संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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सूचीपत्र
नाम शब्द संख्या पृष्ठ
१ कबीर साहिब . . . ६१ १—२८
२ पीपाजी . ... १ २८
३ नामदेवजी ... ... ८ २८—३२
४ रैदासजी ... ... ... ६ ३२—३५
५ सदनाजी ... ... . १ ३६
६ धनी धम्मदासजी ... ... ... २४ ३७—४५
७ गुरु नानक . ... ... २८ ४६—५४
८ सूरदासजी ... ... ... ३० ५५—६७
६ स्वामी हरिदास ... .. .. २ ६७—६८
१० मीरा बाई ... ... .. २२ ६८—७७
११ नरसी मेहताजी . ... ... २ ७८
१२ गुसाईं तुलसीदास जी ... ... २३ ७६—६०
१३ दादू दयाल ... ... .. ३० ६०—१०१
१४ बाबा मलूकदास . ... ... १० १०२—१०६
१५ नामाजी ... .. ... १ १०६
१६ सुंदरदासजी . ... . ५५ १०७—१२५
१७ धरनीदासजी ... ... ... ६ १२५—१२६
१८ जगजीवन साहिब ... .. .. ३६ १३०—१४४
१६ यारी साहिब ... ... ... १० १४५—१४७
२० दरिया साहिब (बिहार वाले) .. . ६ १४८—१५३
२१ दरिया साहिब (मारवाड़ वाले) . ... ६ १५३—१५७
२२ दूलनदासजी . ... ... ३५ १५७—१७०
२३ बुल्ला साहिब ... .. ... १७ १७०—१७५
२४ केशवदास जी ... ... ... ५ १७६—१७६
२५ चरनदासजी ... ... ... १५ १७६—१८६
२ सूचीपत्र
नाम शब्द संख्या पृष्ठ
२६ बुल्लेशाह . . ७ १८७—१९१
२७ सहजो बाई .. . . ८ १९१—१९४
२८ दया बाई .. ... १ १९४—१९५
२९ गरीबदासजी ... .. ११ १९५—२०१
३० गुलाल साहिब . . १५ २०१—२०७
३१ भीखा साहिब १७ २०७—२१६
३२ पलटू साहिब .. ५५ २१६—२३८
३३ तुलसी साहिब . . २५ २३८—२५२
३४ काष्ठजिह्वा स्वामी ६ २५२—२५४
फुटकर . ८ २५४—२५६
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६०३
कबीर साहिब
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ १ भाग १ संतवानी संग्रह ]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
चल सतगुरु की हाट, ज्ञान बुधि लाइये ।
कीजे साहिब से हेत, परम पद पाइये ॥१॥
सतगुरु सब कछु दीन्ह, देत कछु ना रह्यो ।
हमहिँ अभागिनि नारि, सुख तजि दुख लह्यो ॥२॥
गई पिया के महल, पिया सँग ना रची ।
हृदै कपट रह्यो छाय, मान लज्जा भरी ॥३॥
जहवाँ गैल सिलहली, चढ़ौँ गिरि गिरि पड़ौँ ।
उठौँ सम्हारि सम्हारि, चरन आगे धरौँ ॥४॥
जो पिय मिलन की चाह, कौन तेरे लाज हो ।
अधर मिलो ना जाय, भला दिन आज हो ॥५॥
भला बना संजोग, प्रेम का चोलना ।
तन मन अरपै सीस, साहिब हँस बोलना ॥६॥
जो गुरु रूठे होयँ, तो तुरत मनाइये ।
हुइये दीन अधीन, चूक बकसाइये ॥७॥
जो गुरु होयँ दयाल, दया दिल हेरिहैं ।
कोटि करम कटि जायँ, पलक छिन फेरिहैं ॥८॥
कहै कबीर समुझाय, समुझ हिरदे धरो ।
जुगन जुगन करो राज, ऐसी दुर्मति परिहरो ॥९॥
२ शब्द संग्रह
(२)
तोहिँ मोरी लगन लगाये रे फकिरवा ॥ टेक ॥
सोवत ही मैं अपने मंदिर मैं, सबदन मारि जगाये रे (फ०) १
बूड़त ही भव के सागर मैं, वहियाँ पकरि समुझाये रे (फ०) २
एकै बचन बचन नहिं दूजा, तुम मो से बंद छुड़ाये रे (फ०) ३
कहै कबीर सुनो भइ साधो, सत्तनाम गुन गाये रे (फ०) ४
(३)
सतगुरु हैं रँगरेज, चुनर मेरी रँगि डारी ॥ टेक ॥
स्याही रंग छुड़ाइ के रे, दियो मजीठा रंग ।
धोये से छूटै नहीं रे, दिन दिन होत सुरंग ॥ १ ॥
