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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६३
करता हूँ।'१
(४) करनी तथा कथनी में एकता :- सांसारिक व्यक्तियों की सामान्य प्रवृत्ति
होती है कि वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। परोपदेश-कुशल तो बहुतेरे होते हैं
परन्तु उपदेश के अनुसार आचरण करने वाले बहुत कम। नामदेव कहते हैं—'जब तक
आत्मा शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप, तप आदि करने से क्या लाभ।'२
'पाखण्ड-पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।३
(५) दुःखी तथा पीड़ितों के प्रति सम्वेदना :- संतों की सब से बड़ी विशेषता
है मानववाद। संत साहित्य मानववाद की भावना से ओत-प्रोत है। मानव के आधा-
त्मिक और लौकिक जीवन को सुखी बनाने के लिए उन्होंने बार-बार सन्मार्ग तथा
कल्याणकारी पथ की ओर संकेत किया है। उन्होंने वर्ग भेद की कटु आलोचना की
है। नामदेव जैसे उदारारय व्यक्ति संसार में सभी को सुख, देखने के आकांक्षी थे।
(६) हरिजनों के सुखी होने की कामना :- हरि के भक्तो के कल्याण की
कामना करते हुए नामदेव कहते हैं—'हरि के दास दीर्घायु हों। अहंकार रूपी पवन
का उनको स्पर्श न हो। वे सदा सुखी रहे। नामदेव कहते हैं कि पाडुरंग जिनकी
वाणी का निधान (थाती) बन गया है, ऐसे संत सदा सुखी हों।'४
(७) जन भाषा का प्रयोग :- संस्कृत और जन भाषा के भेद को बताते हुए
संत रज्जब ने कहा है—'वेद वाणी कूप जल है। वह कष्ट से मिलता है। साखी,
१. मन मेरो गजु जिभ्या मेरी काती। राम रमे काटो जम की फाँसी।
रांगनि रांगउ सीवनि सीवउ। राम नाम बिनु घरीअ न जीवउ॥
—स० ना० हिं० पृ०, पद १८।
२. काहे कू कीजै ध्यान जपना। जो मन नाही सुध अपना॥टेक॥
साँप काँचली छाड़े, विष नहो छाड़े। उदिक मै वग ध्यान मांडे॥
—सं० ना० हिं० पृ०, पद २३।
३. पाषंड भगति राम नहीं रीझै। बाहरि अंधा लोक पतीजै॥
—सं० ना० हिं० पृ०, पद २१
४. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला। माझिया सकला हरिच्या दासा।
कल्पनेची बाधा न हो कोणे काली। हे संत मंडळी सुखो असो॥
अहंकाराचा वारा न लागो रजसा। माझ्या विष्णुदासा भाविकांसी।
नामा म्हणे तथा असावे कल्याण। ज्या मुखी निधान पांडुरंग॥
—सकल संत गाथा, अभंग ८५३।
१३

१६४ नामदेव की हिन्दी कविता
सबद और रमैनी तालाब का पानी है जो सर्व सुलभ है ।'¹
संतों ने संस्कृत को त्याग कर जन भाषा अपनायी । नामदेव को भागवत धर्म
का महान् संदेश देना था अतः उन्होंने मराठी में रचना की । बाद में उन्होंने हिंदी में
कुछ वाणियाँ कही, जिनका देशभर में प्रचार हुआ ।
इस प्रकार इन विचारों से यह लगता है कि संत नामदेव ने एक नये प्रकार
के वेदांत का निर्माण किया ।
१. वेद सुवाणी कूप जल दुख सू प्रापति होय ।
सबद साखि सरवर सलिल सुख पीवै सब कोय ॥
—रज्जबजी की वाणी ।

पंचम अध्याय
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानो के काव्य के प्रयोजन
संतों का का आदर्श
काव्य के मूल्यांकन के दो प्रकार
नामदेव की कविता का सामाजिक पक्ष
काव्य निर्मिति के प्रमुख कारण
(१) प्रतिभा (२) व्युत्पन्नता (३) परिश्रम (४) भावात्मकता
नामदेव की कविता का भाव पक्ष
आत्मनिवेदन-परक काव्य, संत काव्य और भक्ति
संत नामदेव की अभंग रचना
आसंतः नामदेव के काव्य का प्रेरणा स्रोत
साक्षात्कार की अनुभूति
नामदेव की कविता में रस
वात्सल्य, शांत और करुण
नामदेव की कविता का कला पक्ष
गीति काव्य
नामदेव का अलंकार विधान, बिंब विधान
नामदेव की छंदो रचना
शैली, नामदेव का असाधारण कर्तृत्व
नामदेव की हिंदी पदावली की भाषा की कुछ विशेषताएं
वाक्य रचना, शब्द-क्रम, बल (emphasis)
नामदेव की हिंदी के कुछ विशिष्ट प्रयोग
विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग
संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग
नामदेव की हिंदी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव
रूप रचना, सर्वनामो का प्रयोग
परसर्गों का प्रयोग, ध्वनि ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन
