये प्यास जाई ॥ १ ॥
पाँच की प्यास तहँ देखि पूरी भई,
तीन की ताप तहँ लगै नाहीं ।
कहै कब्बीर यह अगम का खेल है,
गैब का चाँदना देख माहीं ॥ २ ॥
(४)
रेख़ता
करत कलोल दरियाव के बीच में,
ब्रह्म की छौल मेँ हंस झूलै ।
अर्ध औ उर्ध की पैँग बाढ़ी तहाँ,
पलटि मन पवन को कँवल फूलै ॥ १ ॥
गगन गरजै तहाँ सदा पावस झरै,
होत झनकार नित बजत तूरा ।
बेद कत्तेब की गम्म नाहीं तहाँ,
कहै कब्बीर कोइ रमै सूरा ॥ २ ॥
२० शब्द संग्रह
॥ उपदेश ॥
(१)
छाड़ि दे मन बौरा डगमग ॥ टेक ॥
अब तो जरे मरे बनि आवै, लीन्हो हाथ सिंधोरा :
प्रीत प्रतीत करो दृढ़ गुरु की, सुने सबद् घनघोरा ॥१॥
होइ निसंक मगन ह्वै नाचै, लोभ मोह भ्रम छाड़ै ।
सूरा कहा मरन से डरपै, सती न संचय भाँड़े ॥ २ ॥
लोक लाज कुल की मरजादा, यही गले में फाँसी ।
आगे ह्वै पग पाछे धरिहौ, होय जक्त में हाँसी ॥३॥
अगिन जरे ना सती कहावै, रन जूझै नहिँ सूरा ।
बिरह अगिन अंतर में जारै, तब पावै पद पूरा ॥ ४ ॥
यह संसार सकल जग मैला, नाम गहे तेहि सूचा ।
कहै कबीर भक्ति मत छोड़ो, गिरत परत चढ़ ऊँचा ॥५॥
(२)
अवधू भूले को घर लावै, सो जन हम को भावै ॥टेक॥
घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिँ जावै ।
बन के गये कलपना उपजै, तब धौँ कहाँ समावै ॥१॥
घर में जुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरु अलख लखावै ।
सहज सुन्न में रहै समाना, सहज समाधि लगावै ॥ २ ॥
उनमुनि रहै ब्रह्म को चीन्है, परम तत्त को ध्यावै ।
सुरत निरत से मेला हरिके, अनहद नाद बजावै ॥३॥
घर में बसत बस्तु भी घर है, घर ही बस्तु मिलावै ।
कहै कबीर सुनो हो अवधू, ज्यौँ का त्यौँ ठहरावै ॥४॥
(३)
भजि ले सिरजनहार, सुघर तन पांय के ॥ टेक ॥
काहे रहौ अचेत, कहाँ यह औसर पैहौ ।
फिर नहिँ ऐसी दैह, बहुरि पाछे पछितैहौ ॥
(१) चरतन ।
कबीर साहिब २१
लख चौरासी जोनि मैं, मानुष जन्म अनूप।
ताहि पाय नर चेतत नाहीं, कहा रंक कहा भूप ॥ १ ॥
गर्भ वास मैं रह्यो, कह्यो मैं भजिहौँ तोहीं।
निस दिन सुमिरौँ नाम, कष्ट से काढ़ौ मोहीं ॥
चरनन ध्यान लगाइ के, रहौँ नाम लै लाय।
तनिक न तोहि बिसारिहौँ, यह तन रहै कि जाय ॥ २ ॥
इतना कियो करार, काढ़ि गुरु बाहर कीन्हा।
भूलि गयौ वह बात, भयौ माया आधीना ॥
भूली बातें उद्र की, आन पड़ी सुधि एत।
बारह बरस बीति गे या विधि, खेलत फिरत अचेत ॥३॥
बिषया बान समान, दँह जोवन मद माती।
चलत निहारत छाँह, तमक के बोलत बाती ॥
चोवा चंदन लाइ के, पहिरे बसन रँगाय।
गलियाँ गलियाँ झाँकी मारै, पर तिरिया लख मुसकाय ॥४
तरुनापन गइ बीत, बुढ़ापा आनि तुलाने।
काँपन लागे सीस, चलत दोउ चरन पिराने ॥
नैन नासिका चूवन लागे, मुख तैँ आवत बास।
कफ पित कंठै घेर लियो है, छुटि गइ घर की आस ॥५॥
मातु पिता सुत.नारि, कहौ का के सँग जाई।
तन धन घर औ काम धाम, सबही छुटि जाई ॥
आखिर काल घसीटिहै, पड़िहै। जम के फन्द।
बिन सतगुरु नहिँ बाचिहै।, समुझ देख मति मन्द ॥६॥
