संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहिब १९
बिन जल बूँद परत जहँ झारी, नहिँ मीठा नहिँ खारा ।
सुन्न-महल में नौबत बाजै, किंगरी बीन सितारा ॥२॥
बिन बादर जहँ बिजुरी चमकै, बिन सूरज उँजियारा ।
बिना सीप जहँ मोती उपजै, बिन सुर सबद उचारा ॥३॥
जोति लजाय ब्रह्म जहँ दरसै, आगे अगम- अपारा ।
कह कबीर वहँ रहनि हमारी, बूझै गुरुमुख प्यारा ॥४॥
(३)
रेख़ता
गंग औ जमुन के घाट को खोजि ले,
भँवर गुंजार तहँ करत भाई ।
सरसुती नीर तहँ देखु निर्मल बहै,
तासु के नीर पिये प्यास जाई ॥ १ ॥
पाँच की प्यास तहँ देखि पूरी भई,
तीन की ताप तहँ लगै नाहीं ।
कहै कब्बीर यह अगम का खेल है,
गैब का चाँदना देख माहीं ॥ २ ॥
(४)
रेख़ता
करत कलोल दरियाव के बीच में,
ब्रह्म की छौल मेँ हंस झूलै ।
अर्ध औ उर्ध की पैँग बाढ़ी तहाँ,
पलटि मन पवन को कँवल फूलै ॥ १ ॥
गगन गरजै तहाँ सदा पावस झरै,
होत झनकार नित बजत तूरा ।
बेद कत्तेब की गम्म नाहीं तहाँ,
कहै कब्बीर कोइ रमै सूरा ॥ २ ॥