संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ शब्द संग्रह
(३)
पिया मिलन की आस, रहौँ कब लौं खड़ी।
ऊँचे चढ़ि नहिं जाय, मनैं लज्जा भरी ॥ १ ॥
पाँव नहीं ठहराय, चढ़ूँ गिरि गिरि पड़ूँ ।
फिरि फिरि चढ़हूँ सम्हारि, तो पग आगे धरूँ ॥ २ ॥
अंग अंग थहराय, तो बहु बिधि डरि रहूँ ।
कर्म कपट मग घेरि, तो भ्रम मैं भुलि रहूँ ॥ ३ ॥
निपट अनारी बादि, तो झीनी गैल ।
अटपट चाल तुम्हारि, मिलन कस होइ है ॥४॥
तेजो१ कुमति बिकार, सुमति गहि लीजिये ।
सतगुरु सबद सम्हारि, चरन चित दीजिये ॥ ५ ॥
अंतर पट दे खोलि, सबद उर लाव री ।
दिल बिच दास कबीर, मिलैं तोहि बावरी ॥६॥
(४)
ऐसा है रे भाई हरि रस ऐसा है रे भाई, जा के पिये अमर ह्वै जाई ॥ १
ध्रुव पीया प्रहलादहु पीया, पीया मीराबाई ।
बलख बुखारे के मीयाँ पीया, छोड़ी है बादसाही ॥२॥
हरि रस महँगा मोल का रे, पीयै बिरला कोय ।
हरि रस महँगा सो पियै, जा के घर पै सीस न होय ॥३॥
आगे आगे दौं जलै रे, पीछे हरिया होय ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, हरि भज निर्मल होय ॥४॥
(५)
जहँ सतगुरु खेलत ऋतु बसंत । परम जोत जहँ साध संत ॥१
तीन लोक से भिन्न राज । जहँ अनहद बाजा बजै बाज ॥२
चहुँ दिसि जोति की बहै धार । बिरला जन कोइ उतरै पार ॥३
(१) तजो ।