सुफल होत यह देंह, नेह सतगुरु से कीजै।
मुक्ती मारग जानि, चरन सतगुरु चित दीजै ॥
नाम गहै। निरभय रहा, तनिक न व्यापै पीर।
यह लीला है मुक्ति की, गावत दास कबीर ॥७॥
(४)
करो जतन सखि साईँ मिलन की ॥ टेक ॥
गुड़िया गुड़वा सूप सुपलिया।
तजि दे बुधि लरिकैयाँ खेलन की ॥१॥
देवता पित्तर भुइयाँ भवानी।
यह मारग चौरासी चलन की ॥२॥
ऊँचा महल अजब रँग बँगला।
साईँ की सेज जहाँ लगी फूलन की ॥३॥
तन मन धन सब अर्पन करि वहाँ।
सुरत सम्हार परु पइयाँ सजन की ॥४॥
कहै कबीर निर्भय होय हंसा।
कुंजी बता द्यौँ ताला खुलन की ॥५॥
(५)
जाग पियारी अब का सोवै।
रैन गई दिन काहे को खोवै ॥१॥
जिन जागा तिन मानिक पाया।
तैँ बौरी सब सोय गँवाया ॥२॥
पिय तेरे चतुर तू मूरख नारी।
कबहुँ न पिय की सेज सँवारी ॥३॥
तैँ बौरी बौरापन कीन्हो।
भर जोबन पिय अपन न चीन्हो ॥४॥
जाग देख पिय सेज न तेरे।
तोहि छाड़ि उठि गये सबेरै ॥५॥
कहै कबीर सोई धन जागे ।
सबद बान उर अन्तर लागै ॥६॥
(६)
अँधियरवा मैं ठाढ़ि गोरी का करलू ॥ टेक ॥
जब लगि तेल दिया मैं बाती, येहि अँजोरवा बिछाय घलतू।
मन का पलँग सँतोष बिछौना, ज्ञान कै तकिया लगाय रखतू
जरि गया तेल बुझाय गइ बाती, सुरत मैं मुरत समाय रखतू
कहै कबीर सुनो भाई साधो, जोतिया मैं जोतिया मिलायरखतू
(७)
उठो सोहंगम नारि, प्रीति पिय से करो ।
यह उरले व्योहार, दूर दुरमति धरो ॥१॥
पाँच चोर बड़ जोर, संगि एते घने ।
इन ठगियन के साथ, मुसै घर निसु दिने ॥२॥
सोवत जागत चोर, करै चोरी घनी ।
आपु भये कुतवाल, भली विधि लूटहीं ॥३॥
द्वादस नगर मँझार, पुरुष इक देखिये ।
सोभा अगम अपार, सुरति छबि पेखिये ॥४॥
होत सबद घनघोर, संख धुनि अति घनी ।
तंतन की झनकार, बजत झीनी झिनी ॥५॥
है कोइ महरम साध, भले पहिचानिये ।
सतगुरु कहै कबीर, संत को बानि ये ॥६॥
(८)
राग जँतसार
सुरति मकरिया गाड़हु हे सजनी-अहे सजनी ।
दूनौँ रे नयनवाँ जोतिया लावहु रे की ॥१॥
२४ • शब्द संग्रह
मन धरू मन धरू मन धरू हे सजनी-अहे सजनी ।
अइसन समइया फिरि नहिँ पावहु रे की ॥२॥
दिन दस रजनी सुख करू हे सजनी-अहे सजनी ।
इक दिन चाँद छपाइल रे की ॥३॥
सँगहिँ अछत पिया भरम भुलइली हे सजनी-अहे सजनी।
मोरे लेखे पिया परदेसहिँ रे की ॥४॥
नव दस नदिया अगम बहे सोतिया हे सजनी-अहे सजनी।
बिचहिँ पुरइनि दह१ लागल रे की ॥५॥
फुल इक फुलले अनुप फुल सजनी-अहे सजनी ।
तेहि फुल भँवरा लुभाइल रे की ॥६॥
सब सखि हिलिमिलि निज घर जाइब हे सजनी-अहे सजनी।
समुँद लहरिया समाइब रे की ॥७॥
दास कबीर यह गवलैँ लगनियाँ हे सजनी-अहे सजनी ।
अब तो पिया घर जाइब रे की ॥८॥
(६)
रेखता
सुख सिंध की सैर का स्वाद तब पाइहै,
चाह का चौतरा भूलि जावै।
बीज के माहिँ ज्यौँ बृच्छ बिस्तार,
यौं चाह के माहिँ सब रोग आवै ॥१॥
दृढ़ बैराग में होय आरूढ़ मन,
चाह के चौतरे आग दीजै।
कहै कबीर यौं होय निरबासना,
तत्त से रत्त है काज कीजै ॥२॥
(१) कोईँ का तलाव ।
कबीर साहित्य २५.