भाव के कुंड नेह के जल मैं, प्रेम रंग दइ बोर ।
चसकी चास लगाइ के रे, खूब रँगी झकझोर ॥ २ ॥
सतगुरु ने चुनरी रँगी रे, सतगुरु चतुर सुजान ।
सब कछु उन पर वार दूँ रे, तन मन धन औ प्रान ॥ ३ ॥
कह कबीर रँगरेज गुरु रे, मुझ पर हुए दयाल ।
सीतल चुनरी ओढ़ि के रे, भइहैं मगन निहाल ॥ ४ ॥
॥ नाम ॥
(१)
अजर अमर इक नाम है, सुमिरन जो आवै ॥ टेक ॥
बिनहीं मुख के जप करो, नहिं जीभ डुलावो ।
उलटि सुरत ऊपर करो, नैनन दरसावो ॥ १ ॥
जाहु हंस पच्छिम दिसा, खिरकी खुलवावो ।
तिरबेनी के घाट पर, हंसा नहवावो ॥ २ ॥
कबीर साहिब ३
पानी पवन की गम नहीं, वोहि लोक मँझारा ।
ताही बिच इक रूप है, वोहि ध्यान लगावो ॥ ३॥
जिमीँ असमान उहाँ नहीं, वो अजर कहावै ।
कहै कबीर सोइ साध जन, वा लोक मँझावै ॥ ४॥
(२)
हंसा करो नाम नौकरी ॥ टेक ॥
नाम विदेही निसि दिन सुमिरै, नहिं भूलै छिन घरी ॥ १ ॥
नाम बिदेही जो जन पावै, कभुँ न सुरति बिसरी ॥ २ ॥
ऐसा सबद सतगुरु से पावै, आवा गवन हरी ॥ ३॥
कहै कबीर सुनो भइ साधो, पावै अमर नगरी ॥ ४॥
(३)
जो जन लेहिँ खसम का नाउँ, तिन के सद बलिहारी जाउँ॥१
जो गुरु के निर्मल गुन गावै, सो भाई मेरे मन भावै ॥२॥
जेहिँ घट नाम रह्यो भरपूर, तिन की पग पंकज हम धूर ॥३
जाति जुलाहा मति का धीर, सहज सहज गुन रमै कबीर॥४
॥ चेतावनी ॥
(१)
मन फूला फूला फिरै, जक्त मैं कैसा नाता रे ॥ टेक ॥
माता कहै यह पुत्र हमारा, बहिन कहै बिर¹ मेरा ।
भाई कहै यह भुजा हमारी, नारि कहै नर मेरा ॥ १ ॥
पेट पकरि के माता रोवै, बाँहि पकरि के भाई ।
लपटि झपटि के तिरिया रोवै, हंस अकेला जाई ॥ २ ॥
(१) बीर = भाई ।
४ शब्द संग्रह
जब लगि जोवै माता रोवै, बहिन रोवै दस मासा ।
तेरह दिन तक तिरिया रोवै, फेर करै घर बासा ॥३॥
चार गजी अरगजी मँगाया, चढ़ा काठ की घोड़ी ।
चारो कोने आग लगाया, फूँक दियो जस होरी ॥४॥
हाड़ जरै जस लाह कड़ी को, केस जरै जस घासा ।
सोना ऐसी काया जरि गइ, कोई न आयो पासा ॥५॥
घर की तिरिया ढूँढ़न लागी, ढूँढ़ि फिरी चहुँ देसा ।
कहै कबीर सुनो भइ साधो, छोड़ौ जग की आसा ॥६॥
(२)
सुगवा पिँजरवा छोरि करि भागा ॥ टेक ॥
इस पिँजरे में दस दरवाजा,
दसो दरवाजे किवरवा लागा ॥१॥
अँखियन सेती नीर बहन लाग्यो,
अब कस नाहिं तू बोलत अभागा ॥२॥
कहत कबीर सुनो भइ साधो,
उड़ि गे हंस टूटि गयो तागा ॥३॥
(३)
कौने ठगवा नगरिया लूटल हो ॥ टेक ॥
चंदन काठ कै बनल खटोलना, ता पर दुलहिन सूतल हो॥१॥
उठो री सखी मोरी माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूसल हो ॥२
आये जमराज पलँग चढ़ि बैठे, नैनन आँसू टूटल हो ॥३॥
चारि जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धूधू ऊठल हो॥४॥
कहत कबीर सुनो भइ साधो, जग से नाता छूटल हो ॥५॥
कबीर साहिब ५
(४)
बीती बहुत रहि थोरी सी ॥ टेक ॥
खाट पड़े नर झीँखन लागे, निकसि प्रान गयो चोरी सी॥१
भाई बंद कुटुँब सब आये, फूँक दियो मानो होरी सी ॥२
कहै कबीर सुनो भइ साधो, सिर पर देत हैं भौँरी सी ॥३॥
(५)
तौरी गठरी मैं लागे चोर, बटोहिया का रे सोवै ॥टेक॥
पाँच पचीस तीन हैं चुरवा, यह सब कीन्हा सोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥१॥
