संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहित्य २५.
॥ मिश्रित ॥
तन मन धन बाजी लागी हो ॥ टेक ॥
चौपड़ खेलूँ पीव से रे, तन मन बाजी लगाय ।
हारी तो पिय की भई रे, जीती तो पिय मोर हो ॥१॥
चौसरिया के खेल मैं रे, जुग्ग मिलन की आस ।
नर्द अकेली रहि गई रे, नहिं जीवन की आस हो ॥२॥
चार वरन घर एक है रे, भाँति भाँति के लोग ।
मनसा वाचा कर्मना, कोइ प्रीति निबाहै ओर हो ॥३॥
लख चौरासी भरमत भरमत, पौ पै अटकी आय ।
जो अब के पौ ना पड़ी रे, फिर चौरासी जाय हो ॥४॥
कह कबीर धर्मदास से रे, जीती बाजी मत हार ।
अब के सुरत चढ़ाइ दे रे, सोई सुहागिन नारि हो ॥५॥
(२)
या जग अंधा मैं केहि समुझावौं ॥ टेक ॥
इक दुइ होयँ उन्हैं समझावौं ।
सबहि भुलाना पेट के धन्धा, मैं केहि० ॥१॥
पानी कै घोड़ा पवन असवरवा ।
ढरकि परै जस ओस कै बुन्दा, मैं केहि० ॥२॥
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा ।
खेवनहारा पड़िगा फन्दा, मैं केहि० ॥३॥
घर की बस्तु निकट नहिं आवत ।
दियना बारि के ढूँढ़त अंधा, मैं केहि० ॥४॥
लागी आग सकल बन जरिगा ।
बिन गुरज्ञान भटकिगा बन्दा, मैं केहि० ॥५॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो ।
इक दिन जाय लँगौटी झार बन्दा, मैं केहि० ॥६
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