संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाम गहै। निरभय रहा, तनिक न व्यापै पीर।
यह लीला है मुक्ति की, गावत दास कबीर ॥७॥
(४)
करो जतन सखि साईँ मिलन की ॥ टेक ॥
गुड़िया गुड़वा सूप सुपलिया।
तजि दे बुधि लरिकैयाँ खेलन की ॥१॥
देवता पित्तर भुइयाँ भवानी।
यह मारग चौरासी चलन की ॥२॥
ऊँचा महल अजब रँग बँगला।
साईँ की सेज जहाँ लगी फूलन की ॥३॥
तन मन धन सब अर्पन करि वहाँ।
सुरत सम्हार परु पइयाँ सजन की ॥४॥
कहै कबीर निर्भय होय हंसा।
कुंजी बता द्यौँ ताला खुलन की ॥५॥
(५)
जाग पियारी अब का सोवै।
रैन गई दिन काहे को खोवै ॥१॥
जिन जागा तिन मानिक पाया।
तैँ बौरी सब सोय गँवाया ॥२॥
पिय तेरे चतुर तू मूरख नारी।
कबहुँ न पिय की सेज सँवारी ॥३॥
तैँ बौरी बौरापन कीन्हो।
भर जोबन पिय अपन न चीन्हो ॥४॥
जाग देख पिय सेज न तेरे।
तोहि छाड़ि उठि गये सबेरै ॥५॥