जागु सबेरा बाट अनेड़ा, फिर नहिँ लागे जोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥२॥
भवसागर इक नदी बहुतु है, बिन उतरे जाव बोर¹-
बटोहिया का रे सोवै ॥३॥
कहै कबीर सुनो भइ साधो, जागत कीजे भोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥४॥
(६)
करम गति टारे नाहिँ टरी ॥ टेक ॥
मुनि बसिस्ट से पंडित ज्ञानी, सोधि के लगन धरी ।
सीता हरन मरन दसरथ को, बन मैं बिपति परी²॥१॥
कहँ वह फंद कहाँ वह पारधि,³ कहँ वह मिरग चरी²।
सीता को हरि लेगयो रावन, सोने की लंक जरी² ॥२॥
(१) बूड़, डूब । (२) रामचन्द्र जी का बनवास, उनके पिता दसरथ का उनके
वियोग में प्रान तजना, मारीच को म्रिगा बना कर रावन का सीताजी को चुरा
ले जाना, और फिर रामचन्द्र का रावन को मारना और लंका को जलाना यह
कथा प्रायः सब लोग जानते हैं । (३) शिकारी ।
६ शब्द संग्रह
नीच हाथ हरिचन्द¹ बिकाने, बलि² पाताल धरी ।
कोटि गाय नित पुन्य करत नृग, गिरगिट जोनि परी³॥
पाँडव जिन के आपु सारथी, तिन पर विपति परी ।
दुरजोधन को गर्व घटायो, जदु कुल नास करी⁴ ॥४॥
राहु केतु औ भानु चन्द्रमा, बिधि संजोग परी ।
कहत कबीर सुनो भइ साधो, होनी हो के रही ॥५॥
(१) राजा हरिश्चन्द्र भारी दानी और सत्यवादी थे जिन्हों ने विश्वामित्र
को अपना सब राज पाट यज्ञ की दक्षिणा में दे दिया इस पर मुनिजी ने त० भार सोना दान-प्रतिष्ठा का अपना और निकाला। राजा हरिश्चन्द्र ने उसके
लिये काशी में जाकर अपने को एक डोमड़े के हाथ और अपनी स्त्री और पुत्र
को एक ब्राह्मण के हाथ बेच कर मुनि जी को संतुष्ट किया।
(२) राजा बलि बड़े प्रतापी और दानी थे जिन के द्वारे पर आप भगवान बौना
का भेष धर कर तीन परग पृथ्वी माँगने गये। जब राजा बलि ने संकल्प कर दिया
तब भगवान ने बैराट रूप धारन करके एक परग में स्वर्गादिक और एक में सारी
पृथ्वी नाप ली और कहा कि अब बाकी तीसरा परग देव। राजा ने अपना शरीर भेंट
किया जिसे तीसरे परग से नाप कर भगवान ने उन्हें अमर करके पाताल का
राज्य दिया।
(३) राजा नृग रोज़ एक लाख गऊ दान दिया करते थे। एक बार कोई गऊ
जो पहिले दिन दान हो चुकी थी नई गउवों में आ मिली और राजा ने उसे
अनजान में दूसरे ब्राह्मण को संकल्प कर दिया। इस पर पहिले और दूसरे दिन
के दान पानेवाले ब्राह्मणों में झगड़ा मचा और दोनों राजा के पास न्याय को
गये। दोनों वही गऊ लेने पर हठ करते थे इस लिये राजा की बुद्धि चकराई
और सोच में पड़ कर दोनों की दलोल पर सिर हिला देते। इस पर उन ब्राह्मणों
ने सराप दिया कि तुम गिरगिट की तरह सिर हिलाते हो वही बन जावगे।
इस लिये राजा नृग मरने पर गिरगिट की जोनी पाकर एक अंधे कुए में पड़े
हुए थे जब कृष्णावतार हुआ तब श्रीकृष्ण ने उनको तारा।
(४) पांडवों के रथ पर श्रीकृष्ण महाभारत की लड़ाई में आप सारथी बने और
दुरजोधन का घमंड तोड़ा और कौरवों के कुल का और (परम धाम सिधारने के
पहिले) अपने जदु कुल का नाश किया। पांडवों पर यह विपति पड़ी
थी कि अपना सब राज पाट अपनी स्त्री द्रोपदी सहित कौरवों के हाथ जुए में