किसी कवि की रचनाओं का आलोचनात्मक एवं विवेचनात्मक अनुशीलन करने
के पूर्व यह सर्वथा अपेक्षित होता है कि उसके काव्यादर्श का अध्ययन कर लिया जाय।
साहित्यकार के दृष्टिकोण, तथा उसके लक्ष्य के आदर्श का अध्ययन कर लेने से उसकी
चिंतन पद्धति, विचार शैली और जीवन दर्शन स्वतः स्पष्ट हो जाता है। साहित्यकार
एक जागरूक जीव होता है। उसकी चेतना, व्यापक दृष्टिकोण और दर्शन साहित्य के
पृष्ठों में प्रतिबिंबित होता है।
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के काव्य के प्रयोजन
साहित्य के प्रयोजन के विषय में आचार्यों में मतभेद है। कतिपय विद्वान
आनन्द को ही काव्य का मूल प्रयोजन मानते हैं। भामह के मत से काव्य धर्म, अर्थ,
काम, मोक्ष की प्राप्ति का साधन है।¹ 'साहित्य दर्पण' कार भामह के कथन से पूर्णतया
सहमत हैं। भरत, आनन्दवर्धन एवं अभिनव गुप्त आदि विचारक नैतिकता एवं धार्मिकता
के विकास के लिए काव्य को प्रयोजनीय मानते हैं।
पाश्चात्य लेखकों में ब्रैडले के अनुसार काव्य स्वयं अपना साध्य है। वह धर्म,
संस्कृति और शिक्षा आदि का साधन नहीं है। टॉल्स्टॉय के अनुसार काव्य की मुख्य
कसौटी नीति और धर्म है।²
१. धर्मार्थ काम मोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च ।
प्रीति करोति कीर्तिञ्च साधु काव्य निषेवणम् ॥
—भामह
2. In every age and in every human society there exists a religious
sense of what is good and what is bad, common to that
whole society and it is this religious conception that decides
the values of the feelings transferred by Art.
—What is Art (Oxford) p. 128-129.

१६८ नामदेव की हिन्दी कविता
आय० ए० रिचर्डस् का मत अंशतः मम्मट से मिलता है । उसके अनुसार कवि
अपनी कविता 'स्वान्त-सुखाय' या उपदेश देने के लिए करते है अथवा दोनो दृष्टिकोणो
से भी ।१
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानो के काव्यादर्शों एवं काव्य के प्रयोजनो का अध्ययन
करने पर ज्ञात होता है कि हिंदी के संत कवियो में से किसी ने भी उपर्युक्त आदर्शों
एवं प्रयोजनो मे से एक को भी स्वीकार नहीं किया ।
संतो का काव्यादर्श
नामदेव आदि संतो का काव्य इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने काव्य का
कोई प्रचलित आदर्श ग्रहण नहीं किया । काव्य, काव्य शास्त्र, छन्द, पिंगल आदि के
नियमो का न उन्होंने अध्ययन किया था न इन सब के प्रति उनकी कोई आस्था थी ।
संतों ने यह बात प्रमाणित कर दी कि काव्यशास्त्र के नियमो से अनभिज्ञ भी काव्य
रचना कर सकता है । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति
और चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छन्द, अलंकार, शब्द शक्ति और अन्य गुण ।
संतो ने यह भी सिद्ध कर दिया कि भाव ही काव्य की आत्मा है और जब
काव्य की आत्मा दृढ़ और उच्च है तब फिर बाह्यावरण और अन्य उपकरण स्वतः
जुट जायेंगे । उन्होंने सचेष्ट होकर कविता की रचना नहीं की । उनकी कविता
उस्फूर्त है ।
दत्त-चित होकर संत साहित्य का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि संतो के
साहित्य में उनके काव्यादर्शों की अभिव्यक्ति हुई है । उन्होंने काव्य को कला की दृष्टि से
से नहीं देखा, न उन्होंने काव्य एवं कवि को समाज का सम्मानित सदस्य ही माना है ।
उन्होंने काव्य को आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया । इन कवियों की
रचनाओं में उनके काव्य विषयक आदर्श निहित मिलते है ।
सभी संतो के उद्देश्य ब्रह्म का गुणगान, बाह्याचारों की अवहेलना, सहज भाषा,
सरल शैली तथा अलंकारादि विहीन जनता में प्रचलित अति साधारण छन्द हैं । संतो ने
काव्य के महत्त्व को यहाँ तक स्वीकार किया है, जहाँ तक वह ब्रह्म के स्मरण में सहायक
हो सके, अन्यथा उसकी कोई उपयोगिता नहीं है । उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की उन्नति
एवं विकास के लिए काव्य के महत्त्व को स्वीकार किया है । दरिया साहब मारवाड़ वाले
The poets either wish to instruct or to delight or to combine
the both.