॥ मिश्रित ॥
तन मन धन बाजी लागी हो ॥ टेक ॥
चौपड़ खेलूँ पीव से रे, तन मन बाजी लगाय ।
हारी तो पिय की भई रे, जीती तो पिय मोर हो ॥१॥
चौसरिया के खेल मैं रे, जुग्ग मिलन की आस ।
नर्द अकेली रहि गई रे, नहिं जीवन की आस हो ॥२॥
चार वरन घर एक है रे, भाँति भाँति के लोग ।
मनसा वाचा कर्मना, कोइ प्रीति निबाहै ओर हो ॥३॥
लख चौरासी भरमत भरमत, पौ पै अटकी आय ।
जो अब के पौ ना पड़ी रे, फिर चौरासी जाय हो ॥४॥
कह कबीर धर्मदास से रे, जीती बाजी मत हार ।
अब के सुरत चढ़ाइ दे रे, सोई सुहागिन नारि हो ॥५॥
(२)
या जग अंधा मैं केहि समुझावौं ॥ टेक ॥
इक दुइ होयँ उन्हैं समझावौं ।
सबहि भुलाना पेट के धन्धा, मैं केहि० ॥१॥
पानी कै घोड़ा पवन असवरवा ।
ढरकि परै जस ओस कै बुन्दा, मैं केहि० ॥२॥
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा ।
खेवनहारा पड़िगा फन्दा, मैं केहि० ॥३॥
घर की बस्तु निकट नहिं आवत ।
दियना बारि के ढूँढ़त अंधा, मैं केहि० ॥४॥
लागी आग सकल बन जरिगा ।
बिन गुरज्ञान भटकिगा बन्दा, मैं केहि० ॥५॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो ।
इक दिन जाय लँगौटी झार बन्दा, मैं केहि० ॥६
१२
२६ शब्द संग्रह
(३)
पिया मिलन की आस, रहौँ कब लौं खड़ी।
ऊँचे चढ़ि नहिं जाय, मनैं लज्जा भरी ॥ १ ॥
पाँव नहीं ठहराय, चढ़ूँ गिरि गिरि पड़ूँ ।
फिरि फिरि चढ़हूँ सम्हारि, तो पग आगे धरूँ ॥ २ ॥
अंग अंग थहराय, तो बहु बिधि डरि रहूँ ।
कर्म कपट मग घेरि, तो भ्रम मैं भुलि रहूँ ॥ ३ ॥
निपट अनारी बादि, तो झीनी गैल ।
अटपट चाल तुम्हारि, मिलन कस होइ है ॥४॥
तेजो१ कुमति बिकार, सुमति गहि लीजिये ।
सतगुरु सबद सम्हारि, चरन चित दीजिये ॥ ५ ॥
अंतर पट दे खोलि, सबद उर लाव री ।
दिल बिच दास कबीर, मिलैं तोहि बावरी ॥६॥
(४)
ऐसा है रे भाई हरि रस ऐसा है रे भाई, जा के पिये अमर ह्वै जाई ॥ १
ध्रुव पीया प्रहलादहु पीया, पीया मीराबाई ।
बलख बुखारे के मीयाँ पीया, छोड़ी है बादसाही ॥२॥
हरि रस महँगा मोल का रे, पीयै बिरला कोय ।
हरि रस महँगा सो पियै, जा के घर पै सीस न होय ॥३॥
आगे आगे दौं जलै रे, पीछे हरिया होय ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, हरि भज निर्मल होय ॥४॥
(५)
जहँ सतगुरु खेलत ऋतु बसंत । परम जोत जहँ साध संत ॥१
तीन लोक से भिन्न राज । जहँ अनहद बाजा बजै बाज ॥२
चहुँ दिसि जोति की बहै धार । बिरला जन कोइ उतरै पार ॥३
(१) तजो ।
कबीर साहिब २७
कोटि कृस्न जहँ जोरैँ हाथ। कोटि विस्नु जहँ नवैँ माथ॥४
कोटिन ब्रह्मा पढ़ें पुरान। कोटि महेस जहँ धरैँ ध्यान ॥५
कोटि सरस्वति धारैँ राग। कोटि इन्द्र जहँ गगन लाग ॥६
सुर गन्ध्र्व मुनि गने न जायँ। जहँ साहिब प्रगटे आप आय ७
चोवा चंदन औ अबीर। पुहुप बास रस रह्यो गँभीर ॥८
सिरजत हिये निवास लीन्ह। सो यहि लोक से रहत भिन्न॥९
जब बसंत गहि राग लीन्ह। सतगुरु सबद उच्चार कीन्ह॥१०
कह कबीर मन हृदय लाय। नरक-उधारन नाम आहि ॥११