हार गये और मुद्दत तक बनोबास में कष्ट उठाया।
प्रथम भाग: कबीर साहिब, धर्मदास एवं गुरु नानक देव जी की वाणी
कबीर साहित्य ७
(७)
और मुए का सोग करीजै, तौ कीजै जो आपन जीजै ॥१॥
मैं नहिँ मरौँ मरै संसारा, अब मोहिँ मिला जियावनहारा २
या देही परिमल महकंदा, ता सुख बिसरे परमानन्दा॥३
कुअटा१ एक पंच पनिहारी, टूटी लेजुरि२ भरैँ मतिहारी३॥४
कह कबीर इक बुद्धि विचारी, नावह कुअटाना पनिहारी ॥५
(८)
टुक जिंदगी बँदगी कर लेना, क्या माया मद मस्ताना॥टेक
रथ घोड़े सुखपाल पालकी, हाथी औ वाहन नाना ।
तेरा ठाठ काठ की टाटी, यह चढ़ चलना समसाना४ ॥१
रूम पाट५ पाटम्बर अम्बर, जरी बफ़्त का बाना।
तेरे काज गजी गज चारिक६, भरा रहै तोसाखाना ॥२॥
खर्चे की तदबीर करो तुम, मंजिल लंबी जाना ।
पहिचन्ते का गाँव न मग में, चौकी न हाट दुकाना ॥३॥
जीते जी ले जीति जनम को, यही गोय यहि मैदाना ।
कहै कबीर सुनो भइ साधो, नहिँ कलि तरन जतन आना॥४
(६)
कायाँ बौरी चलत प्रान काहे रोई ॥ टेक ॥
काया पाय बहुत सुख कीन्हा, नित उठि मलि मलि धोई ।
सो तन छिया छार ह्वै जैहै, नाम न लैहै कोई ॥ १ ॥
कहत प्रान सुनु काया बौरी, मोर तोर संग न होई ।
तोहि अस मित्र बहुत हम त्यागा, संग न लीन्हा कोई ॥२॥
(१) छोटा कुआँ । (२) रस्सी । (३) मतिहीन, अज्ञान । (४) समसान = मुरदा
जलाने का घाट । (५) ऊनी कपड़ा । (६) चार एक ।
८ - शब्द संग्रह
ऊसर खेत कै कुसा मँगाये, चाँचुर चवर१ कै पानी ।
जीवत ब्रह्म को कोई न पूजै, मुरदा कै मिहमानी ॥३॥
सिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, सेस सहस मुख होई ।
जो जो जन्म लियो बसुधा२ में, थिर न रह्यो है कोई॥४
पाप पुन्य हैं जन्म संघाती, समुझि देख नर लोई ।
कहत कबीर अभि अंतर की गति, जानत बिरला कोई ॥५॥
(१०)
उपजै निपजै निपजि समाई, नैनन देखि चल्योजगजा। १
लाज न मरो कहो घर मेरा, अंत की बार नहीं कछु तेरा ॥२
अनेक जतन करि काया पालो, मरती बेर अगिन सँग जाली३
चोवा चंदन मरदन अंगा, सो तन जरै काठ के संगा ॥४॥
कहत कबीर सुनो रे गुनिया, बिनसै रूप देखैगी दुनियाँ ॥५॥
(११)
यही घड़ी यह बेला साधो ॥ टेक ॥
लाख खरच फिर हाथ न आवै, मानुष जनम सुहेला ॥१॥
ना कोइ संगी ना कोइ साथी, जाता हंस अकेला ॥२॥
क्यों सोया उठि जागु सबेरे, काल मारँदा सेला३ ॥३॥
कहत कबीर गुरू गुन गावो, झूठा है सब मेला ॥४॥
(१)
हटरी छोड़ि चल' बनिजारा ॥ टेक ॥
इस हटरी बिच मानिक मोती, कोइ बिरला परखनहारा ॥१
इस हटरी के नौ दरवाजे, दसवाँ ठाकुरद्वारा ॥ २ ॥
निकसि गइ थंभी ढहि परा मन्दिर, रलि गया चिक्कड़ गारा ३
कहत कबीर सुनो भइ साधो, झूठा जगत पसारा ॥ ४ ॥
(१) परती ज़मीन की छिछुली तलैया । (२) पृथ्वी । (३) तलवार ।
कबीर साहिब ६
(१३)
होली
आई गवनवाँ की सारी, उमिरि अबहीँ मोरी वारी ॥टेक॥
साज समाज पिया लै आये, और कहरिया चारी ।
वम्हना बेदरदी अचरा पकरि कै, जोरत गँठिया हमारी ।
सखी सब पारत गारी ॥ १ ॥
विधि¹ गति वाम कछु समझ परत ना, वैरी भई महतारी ।
रोय रोय अँखियाँ मोर पोंछत, घरवाँ से देत निकारी ।
भई सब का हम भारी ॥ २ ॥
गवन कराय पिया लै चाले, इत उत बाट निहारी ।