—Principles of Literary critcism.

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन १६६
ने संतों का काव्यादर्श सुन्दरतापूर्वक व्यक्त किया है।¹
काव्य के मूल्यांकन के दो प्रकार
किसी भी काव्य का मूल्यांकन दो प्रकार से होता है—साहित्यिक और सामा-
जिक। काव्य समाज के लिए लिखा जाता है अतः उसके सामाजिक पक्ष को भुलाया नहीं जा
सकता। संतों ने साहित्य में अमर स्थान पाने के लिए नहीं बल्कि जनता को प्रबुद्ध
करने के लिए काव्य रचना की। उनमें लोक मंगल या परोपकार की भावना सदैव
जागृत थी। प्रथम हम नामदेव की कविता के सामाजिक पक्ष पर विचार करेंगे।
नामदेव की कविता का सामाजिक पक्ष
संत साहित्य की सर्वप्रथम विशेषता है मानवता को प्रमुखता देना। संत नाम-
देव की कविता भी मानवता के भाव से ओतप्रोत है। वे एक आर्त भक्त थे। परोपकारी
संत थे। उनका अन्तःकरण परदुःखकातर था। अज्ञ जनों के लिए उनके हृदय में अपार
करुणा थी। ऐसे अज्ञ जनों का उद्धार करने की प्रार्थना करते हुए वे कहते हैं, 'ये
संसारी, विषयासक्त तथा पामर जीव परब्रह्म की भक्ति का आनन्द क्या जानें? ईश्वर से
विमुख होने के कारण, समक्ष प्रत्यक्ष अमृत का कलश होने पर भी ये उसकी मिठास
नहीं जानते। ऐसे लोगों के उद्धार की नामदेव प्रार्थना करते हैं।'²
संत साहित्य की दूसरी विशेषता मानववाद है। मानववाद का मूल लक्ष्य है
संसार के सभी जीवों के कष्ट को मिटाना और मानव के अस्तित्व को स्वीकार
करना। मानववादी नामदेव संसार को सुखी और प्रसन्न देखना चाहते हैं। वे प्रार्थना
करते हैं कि 'हरि के दासों को दीर्घायु प्राप्त हो और संत जन सदा सुखी हों।'³
संत साहित्य की तीसरी विशेषता है धार्मिकता। संतों ने धर्म-विषयक विचार
धारा और धारणा में क्रांति उपस्थित कर दी। नामदेव ने स्थान-स्थान पर बाह्याचार
१. सकल कवित्त का अर्थ है सकल बात की बात।
दरिया सुमिरन राम का कर लीजै दिन रात॥
—दरिया साहब का बानी, पृ० ६।
२. तैसी चूक लीजै रे जग जीवना।
अनभवह्या बिना ऐसी लपी न कुरुसनां ॥टेक॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १४८।
३. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला। माझिया सकळा हरिच्या दासा।
कल्पनेची बाधा न हो कोणो काळी। हे संत मंडळी सुखी असो॥
—सकल संत गाथा।

२०० नामदेव की हिन्दी कविता
एवं आडंबर की निंदा की है। वे कहते हैं कि 'जब तक अपना मन शुद्ध नहीं तब तक
ध्यान और जप किस काम के ?'१ 'छापा, तिलक तथा तुलसी की माला गले में पहनने
से क्या फायदा ? जब हृदय कोयले जैसा काला हो ?'२
संत साहित्य की चौथी विशेषता है जातीयता । मध्ययुगीन संतों ने अपनी वाणी
द्वारा समस्त देश को एक महान् सांस्कृतिक चेतना में बाँध दिया । इस महान् सांस्कृतिक
चेतना के फलस्वरूप जातीयता का विकास हुआ । नामदेवादि संतों ने भाषा के द्वारा