(६)
रेख़ता
सूरे संग्राम को देखि भागै नहीं,
देखि भागै सोई सूर नाहीं।
काम औ क्रोध मद लोभ से जूझना,
मँडा घमसान तहँ खेत माहीं॥
सील औ सच संतोष साही भये,
नाम समसेर तहँ खूब बाजै।
कहै कब्बीर कोइ जूझिहै सूरमा,
कायराँ भीड़ तहँ तुरत भाजै ॥
(७)
रेख़ता
बिना वैराग कहु ज्ञान केहि काम का,
पुरुष बिनु नारि नहिँ सोभ पावै।
स्वाँग तो साहु का काम है चोर का,
कपट की झपट मैं बहुत धावै ॥
बात बहुते कहै झूठ छूटै नहीं,
मुख के कहे कहा खाँड़ खावै।
२८ शब्द संग्रह
कहै कबीर जब काल गढ़ घेरिहै,
बात बहु बकै सब भूलि जावै ॥
पीपाजी
जीवन समय—पंद्रहवाँ शतक। जनम स्थान—गागरौनगढ़। आश्रम—भेष।
गुरू—स्वामी रामानंद।
यह गागरौनगढ़ के राजा और आदि में दुर्गा उपासक थे फिर स्वामी
रामानंद के चेले हुए और राजपाट छोड़ कर साधु भेष में अपनी छोटी रानी
सीता सहित गुरू के साथ द्वारिका गये। भक्तमाल की कथा के अनुसार कृष्ण
का साक्षात दर्शन पाने की अभिलाषा में पीपाजी समुद्र में कूद पड़े और सात
दिन तक भगवत चरणों मे रहकर बाहर निकले और वहाँ से जो छाप लाये थे
वह यह कह कर पुजारियों के सुपुर्द की कि जो इस छाप को लगावैगा उसे
भगवान मिलेंगे। द्वारिका से लौटने हुए रास्ते में पठानों ने पीपाजी की स्त्री
को सुंदर देख कर छीन लेना चाहा परंतु भगवान ने आप रक्षा की।
॥ घट मठ ॥
काया देवा काया देवल, काया जंगम जाती।
काया धूप दीप नैवेदा, काया पूजौँ पाती ॥ १ ॥
काया बहु खंड खोजते, नव निधी पाई।
ना कछु आइबो ना कछु जाइबो, राम की दुहाई ॥२॥
जो ब्रह्मंडे सोई पिंडे, जो खोजै सो पावै।
पीपा प्रनवै परम तत्त्व ही, सतगुरु होय लखावै ॥ ३ ॥
नामदेवजी
जीवन समय—पंद्रहवें शतक का दूसरा हिस्सा। कविता काल—१४८०।
जन्म और सतसंग स्थान—पांडरपुर। जाति और आश्रम—छीपी, गृहस्थ।
गुरू—ज्ञानदेवजी।
भक्तमाल में इन का जन्म एक बाल-विधवा के गर्भ से बिना पुरुष प्रसंग
के ईश्वरेच्छा से होना लिखा है जैसा कि हज़रत ईसा का क्वारी कन्या के उदर
से हुआ था। इन की प्रचंड भक्ति और बाल अवस्था ही से दृढ़ विश्वास की
नामदेवजी २६
बहुत सी कथाओं में तीन दिन उपास करके ठाकुर जी को दूध पिलाने की
कथा प्रसिद्ध है।
॥ नाम महिमा ॥
तत्त गहन को नाम है, भजि लीजे सोई।
लीला सिंध अगाध है, गति लखै न कोई ॥ १ ॥
कंचन मेरु सुमेरु, हय गज¹ दीजै दाना।
कोटि गऊ जो दान दे, नहिँ नाम समाना ॥ २ ॥
जोग जग्य तैँ कहा सरै, तीरथ व्रत दाना।
ओसै प्यास न भागिहै, भजिये भगवाना ॥ ३ ॥
पूजा करि साधू जनहिँ, हरि को पन धारी।
उन तैँ गोविंद पाइये, बे परउपकारी ॥ ४ ॥
एकै मन एकै दसा, एकै व्रत धरिये।
नामदेव नाम जहाज है, भवसागर तरिये ॥ ५ ॥
॥ समरथ ॥
बदौ क्यौँ ना होड़² माधो मो सैँ।
ठाकुर तैँ जन जन तैँ ठाकुर, खेल पर्यो है तो सैँ ॥१॥
आपन देव देहरा आपन, आप लगावै पूजा।
जल तैँ तरंग तरंग तैँ है जल, कहनसुनन को दूजा ॥२॥
आपहिँ गावै आपहिँ नाचै, आप बजावै तूरा।
