संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें२० शब्द संग्रह
॥ उपदेश ॥
(१)
छाड़ि दे मन बौरा डगमग ॥ टेक ॥
अब तो जरे मरे बनि आवै, लीन्हो हाथ सिंधोरा :
प्रीत प्रतीत करो दृढ़ गुरु की, सुने सबद् घनघोरा ॥१॥
होइ निसंक मगन ह्वै नाचै, लोभ मोह भ्रम छाड़ै ।
सूरा कहा मरन से डरपै, सती न संचय भाँड़े ॥ २ ॥
लोक लाज कुल की मरजादा, यही गले में फाँसी ।
आगे ह्वै पग पाछे धरिहौ, होय जक्त में हाँसी ॥३॥
अगिन जरे ना सती कहावै, रन जूझै नहिँ सूरा ।
बिरह अगिन अंतर में जारै, तब पावै पद पूरा ॥ ४ ॥
यह संसार सकल जग मैला, नाम गहे तेहि सूचा ।
कहै कबीर भक्ति मत छोड़ो, गिरत परत चढ़ ऊँचा ॥५॥
(२)
अवधू भूले को घर लावै, सो जन हम को भावै ॥टेक॥
घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिँ जावै ।
बन के गये कलपना उपजै, तब धौँ कहाँ समावै ॥१॥
घर में जुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरु अलख लखावै ।
सहज सुन्न में रहै समाना, सहज समाधि लगावै ॥ २ ॥
उनमुनि रहै ब्रह्म को चीन्है, परम तत्त को ध्यावै ।
सुरत निरत से मेला हरिके, अनहद नाद बजावै ॥३॥
घर में बसत बस्तु भी घर है, घर ही बस्तु मिलावै ।
कहै कबीर सुनो हो अवधू, ज्यौँ का त्यौँ ठहरावै ॥४॥
(३)
भजि ले सिरजनहार, सुघर तन पांय के ॥ टेक ॥
काहे रहौ अचेत, कहाँ यह औसर पैहौ ।
फिर नहिँ ऐसी दैह, बहुरि पाछे पछितैहौ ॥
(१) चरतन ।