जातीयता का प्रसार और प्रचार किया । कबीर,३ रज्जब४ आदि संतों ने दिखा दिया
कि भाषा की क्या आवश्यकता है और उसका महत्व क्या है । उन्होने उही छंदो का
प्रयोग किया जिनसे जनता परिचित थी । वास्तव में वे जीवन भर जनता के लिए जिये
और मरे ।
संत साहित्य की पाँचवी विशेषता प्रगतिशीलता है । संतों के काव्य के दो विषय
हैं—(१) आध्यात्मिक और (२) लौकिक । संतों से पूर्व उच्च वर्ग का स्वत्व था । मोक्ष
पर उन्हीं का अधिकार था । पर इन संतों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में एक क्रांति उपस्थित
कर दी । नामदेव अपने आप को संबोधित करते हुए कहते हैं—'हे नामा ! तू षट् कर्मों
का अनुसरण करने वाले ब्राह्मणों से सरोकार न रख । तेरी भक्ति नष्ट हो जायेगी ।'५
इस प्रकार परंपरागत आध्यात्मिक विचार धारा में संतों ने प्रगति का भी समा-
वेश किया जो समय और देश के लिए अतीव अभीप्सित था ।
जनता को प्रबुद्ध करने के लिए उन्होंने 'संतो' शब्द का प्रयोग किया । जहाँ
जनता को संबोधित किया गया है, उपदेश दिया गया है वहीं भाव की गंभीरता कम है
१. जो सग राम नामे हित न भयो ।
तौ सग मेरी-मेरी करता जनम गयो ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २२ ।
२. गलि पहिरै तुलसी की माला । अंतरगति कोइलासा काला ॥
—सं० ना० की० हिं० प०, पद २४ ।
३. संस्कीरति है कूप जल, भाषा बहता नीर ।
४. बेद सु वाणी कूप जल दुख सूं प्रापति होय ।
सबद साखि सरवर सलिल सुख पीवै सब कोय ॥
—संत काव्य ।
५. लोक कहै लोकाइ रे नामा ।
षट दरसन कै निकटि न जाइबो । भगति जाइगी जाइ रे नामा ॥
—सं० ना० की हिं० पदा०, पद १७ ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०१
किंतु जहाँ स्वानुभूति की अभिव्यक्ति है वहाँ घनता और गंभीरता दोनों हैं।
काव्य निर्मिति के प्रमुख कारण
हमारे यहाँ के साहित्यशास्त्रकारों ने काव्य निर्मिति के तीन आवश्यक अंग
बताये हैं। जैसे प्रतिभा, व्युत्पन्नता और परिश्रम। इसके साथ ही साथ भावनात्मकता
को भी काव्य रचना के लिए आवश्यक गुण बताया जाता है। वैसे नामदेव की हिंदी रच-
नाओं में कही भी कवित्व के कारणों की चर्चा नही है। उनकी मराठी की रचनाओं के
आधार पर उनके काव्य गुणों की हम परीक्षा कर सकते हैं।
प्रतिभा
दण्डी के अनुसार प्रतिभा निसर्ग की देन है।¹ यह प्रयत्न द्वारा अर्जित नहीं की
जा सकती। कवि जन्म-जात होता है। उसे ठोक-पीट कर कवि बनाया नहीं जा
सकता।² नामदेव की भी यही धारणा है। वे कहते हैं, 'हे हरि ! तुम्हारी कृपा के
फलस्वरूप वाक् सुमनों की यह माला मैं गूँथ सका।'³
विद्याभूषण के अनुसार प्रतिभा नव-नव उन्मेष धारण करने वाली शक्ति है।⁴
नामदेव की रचनाओं में प्रतिभा के ऐसे नये-नये उन्मेष स्थान स्थान पर पाये जाते हैं।
नन्द के यहाँ के पुत्रजन्मोत्सव का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं कि 'जो विश्व का
