संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ • शब्द संग्रह
मन धरू मन धरू मन धरू हे सजनी-अहे सजनी ।
अइसन समइया फिरि नहिँ पावहु रे की ॥२॥
दिन दस रजनी सुख करू हे सजनी-अहे सजनी ।
इक दिन चाँद छपाइल रे की ॥३॥
सँगहिँ अछत पिया भरम भुलइली हे सजनी-अहे सजनी।
मोरे लेखे पिया परदेसहिँ रे की ॥४॥
नव दस नदिया अगम बहे सोतिया हे सजनी-अहे सजनी।
बिचहिँ पुरइनि दह१ लागल रे की ॥५॥
फुल इक फुलले अनुप फुल सजनी-अहे सजनी ।
तेहि फुल भँवरा लुभाइल रे की ॥६॥
सब सखि हिलिमिलि निज घर जाइब हे सजनी-अहे सजनी।
समुँद लहरिया समाइब रे की ॥७॥
दास कबीर यह गवलैँ लगनियाँ हे सजनी-अहे सजनी ।
अब तो पिया घर जाइब रे की ॥८॥
(६)
रेखता
सुख सिंध की सैर का स्वाद तब पाइहै,
चाह का चौतरा भूलि जावै।
बीज के माहिँ ज्यौँ बृच्छ बिस्तार,
यौं चाह के माहिँ सब रोग आवै ॥१॥
दृढ़ बैराग में होय आरूढ़ मन,
चाह के चौतरे आग दीजै।
कहै कबीर यौं होय निरबासना,
तत्त से रत्त है काज कीजै ॥२॥
(१) कोईँ का तलाव ।