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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 267 में से

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२८ शब्द संग्रह
कहै कबीर जब काल गढ़ घेरिहै,
बात बहु बकै सब भूलि जावै ॥
पीपाजी
जीवन समय—पंद्रहवाँ शतक। जनम स्थान—गागरौनगढ़। आश्रम—भेष।
गुरू—स्वामी रामानंद।
यह गागरौनगढ़ के राजा और आदि में दुर्गा उपासक थे फिर स्वामी
रामानंद के चेले हुए और राजपाट छोड़ कर साधु भेष में अपनी छोटी रानी
सीता सहित गुरू के साथ द्वारिका गये। भक्तमाल की कथा के अनुसार कृष्ण
का साक्षात दर्शन पाने की अभिलाषा में पीपाजी समुद्र में कूद पड़े और सात
दिन तक भगवत चरणों मे रहकर बाहर निकले और वहाँ से जो छाप लाये थे
वह यह कह कर पुजारियों के सुपुर्द की कि जो इस छाप को लगावैगा उसे
भगवान मिलेंगे। द्वारिका से लौटने हुए रास्ते में पठानों ने पीपाजी की स्त्री
को सुंदर देख कर छीन लेना चाहा परंतु भगवान ने आप रक्षा की।
॥ घट मठ ॥
काया देवा काया देवल, काया जंगम जाती।
काया धूप दीप नैवेदा, काया पूजौँ पाती ॥ १ ॥
काया बहु खंड खोजते, नव निधी पाई।
ना कछु आइबो ना कछु जाइबो, राम की दुहाई ॥२॥
जो ब्रह्मंडे सोई पिंडे, जो खोजै सो पावै।
पीपा प्रनवै परम तत्त्व ही, सतगुरु होय लखावै ॥ ३ ॥
नामदेवजी
जीवन समय—पंद्रहवें शतक का दूसरा हिस्सा। कविता काल—१४८०।
जन्म और सतसंग स्थान—पांडरपुर। जाति और आश्रम—छीपी, गृहस्थ।
गुरू—ज्ञानदेवजी।
भक्तमाल में इन का जन्म एक बाल-विधवा के गर्भ से बिना पुरुष प्रसंग
के ईश्वरेच्छा से होना लिखा है जैसा कि हज़रत ईसा का क्वारी कन्या के उदर
से हुआ था। इन की प्रचंड भक्ति और बाल अवस्था ही से दृढ़ विश्वास की