पिता है, जो सारे संसार का सूत्र संभाले हुए है वह अपने आपको नन्द जी का पुत्र
कहलाता है।'⁵
पुराने विषयों को नूतन कल्पनाओं से सँवार कर, सजा कर प्रस्तुत करना प्रतिभा
की विशेषता है। इस दृष्टि से भी नामदेव का काव्य अध्ययनीय है। नरदेह नश्वर है।
१. नैसर्गिकी च प्रतिभा ।
—काव्यादर्श (१ । १०३) ।
2. Poets are born and not made.
३. नामा म्हणे हरि बोलिलो तुम्हिचा बले ।
वाहिली तुलसी दले स्वामी लागी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १२१८ ।
४. प्रज्ञा नवनवोन्मेष शालिनी प्रतिभा मता ।
५. विश्वाचा जो बाप हाती ज्याच्या सूत्र ।
म्हणवितो तो पुत्र नंदजीचा ॥
—वही, अभंग ४१ ।

२०२ नामदेव की हिन्दी कविता
यह कल्पना पुरानी है । परंतु नर देह काल (यम) का ग्रास है,१ इस कल्पना का प्रयोग
कर नामदेव उसे सजीव बना देते हैं ।'
हमारी आयु प्रति दिन घटती जा रही । नामदेव यह विचार इस प्रकार व्यक्त
करते हैं—'सूर्योदय से फिर दूसरे दिन सूर्योदय होने तक आयु का क्षय होता है । अंत
में उसका नाश होने वाला है ।'२ कितनी अन्वर्थक कल्पना है ।
अभिनव गुप्त ने में अपूर्व वस्तु निर्मिति की क्षमता रखने वाली प्रज्ञा को प्रतिभा
कहा है । वस्तु निर्मिति के अंतर्गत पात्रों का चरित्र चित्रण, कथा वस्तु, कल्पना विलास
तथा रचना सौंदर्य का समावेश होता है । बाल क्रीडा, शिवरात्र माहात्म्य, पौराणिक
चरित्र, ज्ञानेश्वर की आदि, तीर्थावली तथा समाधि में नामदेव के प्रतिभा विलास के
मनोज्ञ दर्शन होते हैं । इस दृष्टि से नामदेव की ये सूक्तियाँ उल्लेखनीय हैं—
(१) जिस स्वर्ग-सुख की प्राप्ति के लिए लोग अनेक कष्ट उठाते हैं वह सब
ज्ञानेश्वर को सहज सुलभ था ।३
(२) मुक्ताबाई के अनन्त में विलीन होते समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो सुन्दर
आकाश में विराट का पौधा अंकुरित हुआ ।४
(३) कीर्तन में भक्ति का उपदेश करते हुए आनन्द-विभोर होकर मैं नाचूँगा
और इस प्रकार भक्ति के ज्ञान का दीप जलाऊँगा ।५
(२) व्युत्पन्नता .—व्युत्पत्ति को 'काव्य प्रकाश' कार ने निपुणता कहा है । यह
दो प्रकार से प्राप्त होती है—लोकनिरीक्षण से और काव्य तथा शास्त्र के अध्ययन से ।
नामदेव अपनी कमजोरियों को बड़ी प्रामाणिकता से स्वीकार करते हैं । फिर भी अपनी
हिंदी तथा मराठी की रचनाओं में उन्होंने कम से कम छब्बीस पौराणिक कथाओं का जो
उल्लेख किया है वह उनके बहुश्रुत होने का प्रमाण है ।
————
१ शरीर काळाचे भातुकें ।
—वही, अभंग १६६४ ।
२ भानुचेनि मापें आयुष्य जें चले ।
—वही, अभंग १६३७ ।
३. वैकुंठासी शिंको लावियेली ।
—अभंग, १०५८ ।
४. अंकुरला गाभा विराटाचा ।
—सकल संत गाथा अभंग, ११८८ ।
५. नाचूं कीर्तनाने रंगी । ज्ञानदीप लावूं जगी ।
—अभंग, ११६२ ।

नामदेव की रचनाओ का साहित्यिक मूल्यांकन २०३
नामदेव बड़ी लीनता में कहते हैं, 'मैं बहुश्रुत नही हूँ। ज्ञानशील भी नही हूँ।
मैं भगवद्भक्तों का दीन दास हूँ।' १
'मे कलाओं का जानकार नही हूँ। हे श्रीहरि ! मे कला की बारीकियो को भी
नही जानता।' २
नामदेव का विचार था कि काव्य रचना के लिए व्युत्पन्नता की आवश्यकता नहीं
है। अपनी 'तीर्थावली' के अभंगों में एक स्थान पर रसिकों से वे कहते हैं-'मेरी रचना
प्राकृत में-मराठी में होने के कारण उसको किसी प्रकार हीन न समझा जाय। उसको