कहत नामदेव तूँ मेरो ठाकुर, जन ऊरा³ तूँ पूरा ॥३॥
॥ लव ॥
अस मन लाव रामरसना। तेरा बहुरिन होइ जरा मरना॥१
जैसे मृगा नाद लव लावै। बान लगे वहि ध्यान लगावै ॥२
जैसे कीट भृंग मन दीन्ह। आपु सरीखे वा को कीन्ह ॥३॥
नामदेव भन⁴ दासनदास। अब न तजौँ हरिचरन निवास॥४
(१) घोड़ा और हाथी। (२) शर्त। (३) अधूरा। (४) कहता है।
३० शब्द संग्रह
॥ विरह ॥
होली
मोर पिया बिलम्यो परदेस, होरी मैं का सौँ खेलौँ ।
घरी पहर मोहिँ कल न परतु है, कहत न कोउ उपदेस ॥१॥
सूख्यो पात बन फूलन लाग्यो, मधुकर करत गुँजार ।
हाहा करौँ कंत घर नाहीँ, के मोरि सुनै पुकार ॥ २ ॥
जा दिन तैँ पिय गवन कियो है, सिंदुरा न पहिरौँ मंग१।
पान फुलेल सबै सुख त्याग्यो, तेल न लावौँ अंग ॥ ३ ॥
निसु बासर मोहिँ नींद न आवै, नैन रहे भरपूर ।
अति दारुन मोहिँ सवति सतावै, पिय मारग बड़ि दूर ॥४॥
दामिनि दमकि घटा घहरानी, बिरह उठै घनघोर ।
चित चातक ह्वै दादुर बोलै, वहि बन बोलत मोर ॥ ५ ॥
प्रीतम को पतियाँ लिखि भेजौँ, प्रेम प्रीति मसि२ लाय ।
बेगि मिलो जन नामदेव को, जनम अकारथ जाय ॥६॥
॥ प्रेम ॥
माई रे इन नैनन हरि पेखो ।
हरि की भक्ति साधु की संगति, सोई यह दिल लेखो ॥१॥
चरन सोई जो नचत प्रेम से, कर सोई जो पूजा ।
सीस सोई जो नवै साधु को, रसना और न दूजा ॥२॥
यह संसार हाट को लेखा, सब कोउ बनिजहिँ आया ।
जिन जस लादा तिन तस पाया, मूरख मूल गँवाया ॥३॥
आतम राम दहँ घरि आयो, ता मैं हरि को देखो ।
कहत नामदेव बलि बलि जैहौँ, हरि भजि और न लेखो ॥४॥
(१) माँग में । (२) सियाही ।
नामदेवजी ३१
॥ भेद ॥
एक अनेक बियापक पूरक, जित देखौँ तित सोई ।
माया चित्र विचित्र बिमोहत, बिरला बूझै कोई ॥१॥
सब गोबिंद है सब गोबिंद है, गोबिंद बिन नहिँ कोई ।
सूत एक मनि सत्तसहस जस, ओत पोत प्रभु सोई ॥२॥
जल-तरंग अरु फेन बुदबुदा, जल तैँ भिन्न न होई ।
यह प्रपंच परब्रह्म की लीला, बिचरत आन न होई ॥३॥
मिथ्या भ्रम अरु स्वपन मनोरथ, सत्य पदारथ जाना ।
सुकिरत मनसा गुरु उपदेसी, जागत ही मन माना ॥४॥
कहत नामदेव हरि की रचना, देखो हृदय बिचारी ।
घट घट अंतर सर्व निरंतर, केवल एक मुरारी ॥५॥
॥ उपदेश ॥
(१)
परधन परदारा परिहरी१। ता के निकट बसहि नरहरी२ १
जो न भजंते नारायना । तिन का मैं न करौँ दर्सना ॥२॥
जिन के भीतर है अन्तरा । जैसे पसु तैसे वह नरा ॥३॥
प्रनवत नामदेव नाकहिँ बिना। ना सोहै बत्तीस लच्छना३॥४
(२)
काहे मन बिपना बन जाय । भूलो रे ठगमूरी४ खाय ॥१
जैसे मीन पानी मैं रहै। काल जाल की सुधि नहिँ लहै ॥२
जिभ्या स्वादी लीलत लोह। ऐसे कनिक कामिनी मोह ॥३॥
ज्यौँ मधुमाखी संचि अपार। मधु५ लीन्हो मुख दीन्हो छार४
गऊं बाछ को संचै छीर। गला बाँधि दुहि लेहि अहीर ॥५॥
(१) त्याग करै । (२) नरसिंह अर्थात ईश्वर । (३) आभरन, भूषन । (४) ठगाई,
धोखा । (५) मधुआ चिड़िया जो मधुमक्खी के बटोरे हुए शहद को खा जाती है ।
३२ शब्द संग्रह
माया कारन स्रम अति करै । सो माया लै गाड़ै नै ॥६॥