छूटत गाँव नगर से नाता, छूटै महल अटारी ।
करम गति टरै न टारी ॥ ३ ॥
नदिया किनारे बलम मोर रसिया, दीन्ह घुँघट पट टारी ।
थरथराय तन काँपन लागे, काहू न देख हमारी ।
पिया लै आये गोहारी ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, यह पद लेहु विचारी ।
अब के गौना बहुरि नहिँ औना, करिले भेंट अँकवारी ।
एक बेर मिलि ले प्यारी ॥ ५ ॥
॥ लय ॥
जो कोइ या बिधि मन को लगावै, मन के लगाये प्रभु पावै१
जैसे नटवा चढ़त बाँस पर, ढोलिया ढोल बजावै ।
अपना बोझ धरै सिर ऊपर, सुरति बरत² पर लावै ॥२॥
जैसे भुवंगम³ चरत बनहिँ मैं, ओस चाटने आवै ।
कभी चाटै कभी मनि तन चितवै, मनि तजि प्रान गँवावै॥३
(१) ब्रह्मा । (२) डोरी । (३) साँप ।
१० शब्द संग्रह
जैसे कामिनि भरे कूप जल, कर छोड़े बतरावै¹।
अपना रँग सखियन सँग राचै, सुरति गगर पर लावै ॥४॥
जैसे, सती चढ़ी सर² ऊपर, अपनी काया जरावै।
मातु पिता सब कुटुंब तियागै, सुरति पिया पर लावै ॥५॥
धूप दीप नैबेद अरगजा, ज्ञान की आरत लावै।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, फेर जनम नहिँ पावै ॥६॥
॥ विरह ॥
(१)
बालम आओ हमारे गेह रे, तुम बिन दुखिया देह रे॥टे० ।
सब कोइ कहै तुम्हारी नारी, मो को यह संदेह रे।
एकमेक ह्वै सेज न सोवै, तब लगि कैसा सनेह रे ॥ १ ॥
अन्न न भावै नींद न आवै, गृह बन धरै न धीर रे।
ज्यौँ कामी को कामिनि प्यारी, ज्यौँ प्यासे को नीर रे ॥२
है कोइ ऐसा परउपकारी, पिय से कहै सुनाय रे।
अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे ॥३
(२)
प्रीति लगी तुम नाम की, पल बिसरै नाहीं।
नजर करो अब मिहर की, मोहिँ मिलौ गुसाईँ ॥ १॥
बिरह सतावै मोहिँ को, जिव तड़पै मेरा।
तुम देखन की चाव है, प्रभु मिलौ सबेरा ॥ २ ॥
नैना तरसै दरस को, पल पलक न लागै।
दर्दवंद दीदार का, निसि बासर जागै ॥ ३ ॥
जो अब के प्रीतम मिलैँ, करूँ निमिख³ न न्यारा।
अब कबीर गुरु पाइया, मिला प्रान पियारा ॥ ४ ॥
(१) बात करती है। (२) आग, चिता। (३) छिन भर।
कबीर साहिब ११
(३)
मिलना कठिन है, कैसे मिलौंगी पिय जाय ॥टेक॥
समझि सोचि पग धरौं जतन से, बार बार डिग जाय ।
ऊँची गैल राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय ॥१॥
लोक लाज कुल की मरजादा, देखत मन सकुचाय ।
नैहर वास बसौं पीहर मैं, लाज तजी नहिं जाय ॥२॥
अधर भूमि जहँ महल पिया का, हम पै चढ़ो न जाय ।
धन भइ बारी पुरुप भये भोला, सुरत झकोला खाय ॥३॥
दूतो सतगुरु मिले बीच मैं, दीन्हो भेद बताय ।
दास कबीर पिया से भेंटे, सीतल कंठ लगाय ॥४॥
(४)
कौन मिलावै मोहिँ जोगिया हो, जोगिया बिन रह्यो न जाय ॥टेक॥
हौँ१ हिरनी पिय पारधी२ हो, मारे सबद के बान ।
जाहि लगो सो जानही हो, और दरद नहिँ जान ॥१॥
मैं प्यासी हौँ पीव की हो, रटत सदा पिव पीव ।
पिया मिले तो जीव है, ना तो सहजै त्यागौँ जीव ॥२॥
पिय कारन पियरी भई हो, लोग कहै तन रोग ।
छः छः लंघन मैं करौं रे, पिया मिलन के जोग ॥३॥
कह कबीर सुन जोगिनी हो, तन मैं मनहिँ मिलाय ।
तुम्हरी प्रीति के कारने हो, बहुरि मिलैंगे आय ॥४॥
(५)
होली
ये अँखियाँ अलसानी हो, पिय सेज चलो ॥ टेक ॥