उपनिषदों का सार-स्वरूप ब्रह्म-रस समझ कर उसका सादर सेवन किया जाय।' ३
सच्चे वैष्णव का परिचय कराते हुए नामदेव कहते हैं कि 'वेदाध्ययन करने वाले
वैदिक, कथावाचक, गुणी जन, यज्ञ करने वाले याज्ञिक तथा तीर्थाटन करने वाले यात्री
अपने-अपने व्यवसाय संभाल सकेंगे परन्तु मन में भक्तिभाव न होने के कारण वे सच्चे
वैष्णव न हो सकेंगे।' ४
आचार्य शुक्ल की कविता की यह ५ परिभाषा उसके स्वरूप पर पर्याप्त प्रकाश
डालने में समर्थ है। शेष सृष्टि के साथ मानव का घनिष्ठ संबंध है पर ज्यों-ज्यों उसके
जीवन की जटिलता बढ़ती जाती है, सृष्टि के साथ मानव हृदय के रागात्मक संबंध के
टूटने की संभावना बढ़ने लगती है। नामदेव की कविता इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान
की वृद्धि कविता के ह्रास का कारण होती है। विद्वत्ता से व्याकरण शुद्ध तथा चमत्कृति
पूर्ण कविता लिखी जा सकती है। नामदेव की कविता सहज-स्फूर्त तथा मर्मस्पर्शी है।
उन्होंने यह बात प्रमाणित कर दी कि काव्यशास्त्र के नियमों से अनभिज्ञ भी काव्य रचना
कर सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति
और चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छंद, अलंकार, शब्द-शक्ति तथा अन्य काव्य
गुण।
(३) परिश्रम (अभ्यास)-अभ्यास में गुरु द्वारा कवित्व की शिक्षा तथा
१. नव्हे बहुश्रुत नव्हे ज्ञानशील। सकल संत गाथा, अभंग ६२४।
२. कलावंतांच्या कलाकुसरी। त्या मी नेंणें गा श्रीहरी। अ. २०१४।
३. नव्हे हे प्राकृत पाठांतर कवित्व। हा उपनिषद् मथितार्थ ब्रह्म रस। अ. ६७०।
४. नामा म्हणे नाम केशवाचे घेसी। तरीच वैष्णव होसी अरे जना।
--सकल संत गाथा, अभंग १८४२।
५. 'कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध
की रक्षा और निर्वाह होता है।'
--चिंतामणि 'कविता क्या है' शीर्षक निबंध पृ० १६१।

२०४ नामदेव की हिन्दी कविता
संशोधनादि आते हैं। इसमें प्रधानतया काव्य के बाह्यांगों का ही विचार होता है।
कवित्व शक्ति परमात्मा की देन है। 'ठोक-पीट कर कवि नही बनाया जा सकता।'१
नामदेव का यह कथन यथार्थ का द्योतक है।
नामदेव को अपनी रचनाओं का सस्कार करने का कदाचित् ही अवसर मिला
हो । वे रस-सिद्ध कवि थे। भावावेग में उनके मुख से जो उद्गार निकल पड़े वे कविता
के साँचे में ढल कर ही निकले। उनके आध्यात्मिक गुरु विसोबा खेचर थे२ परंतु उनसे
काव्य प्रेरणा ग्रहण करने का उनकी कविता में कही उल्लेख नहीं है। कवित्व तथा
कीर्तन की प्रेरणा उन्हें सत ज्ञानेश्वर से मिली थी। यह कथन सम्मत हो सकता है।
(४) भावात्मकता—प्रतिभा, व्युत्पन्नता तथा परिश्रम (अभ्यास) की अपेक्षा
कविता के लिए महत्वपूर्ण प्रेरक तत्त्व भावात्मकता है। आचार्य शुक्ल के अनुसार कविता
की निर्मिति में भावो का महत्त्वपूर्ण स्थान है।३ नामदेव की भाव विह्वलता का वर्णन
करतेहुए गोणाई विट्ठल से कहती है,—'तेरा नाम संकीर्तन करते हुए वह आनन्दातिरेक से
नाचता है, डोलता है, सिसकता है और अहर्निश तेरा नाम लेता है।'४ स्वयं नामदेव
एक स्थान पर कहते हैं—'विट्ठल प्रेम मेरे रोम-रोम में समाया है। कीर्तन करते समय
मै प्रेमानंद से नाचने लगता हूँ।'५ नामदेव के इन उद्गारों से उनकी भावोत्कटता प्रमा-
णित होती है।
