संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० शब्द संग्रह
॥ विरह ॥
होली
मोर पिया बिलम्यो परदेस, होरी मैं का सौँ खेलौँ ।
घरी पहर मोहिँ कल न परतु है, कहत न कोउ उपदेस ॥१॥
सूख्यो पात बन फूलन लाग्यो, मधुकर करत गुँजार ।
हाहा करौँ कंत घर नाहीँ, के मोरि सुनै पुकार ॥ २ ॥
जा दिन तैँ पिय गवन कियो है, सिंदुरा न पहिरौँ मंग१।
पान फुलेल सबै सुख त्याग्यो, तेल न लावौँ अंग ॥ ३ ॥
निसु बासर मोहिँ नींद न आवै, नैन रहे भरपूर ।
अति दारुन मोहिँ सवति सतावै, पिय मारग बड़ि दूर ॥४॥
दामिनि दमकि घटा घहरानी, बिरह उठै घनघोर ।
चित चातक ह्वै दादुर बोलै, वहि बन बोलत मोर ॥ ५ ॥
प्रीतम को पतियाँ लिखि भेजौँ, प्रेम प्रीति मसि२ लाय ।
बेगि मिलो जन नामदेव को, जनम अकारथ जाय ॥६॥
॥ प्रेम ॥
माई रे इन नैनन हरि पेखो ।
हरि की भक्ति साधु की संगति, सोई यह दिल लेखो ॥१॥
चरन सोई जो नचत प्रेम से, कर सोई जो पूजा ।
सीस सोई जो नवै साधु को, रसना और न दूजा ॥२॥
यह संसार हाट को लेखा, सब कोउ बनिजहिँ आया ।
जिन जस लादा तिन तस पाया, मूरख मूल गँवाया ॥३॥
आतम राम दहँ घरि आयो, ता मैं हरि को देखो ।
कहत नामदेव बलि बलि जैहौँ, हरि भजि और न लेखो ॥४॥
(१) माँग में । (२) सियाही ।