खंभ पकरि पतंग अस डोलै, बोलै मधुरी बानी ॥१॥
फूलन सेज बिछाय जो राख्यो, पिया बिना कुम्हिलानी ॥२॥
(१) मैं । (२) शिकारी ।
१२ शब्द संग्रह
धीरे पाँव धरौ पलँगा पर, जागत ननद जिठानी ॥३॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, लोक लाज बिलछाती१ ॥४॥
(६)
होली
नैहरवा हम काँ नहिँ भावै ॥ टेक ॥
साँईँ की नगरी परम अति सुन्दर, जहाँ कोइ जाय न आवै ।
चाँद सुरज जहाँ पवन न पानी, को सँदेस पहुँचावै,
दरद यह साईँ को सुनावै ॥ १ ॥
आगे चलौँ पंथ नहिँ सूझै, पीछे दोष लगावै ।
केहि बिधि ससुरे जावँ मोरी सजनी, बिरहा जोर जनावै,
बिषै रस नाच नचावै ॥ २ ॥
बिन सतगुरु अपनो नहिँ कोई, जो यह राह बतावै ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपने न प्रीतम पावै,
तपन यह जिय की बुझावै ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
बहुत दिनन मैँ प्रीतम आये, भाग भले घर बैठे पाये ॥१॥
मंगलचार महा मन राखो, नाम रसायन रसना२ चांखो ॥२॥
मंदिर महा भयो उँजियारा, लै सूती अपनो पिय प्यारा ॥३
मैं निरास जो नौनिधि पाई, कहा करौँ पिय तुम्हरी बड़ाई४
कहतकबीरमैं कछुन हिँकीन्हा, सहज सुहाग पिया मोहिँ दीन्हा ॥५
(२)
घूँघट का पट खोल रे, तो को पीव मिलैँगे ॥टेक
घट घट में वोहि साईँ रमता, कटुक बचन मत बोल रे(तो को०
धन जोबन का गर्ब न कीजे, झूठा पचरँग चोल रे(तो को०) ॥
(१) छोड़ी । (२) जीभ ।
कबीर साहिब १३
सुन्न महल मैं दियना बारिले, आसा से मत डोल रे (तो को०) ॥३
भोग जुगत से रंग महल मैं, पिय पाये अनमोल रे (तो को०) ॥४
कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे (तो को०) ॥५॥
(३)
मैं तौ वा दिन फागमचैहौं, जा दिन पिया मोरे द्वारे ऐहैं ॥टेक॥
रंग वही रँगरेजवा वाही, सुरँग चुनरिया रँगैहौं ॥१॥
जोगिन होइ के बन बन ढूँढ़ौं, वाही नगर मैं रहिहौं ॥२॥
बालपना गल सेलिह बनैहौं, अंग भभूत लगैहौं ॥३॥
कह कबीर पिये द्वारे ऐहैं, केसर माथ रँगैहौं ॥४॥
(४)
पिया मेरा जागै मैं कैसे सोई री ॥ टेक ॥
पाँच सखी मेरे सँग की सहेली,
उन रँग रँगी पिया रँग न मिली री ॥ १ ॥
सास सयानी ननद दीरानी,
उन डर डरी पिय सार न जानी री ॥ २ ॥
द्वादस ऊपर सेज बिछानी,
चढ़ न सकौं मारी लाज लजानी री ॥ ३ ॥
रात दिवस मोहिं कूका मारै,
मैं न सुना रचि रही सँग जार री ॥ ४ ॥
कह कबीर सुनु सखी सयानी,
बिन सतगुरु पिय मिले न मिलानो री ॥ ५ ॥
(५)
खंजरि लगि गये बान सुरंगी हो ॥ टेक ॥
फूल सतगुरु उपदेस दियो है, होइ गयो चित्त बिरंगी हो ॥१
आन पुरुष की बनी है तिरिया, घायल पाँचो संगी हो ॥२
१४ शब्द संग्रह
घायल की गति घायल जानै, क्या जानै जाति पतंगी हो ॥३॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, निसि दिन प्रेम उमंगी हो ॥४॥
(६)
हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ।
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥१॥
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर बदर फिरते ।
हमारा यार है हम मैं, हमन को इन्तिजारी क्या ॥२॥
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है ।
हमन गुरु नाम साचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ॥३॥