काव्य निर्मिति के इन प्रमुख कारणों के अतिरिक्त उत्प्रेक्षा, अपूर्व कल्पनाशक्ति,
ग्रहण, धारणा, मनन आदि अनेक कारण साहित्य-शास्त्रियो ने दिये हैं। इन सब कारणों
को लेकर नामदेव ने रचना की हो सो बात नही। साहित्य शास्त्रोक्त काव्य कल्पना और
नामदेवादि संतो की काव्य कल्पना में पर्याप्त अंतर है।
नामदेव की अपनी कोई विशिष्ट काव्य दृष्टि नही थी। काव्य कारणों संबंधी
उनकी विस्मृति असाधारण थी । वे कहते हैं—'हे भगवंत ! किस समय कौन-सा गीत
१. 'शिकवोनि काय कवि होती ?'—सकल संत गाथा
२. निज वस्तु दाविली माझी मज ।'—अभंग १३६० ।
३. 'अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम ही कविता है। जब किसी कारण से
हृदय के भाव हृदय में नही समाते और वे शब्दों का रूप धारण कर बाहर आते
हैं तब उसे कविता कहते हैं, चाहे वह पद्य में हो अथवा गद्य में।'
४. हासे नाचे प्रेम फुंदतु डुलतु । अहर्निशी गातु नाम तुझें ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १२८२ ।
५. प्रेम पिसें भरले अंगी। गीत संगे नाचो रंगो ।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १११६ ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०५
गाया जाय यह हे नहीं जानता ।'१ कारण यह है कि उन्होंने सचेष्ट होकर काव्य रचना
नहीं की। उनकी कविता सहज-स्फूर्त थी।
काव्य कला है अतः उसके कला पक्ष तथा भाव पक्ष पर विचार करना आवश्यक
हो जाता है । पहले हम नामदेव की कविता के भाव पर विचार करेंगे ।
आत्मनिवेदनपरक काव्य
वारकरी पंथ की नव विधा२ भक्ति ने जिस प्रकार 'कीर्तन' संस्था को जन्म
दिया उसी प्रकार उसने संत कवियों की उज्ज्वल परंपरा को जन्म दिया। 'श्रवण कीर्तन'
आदि आठ प्रकार की भक्ति करने पर भी जब भक्तों के हृदय को शांति नहीं मिली तब
उन्होंने अपने इष्टदेव के सामने आकुल निवेदन करना प्रारंभ किया। यह आकुल निवे-
दन एक प्रकार का आत्मनिवेदन ही था जिसने आत्मनिवेदन-परक काव्य को अर्थात्
Lyrical poetry को जन्म दिया।
संत काव्य और भक्ति
भक्ति संत काव्य का स्थायी भाव है। संत कवि प्रथमतः संत थे, भक्त थे
तदनंतर कवि। संत ज्ञानेश्वर ने आत्मनिवेदन-परक शैली में जो अभङ्ग रचना की वह
कविता करने के उद्देश्य से नहीं अपितु अपनी आंतरिक वेदना तथा व्याकुलता अपने
इष्टदेव के समक्ष निवेदन करने के उद्देश्य से। अभङ्ग रचना के पीछे सन्त नामदेव का
भी यही उद्देश्य था। ज्ञानेश्वर योगी थे परन्तु नामदेव एक विह्वल प्रेमी भावुक भक्त।
उनका सारा काव्य उनके आर्त हृदय का आविष्कार है।
डॉ० श्री० व्यं० केतकर३ के अनुसार संस्कृत में आत्म-निवेदन-परक काव्य का जो
अभाव था उसकी इन सन्त कवियों की रचनाओं से पूर्ति हुई। उच्च कोटि का भाव-
काव्य अथवा गीति काव्य (lyrical poetry) इन सन्त कवियों की रचनाओं में ही
अवतरित हुआ।४
१. कोण वेल काय गाणे। हे तो भगवंता मी नेणे।
वारा वाहे भलतया। तैसी माझी रंग छाया।
टाल मृदंग दक्षिणेकडे। माझे गाणे पश्चिमेकडे ॥
—सकल सन्त गाथा, अभङ्ग १५१६
२. श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ भागवत
—सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
३. महाराष्ट्रीयांचे काव्य परीक्षण, पृ० ३५।
४. सन्त काव्य समालोचन : डॉ० गं० ब० ग्रामोपाध्ये, पृ० २१२।

