संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहिब २७
कोटि कृस्न जहँ जोरैँ हाथ। कोटि विस्नु जहँ नवैँ माथ॥४
कोटिन ब्रह्मा पढ़ें पुरान। कोटि महेस जहँ धरैँ ध्यान ॥५
कोटि सरस्वति धारैँ राग। कोटि इन्द्र जहँ गगन लाग ॥६
सुर गन्ध्र्व मुनि गने न जायँ। जहँ साहिब प्रगटे आप आय ७
चोवा चंदन औ अबीर। पुहुप बास रस रह्यो गँभीर ॥८
सिरजत हिये निवास लीन्ह। सो यहि लोक से रहत भिन्न॥९
जब बसंत गहि राग लीन्ह। सतगुरु सबद उच्चार कीन्ह॥१०
कह कबीर मन हृदय लाय। नरक-उधारन नाम आहि ॥११
(६)
रेख़ता
सूरे संग्राम को देखि भागै नहीं,
देखि भागै सोई सूर नाहीं।
काम औ क्रोध मद लोभ से जूझना,
मँडा घमसान तहँ खेत माहीं॥
सील औ सच संतोष साही भये,
नाम समसेर तहँ खूब बाजै।
कहै कब्बीर कोइ जूझिहै सूरमा,
कायराँ भीड़ तहँ तुरत भाजै ॥
(७)
रेख़ता
बिना वैराग कहु ज्ञान केहि काम का,
पुरुष बिनु नारि नहिँ सोभ पावै।
स्वाँग तो साहु का काम है चोर का,
कपट की झपट मैं बहुत धावै ॥
बात बहुते कहै झूठ छूटै नहीं,
मुख के कहे कहा खाँड़ खावै।