न पल बिछुड़ पिया हम से, न हम बिछुड़ैं पियारे से ।
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ॥४॥
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से ।
जो चलना राह नाजुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ॥५॥
(७)
मन लागो मेरो यार फकीरी मैं ॥ टेक ॥
जो सुख पावो नाम भजन मैं, सो सुख नाहिं अमीरी मैं ॥१
भला बुरा सब को सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी मैं ॥२॥
प्रेम नगर मैं रहनि हमारी, भलि बनि आई सबूरी मैं ॥३॥
हाथ मैं कूँड़ी बगल मैं सोंटा, चारो दिसि जागीरी मैं ॥४॥
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहा फिरत मगरूरी मैं ॥५
कहै कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी मैं ॥६॥
(८)
साधो सहज समाधि भली ।
गुरु प्रताप जा दिन से जागो, दिन दिन अधिक चली ॥१
जहँ जहँ डोलौं सो परिकरमा, जो कछु करौं सो सेवा ।
जब सोवौं तब करौं दंडवत, पूजौँ और न देवा ॥२॥
कबीर साहिब १५
कहौँ सो नाम सुनौँ सो सुमिरन, खावँ पियौँ सो पूजा ।
गिरह उजाड़ एक सम लेखौँ, भाव मिटावौँ दूजा ॥३॥
आँख न मूँदौँ कान न रूँधौँ, तनिक कष्ट नहिँ धारौँ ।
खुले नैन पहिचानौँ हँसि हँसि, सुंदर रूप निहारौँ ॥४॥
शबद निरन्तर से मन लागा, मलिन वासना त्यागी ।
ऊठत बैठत कबहुँ न छूटै, ऐसी तारी लागी ॥ ५ ॥
कह कबीर यह उनमुनि रहनी, सो परगट करि गाई ।
दुख सुख से कोइ परे परम पद, तेहि पद रहा समाई ॥६
(९)
गुरू ने मोहिँ दीन्ही अजब जड़ी ॥ टेक ॥
सोई जड़ी मोहिँ प्यारी लगतु है, अमृत रसन भरी ॥१॥
काया नगर अजब इक बँगला, ता मैं गुप्त घरी ॥ २ ॥
पाँचो नाग पच्चीसो नागिन, सूँघत तुरत मरी ॥ ३ ॥
या कारे ने सब जग खायो, सतगुरु देख डरी ॥ ४ ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो, लै परिवार तरी ॥ ५ ॥
(१०)
होली
ऋतु फागुन नियरानी, कोइ पिया से मिलावै ॥ टेक ॥
सोइ तो सुंदर जाको पियको ध्यान है, सोइ पियके मनमानी।
खेलत फाग अंग नहिँ मोड़ै, सतगुरु से लिपटानी ॥१॥
इक इक सखियाँ खेल घर पहुँचीँ, इक इक कुल अरुझानी।
इक इक नाम बिना बहकानी, हो रहि ऐँचा तानी ॥२॥
पिय को रूप कहाँ लग बरनौँ, रूपहि माहिँ समानी ।
जो रँग रँगे सकल छवि छाके, तन मन सभी भुलानी ॥३॥
यौँ मत जाने यहि रे फाग है, यह कछु अकथ कहानी ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह गति बिरले जानी ॥४॥
१६ शब्द संग्रह
(१)
॥ बिनय ॥
(चौपाई)
दरसन, दीजे नाम सनेहो । तुम बिन दुख पावै मेरी देही ॥
(छंद)
दुखित तुम बिन रटत निसि दिन, प्रगट दरसन दीजिये ।
बिनती सुन प्रिय स्वामियाँ, बलि जाउँ विलंब न कीजिये ॥१॥
(चौपाई)
अन्न न भावै नींद न आवै । बार बार मोहिँ बिरह सतावै ॥
(छंद)
बिबिध बिधि हम भईँ ब्याकुल, बिन देखे जिव ना रहै ।
तपत तन जिव उठत झाला, कठिन दुख अब को सहै ॥२
(चौपाई)
नैनन चलत सजल जलधारा । निसिदिन पंथ निहारौँ तुम्हारा ॥
(छंद)
गुन औगुन अपराध छिमा करि, औगन कछु न बिचारिये ।
पतित-पावन राखु परमति१, अपना पन न बिसारिये ॥३॥
(चौपाई)
गृह आँगन मोहिँ कछु न सुहाई, बज्र भई और फिरयो न जाई ॥
