संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहिब २१
लख चौरासी जोनि मैं, मानुष जन्म अनूप।
ताहि पाय नर चेतत नाहीं, कहा रंक कहा भूप ॥ १ ॥
गर्भ वास मैं रह्यो, कह्यो मैं भजिहौँ तोहीं।
निस दिन सुमिरौँ नाम, कष्ट से काढ़ौ मोहीं ॥
चरनन ध्यान लगाइ के, रहौँ नाम लै लाय।
तनिक न तोहि बिसारिहौँ, यह तन रहै कि जाय ॥ २ ॥
इतना कियो करार, काढ़ि गुरु बाहर कीन्हा।
भूलि गयौ वह बात, भयौ माया आधीना ॥
भूली बातें उद्र की, आन पड़ी सुधि एत।
बारह बरस बीति गे या विधि, खेलत फिरत अचेत ॥३॥
बिषया बान समान, दँह जोवन मद माती।
चलत निहारत छाँह, तमक के बोलत बाती ॥
चोवा चंदन लाइ के, पहिरे बसन रँगाय।
गलियाँ गलियाँ झाँकी मारै, पर तिरिया लख मुसकाय ॥४
तरुनापन गइ बीत, बुढ़ापा आनि तुलाने।
काँपन लागे सीस, चलत दोउ चरन पिराने ॥
नैन नासिका चूवन लागे, मुख तैँ आवत बास।
कफ पित कंठै घेर लियो है, छुटि गइ घर की आस ॥५॥
मातु पिता सुत.नारि, कहौ का के सँग जाई।
तन धन घर औ काम धाम, सबही छुटि जाई ॥
आखिर काल घसीटिहै, पड़िहै। जम के फन्द।
बिन सतगुरु नहिँ बाचिहै।, समुझ देख मति मन्द ॥६॥
सुफल होत यह देंह, नेह सतगुरु से कीजै।
मुक्ती मारग जानि, चरन सतगुरु चित दीजै ॥