अति संचै समझै नहिं मूढ़ । धन धरती तन ह्वै गयो धूड़१॥७
काम क्रोध त्रिसना अति जरै । साधु संगत कबहूँ नहिं करै ॥८
कहत नामदेव ता चीआन², निरभय ह्वै भजिये भगवान ॥९
रैदासजी
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ ६५ संतवानी संग्रह भाग १ ]
॥ चितावनी ॥
कहु मन राम नाम सँभारि ।
माया के भ्रम कहाँ भूल्यो, जाहुगे कर झारि ॥ टेक
देखि धौं इहाँ कौन तेरो, सगा सुत नहिं नारि ।
तोर उतंग सब दूरि करिहैं, देहिंगे तन जारि ॥१॥
प्रान गये कहो कौन तेरा, देखि सोच बिचारि ।
बहुरि येहि कलि काल नाहीं, जीति आवै हारि ॥२॥
यहु माया सब थोथरी रे, भगति दिस प्रतिहारि ।
कह रैदास सत बचन गुरु के, सो जिव तैं न बिसारि ॥३
॥ बिनय ॥
(१)
नरहरि³ चंचल है मति मेरी, कैसे भगति करूँ मैं तेरी ॥ टेक
तूँ मोहिं देखै हौं तोहि देखूँ, प्रीति परसपर होई ।
तूँ मोहिं देखै तोहि न देखूँ, यह मति सब बुधि खोई ॥१॥
सब घट अंतर रमसि निरंतर, मैं देखन नहिं जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, कृत उपकार न माना ॥२॥
मैं तैं तोरि मोरि असमझि सौं, कैसे करि निस्तारा ।
कह रैदास कृष्ण करुनामय, जै जै जगत अधारा ॥३॥
(१) धूल । (२) चिल्ला कर, पुकार कर । (३) नरसिंह ईश्वर का एक अवतार ।
रैदासजी ३३
(२)
रामा हो जग-जीवन मोरा ।
तूँ न बिसारी मैं जन तोरा ॥ टेक ॥
संकट सोच पोच दिन राती ।
करम कठिन मोरि जाति कुजाती ॥१॥
हरहु विपति भावै करहु सो भाव ।
चरन न छाड़ौँ जाव सो जाव ॥२॥
कह रैदास कछु देहु अवलंबन ।
बेगि मिलौ जनि करौ विलंबन ॥३॥
॥ प्रेम ॥
(१)
देहु कलाली एक पियाला, ऐसा अवधू है मतवाला ॥ टेक
हे हे कलाली तैं क्या किया, सिरका सातैँ प्याला दिया ॥१
कहै कलाली प्याला देऊँ, पीवनहारे का सिर लेऊँ ॥२॥
चंद सूर दोउ सनमुख होई, पीवै प्याला मरै न कोई ॥३॥
सहज सुन्न मैं भाठी सरवै, पीवै रैदास गुरुमुख दरवै ॥४॥
(२)
जौ तुम तोरौ राम मैं नहिँ तोरूँ ।
तुम सौँ तोरि कवन सौँ जोरूँ ॥ टेक ॥
तीरथ बरत न करूँ अँदेसा ।
तुम्हरे चरन कमल क भरोसा ॥१॥
जहँ जहँ जाउँ तुम्हरी पूजा ।
तुम सा देव और नहिँ दूजा ॥२॥
मैं अपनो मन हरि सौँ जोर्यौँ ।
हरि सौँ जोरि सबन से तोर्यौँ ॥३॥
सबही पहर तुम्हारी आसा ।
मन क्रम बचन कहै रैदासा ॥४॥
५
३४ शब्द संग्रह
(३)
अब कैसे छुटै नाम रट लागी ॥ टेक ॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी ।
जा की अँग अँग बास समानी ॥१॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा ।
जैसे चितवत चंद चकोरा ॥२॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती ।
जा की जोति बरै दिन राती ॥३॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा ।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ॥४॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा ।
ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥५॥
(४)
साची प्रीति हम तुम सँग जोड़ी। तुम सँग जोड़ि अवर सँग तोड़ी १
