संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहै कबीर सोई धन जागे ।
सबद बान उर अन्तर लागै ॥६॥
(६)
अँधियरवा मैं ठाढ़ि गोरी का करलू ॥ टेक ॥
जब लगि तेल दिया मैं बाती, येहि अँजोरवा बिछाय घलतू।
मन का पलँग सँतोष बिछौना, ज्ञान कै तकिया लगाय रखतू
जरि गया तेल बुझाय गइ बाती, सुरत मैं मुरत समाय रखतू
कहै कबीर सुनो भाई साधो, जोतिया मैं जोतिया मिलायरखतू
(७)
उठो सोहंगम नारि, प्रीति पिय से करो ।
यह उरले व्योहार, दूर दुरमति धरो ॥१॥
पाँच चोर बड़ जोर, संगि एते घने ।
इन ठगियन के साथ, मुसै घर निसु दिने ॥२॥
सोवत जागत चोर, करै चोरी घनी ।
आपु भये कुतवाल, भली विधि लूटहीं ॥३॥
द्वादस नगर मँझार, पुरुष इक देखिये ।
सोभा अगम अपार, सुरति छबि पेखिये ॥४॥
होत सबद घनघोर, संख धुनि अति घनी ।
तंतन की झनकार, बजत झीनी झिनी ॥५॥
है कोइ महरम साध, भले पहिचानिये ।
सतगुरु कहै कबीर, संत को बानि ये ॥६॥
(८)
राग जँतसार
सुरति मकरिया गाड़हु हे सजनी-अहे सजनी ।
दूनौँ रे नयनवाँ जोतिया लावहु रे की ॥१॥