(छंद)
नैन अरि भरि रहे निरखत, निमिख नेह न तुड़ाइये ।
बाँह दीजे बंदी-छेड़ा, अब के बंद छुड़ाइये ॥४॥
(चौपाई)
मीन मरै जैसे बिन नीरा । ऐसे तुम बिन दुखित सरीरा ॥
(छंद)
दास कबीर यह करत बिनती, महा पुरुष अब मानिये ।
दया कीजे दरस दीजे, अपना करि मोहिँ जानिये ॥५॥
(१) उच्च मत या भाव ।
कबीर साहिब १७
(२)
दरमाँदे ठाढ़े दरबार ॥टेक॥
तुम बिन सुरत करै को मेरी, दरसन दीजै खोलि किवार ॥१॥
तुम हौ धनी उदार दयालू, श्रवनन सुनियत सुजस तुम्हारा॥२
माँगाँ कौन रंक सब देखौँ, तुम्हहीं तैं मेरो निस्तार ॥३॥
जैदेव नामा विप्र सुदामा१, तिन पर किरपा भई अपार ॥४
कह कबीर तुम समरथ दाता, चार पदारथ देत न बार ॥५॥
॥ साधु ॥
नारद साध से अंतर नाहीं।
जो कोइ साध से अंतर राखै, सो नर नरकै जाहीं ॥१॥
जागै साध तो मैं हूँ जागूँ, सोवै साध तो सोऊँ।
जो कोइ मेरे साध दुखावै, जरा मूल से खोऊँ ॥२॥
जहाँ साध मेरो जस गावै, तहाँ करूँ मैं बासा।
साध चलै आगे उठ धाऊँ, मोहिँ साध की आसा ॥३॥
माया मेरी अर्ध-सरीरी, औ भक्तन की दासी।
अठसठ तीरथ साध के चरनन, कोटि गया औ कासी ॥४
अंतरध्यान नाम निज केरा, जिन भजिया तिन पाई।
कहत कबीर साध की महिमा, हरि अपने मुख गाई ॥५॥
॥ सार गहनी ॥
मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै ॥ टेक ॥
हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार वार वा को क्यों खोलै ॥१
हलकी थी जब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोलै ॥२
सुरत कलारी भइ मतवारी, मदवा पी गइ बिन तोले ॥३॥
हंसा पाये मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोलै ॥४॥
(१) जैदेव और नामदेव परम भक्त और सुदामा श्रीकृष्ण के सहपाठी महा
दरिद्र थे जिन की गाढ़ में भारी सहायता हुई ।
३
१८ शब्द संग्रह
तेरा साहिब है घट माहीं, बाहर नैना क्याँ खोलै ॥५॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिल गये तिल ओले१॥६
॥ सतसंग ॥
मैं तो आन पड़ी चोरन के नगर, सतसंग बिना जिय तरसे॥१
इस सतसँग मैं लाभ बहुत है, तुरत मिलावै गुरु से ॥२॥
मूरख जन कोई सार न जानै, सतसँग मैं अमृत बरसे ॥३॥
सबद सा हीरा पटकि हाथ से, मुट्ठी भरी कंकर से ॥४॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सुरत करो वहि घर से ॥
॥ भेद बानी ॥
(१)
सार सबद गहि बाचिहौ२, मानौ इतबारा ॥ १॥
सत्त पुरुष अच्छै बिरिछ, निरंजन डारा ॥ २॥
तीन देव साखा भये, पाती संसारा ॥ ३॥
ब्रह्मा बेद सही किया, सिव जोग पसारा ॥ ४॥
ब्रिसनु माया परगट किया, उरले३ ब्योहारा ॥ ५॥
तिरदेवा ब्याधा४ भये, लिये बिष का चारा ॥ ६॥
कर्म की बंसी डारि के, फाँसा संसारा ॥ ७॥
जोति सरूपी हाकिमा, जिन अमल पसारा ॥ ८॥
तीन लोक दसहूँ दिसा, जम रोके द्वारा ॥ ९॥
अमल मिटावौं ताहि का, पठवौं भव पारा ॥१०॥
कह कबीर अम्मर करौं, जो होय हमारा ॥११॥
(२)
अहरम होय सो जानै साधो, ऐसा देस हमारा ॥टेक॥
बेद कतेब पार नहिँ पावत, कहन सुनन से न्यारा ।
जाति बरन कुल किरिया नाहीं, संध्या नेम अचारा ॥१॥
(१) ओट । (२) बचोगे । (३) इधर का अर्थात पिंड देश का । (४) चिड़ीमार ।