जौ तुम बादर तो हम मोरा। जौ तुम चंद हम भये चकोरा २
जौ तुम दीवा तो हम बाती। जौ तुम तीरथ तो हम जात्री ३
जहाँ जाउँ तहँ तुम्हरी सेवा । तुम सा ठाकुर और न देवा ४
तुम्हरे भजन कटे भव फाँसा। भक्ति हेतु गावै रैदासा ॥५॥
॥ साधु ॥
आज दिवस¹ लेऊँ बलिहारा ।
मेरे गृह आया राम का प्यारा ॥ टेक ॥
आँगन बँगला भवन भयो पावन ।
हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥ १ ॥
करूँ डंडवत चरन पखारूँ ।
तन मन धन उन ऊपरि वारूँ ॥ २ ॥
(१) दिन ।
रैदासजी ३५
कथा कहैं अरु अर्थ बिचारैं ।
आप तरैं औरन को तारैं ॥ ३ ॥
कह रैदास मिलैं निज दास ।
जनम जनम कै काटैं पास१ ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
परिचै राम रमै जो कोई। या रस परसे दुबिधि न होई ॥टेक
जे दीसे ते सकल बिनास । अनदीठे नाहीं बिसवास ॥१॥
बरन कहंत कहैं जे राम । सो भगता केवल निःकाम ॥२॥
फल कारन फूलै बनराई। उपजै फल तब पुहुप बिलाई ॥३
ज्ञानहिं कारन करम कराई। उपजै ज्ञान तो करम नसाई॥४
बट क बीज जैसा आकार । पसरयो तीन लोक पासार ॥५
जहाँ क उपजा तहाँ बिलाइ । सहज सुन्नि मैं रह्यो लुकाइ ६
जे मन बिंदै सोई बिंद । अमा२ समय ज्यौं दीसै चंद ॥७॥
जल मैं जैसे तूंबा तिरै । परिचै३ पिंड जीव नहिं मरै ॥८
सो मन कौन जो मन को खाइ। बिन छोरे तिरलोक समाइ ९
मन की महिमा सब कोइ कहै । पंडित सो जो अनतै रहै १०
कहरैदासयहपरमबैराग। रामनाम किन४ जपहु सभाग ११
घृत कारन दधि मथैं सयान। जीवन मुक्ति सदा निरबान ॥१२
(१) फाँसी । (२) अमावस । (३) परिचय हो जाने से पिंड का भेद जान ले
तो जीवन मुक्ति हो जाय । (४) क्यों न ।
सदनाजी
जीवन समय-पंद्रहवें शतक का पिछला हिस्सा। जाति और आश्रम—
कसाई, भेष।
यह यद्यपि जाति के कसाई थे। परंतु जीवहिंसा नहीं करते थे माँस इकट्ठा
मोल लेकर फुटकल बेचते थे, बटखरे की जगह शालग्राम की एक बटिया थी
उसी से तौला करते थे चाहे कोई पावभर ले चाहे पाँच सेर। एक दिन एक
वैष्णव ने उस बटिया में शालग्राम के पूरे आकार देखकर उन से माँगा उन्होंने
तुरंत देदिया। वैष्णव ने उसे घर पर लाकर और पंचामृत से स्नान करा कर
सिंहासन पर विराजमान किया और उत्तम भोग आगे घरे पर रात को उसे स्वप्न
हुआ कि हमें तू हमारे उसी परम भक्त के घर पहुँचादे जहाँ तराजू पर बैठ
कर हम को पालना भूलने का आनंद आता है। वैष्णव ने सदनाजी को सब हाल
आ सुनाया और बटिया लौटादी। सदनाजी ने उसी दिन से बैराग ले लिया
और उस बटिया को सिर पर धर कर जगन्नाथपुरी को चले गये। रास्ते में
एक स्त्री के मोहित होने और इन के साथ भाग निकलने के अभिप्राय से अपने
पति का सिर काट डालने और फिर सदनाजी के इनकार पर हाकिम के सामने
उन पर अपने पति के घात का झूठा दोष लगाने और सदनाजी के उस दोष को
स्वीकार कर लेने पर उनके दोनों हाथों के काटे जाने और जगन्नाथजी के
सम्मुख होते ही हाथ ज्यों के त्यों निकल आने की कथा भक्तमाल में लिखी है।
॥ विनय ॥
नृप कन्या के कारने, एक भयो भेष धारी।
कामारथी सुवारथी, वा की पैज¹ सँवारी ॥ १ ॥
तब गुन कहा जगत-गुरा, जो कर्म न नासै।
सिंह सरन कत जाइये, जो जंबुक² ग्रासै ॥ २ ॥
एक बूँद जल कारने, चातक दुख पावै।
प्रान गये सागर मिलै, पुनि काम न आवै ॥ ३ ॥
प्रान जो थाके थिर नहीं, कैसे बिरमावै।
बूड़ि मुए नौका मिलै, कहु काहि चढ़ावै ॥ ४ ॥
मैं नाहीं कछु हौँ नहीं, कछु आहि न मोरा।
औसर लज्जा राख लेहु, सदना जन तोरा ॥ ५ ॥
(१) प्रण। (२) स्यार।
धनी धर्म्मदास
जीवन समय—पंद्रहवेँ शतक के आख़िर हिस्से और सोलहवेँ शतक के
दर्मियान । जन्म स्थान—बांधोगढ़ । सतसंग स्थान—काशी । जाति और
आश्रम—कसौंधन बनिया, गृहस्थ । गुरू—कबीर साहिब ।
यह बड़े साहूकार थे पर कबीर साहिब की शरण मेँ आने के पीछे यह काशी
ही मेँ उन के चरनों मेँ रहे और उन के गुप्त होने पर उन की गद्दी पर बैठे । यह
और इन के बड़े बेटे चूड़ामणि जी दोनों प्रचंड भक्त हुए और पूरी संत गति को
प्राप्त हुए ।
॥ गुरुदेव ॥
(१)
बाजा बाजा रहित¹ का, पड़ा नगर मैं सोर ।
(मेरे) सतगुरु संत कबीर हैं, नजर न आवै और ॥१॥
भूमी पर पग धरत हैं, सुनौ संत मतधीर ।
माथ नाय बिनती करौं, दरसन देव कबीर ॥२॥
घाट बाट औघट महीं, मोहिं कबीर की आस ।
धर्मनि सुमिरै नाम गुरु, कभी न होय बिनास ॥३॥
(२)
गुरु मिले अगम के बासी ॥ टेक ॥
उनके चरन कमल चित दीजे, सतगुरु मिले अबिनासी १॥
उनकी सीत प्रसादी लीजे, छूटि जाय चौरासी ॥२॥
अमृत बुंद झरै घट भीतर, साध संत जन लासी² ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सार सबद मन बासी ॥४॥
॥ नाम महिमा ॥
हम सत्त नाम के बैपारी ॥ टेक ॥
कोइ कोइ लादै काँसा पीतल, कोइ कोइ लौंग सुपारी ।
हम तो लाद्यो नाम धनी को, पूरन खेप हमारी ॥१॥
(१) मुक्ति, उद्धार । (२) चाशनी ।
३८ धनी धर्म्मदास
पूँजी न टूटै नफा चौगुना, बनिज किया हम भारी ।
हाट जगाती रोक न सकिहै, निर्भय गैल हमारी ॥२॥
मोति बुंद घट ही मैं उपजै, सुकिरत अरत कोठारी१ ।
नाम पदारथ लाद चला है, धर्मदास वैपारी ॥३॥
॥ चितावनी ॥
(१)
सोहर
कहँवाँ से जिव आइल, कहँवाँ समाइल हो ।
कहँवाँ कइल मुकाम, कहाँ लपटाइल हो ॥ १ ॥
निरगुन से जिव आइल, सगुन समाइल हो ।
काया गढ़ कइल मुकाम, माया लपटाइल हो ॥ २ ॥
एक बुंद से काया महल, उठावल हो ।
बुंद परे गलि जाय, पाछे पछितावल हो ॥ ३ ॥
हंस कहै आई सरवर, हम उड़ि जाइब हो ।
मोर तोर इतन दिदार, बहुरि नहिँ पाइब हो ॥ ४ ॥
(२)
कहो केते दिन जियबौ हो, का करत गुमान ॥ टेक ॥
कच्चे बासन का पिंजरा हो, जा मैं पवन समान ।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन मैं उड़ि जान ॥१॥
कच्ची माटी कै घडुवा हो, रस बूँदन सान ।
पानी बीच बतासा हो, छिन मैं गलि जान ॥२॥
कागद की नइया बनी, डोरी साहिब हाथ ।
जौने नाच नचैहैं हो, नाचब वोहि नाच ॥३॥
धरमदास इक बनिया हो, करै झूठी बजार ।
साहिब कबीर बनिजारा हो, करैं सत बैपार ॥४॥
(१) भंडार ।