२०६ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव पांडुरंग की ओर भावाकुल अंतःकरण से देखते थे। उसके लिए उनके
हृदय में जो आत्मीयता थी उसका पारावार नहीं था। नामदेव में कहीं उससे मिलने की
'तालाबली' है तो कहीं मिलन सुख का उल्लास। उनमें उत्कृष्ट भावना की हिलोर है।
पुत्र का अपनी माता पर, पत्नी का अपने पति पर, मित्र का अपने मित्र पर इतना प्रेम
न होगा जितना नामदेव का पांडुरंग पर था।
नामदेव की कविता में हमें भावातुर हृदय की आकुलता, आशंकित हृदय की अशां-
तता, विट्ठल की आहट पाते ही हर्षातिरेक से हृदय का नर्तन, यह आहट आभास में
परिवर्तित होने पर दारुण निराशा आदि विविध भावनाओं की झाँकियाँ मिलती हैं।
प्रिन्सिपल वा० ब० पटवर्धन¹ ने नामदेव की कविता को बायरन, शैली तथा
वर्डस्वर्थ आदि पाश्चात्त्य कवियों की कविता से तुलना कर प्रमाणित किया कि भावोद्रेक
में वह इन कवियों की कविता से किसी प्रकार कम नहीं है। नामदेव के अभंग भावो-
त्कटता के सुंदर उदाहरण हैं।
इस प्रकार मराठी में भाव गीत ( गीति काव्य ) की परंपरा नामदेव आदि
संत कवियों से प्रारम्भ होती है।
संत नामदेव की अभंग रचना
नामदेव की उद्भट भक्ति के कारण लोग उनको बाल-भक्त कहने लगे। जैसे-जैसे
दिन बीतते गये उनका भावुक मन विट्ठल भक्ति की ओर अधिकाधिक आकर्षित होता
गया। अपने इष्टदेव पांडुरंग के सान्निध्य में रहकर वे निरंतर भक्त-रस से सरा-
बोर अभंगों की रचना एवं गायन कर भक्ति में निमग्न रहने लगे। उनका कीर्तन सुनने
के लिए जनता सागर जैसी उमड़ पड़ती थी। उनके प्रेम, राग, मित्रता और पूजा का
विषय भगवान पांडुरंग ही बने मानो वे उससे एकरूप हुए थे। इस एकरूपता, उत्कटता
और आर्तता के स्रोत से उनके अभंगों की सृष्टि हुई जिसका विस्तृत वर्णन अब हम
करेंगे।
नामदेव शीघ्र कवि थे। उनका हृदय अतीव संवेदनशील था। उनकी भक्ति का
आवेग अवर्णनीय था। ऐसी दशा में उनके द्वारा प्रचुर मात्रा में अभंगों की रचना होना

  1. 'In the field of lyric of devotion—of the lyric of divine love-of
    Romance of piety and love of the spirit, Maharashtra literature
    stands unrivalled even perhaps unequalled, unapproached and
    unapproachable.'
    —Philological Lectures by Prof. W. B. Patwardhan
    (Lecture No. 2)

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०७
स्वाभाविक था। उनके उपलब्ध अभंग आत्मनिष्ठा अथवा आभ्यंतरता से ओतप्रोत है।
यो भी कहा जा सकता है कि विषयीनिष्ठ (Subjective) काव्य के वे आदर्श है। संत
नामदेव का आत्मविष्कार वर्णन से परे है। अतः उनके अभंगों की सरसता, प्रासादिकता
और मधुरता बेजोड़ है। वे सर्वसाधारण जनता के लिए रचे गए थे। अतः उनकी
रचना सरल और सुगम है।
आर्तता : नामदेव के काव्य का प्रेरणा स्रोत
जब नामदेव ने भावुकता भरे हृदय से हठ किया कि विट्ठल उनके हाथ से दूध
पियें तभी उनके हृदय की आर्तता कविता-सरिता के रूप में प्रवाहित हुई। जैसे मछली
पानी के बाहर तड़पने लगती है वैसे नामदेव अपने इष्टदेव पांडुरङ्ग के दर्शन के लिए
तड़पते थे। उनकी यह तीव्र तड़प उनके सैकड़ों अभंगों में मुखरित हुई है। एक अभङ्ग
में वे कहते हैं—'चाहे मेरे प्राण निकल जायें या रहे मैं दृढ़तापूर्वक पाडुरङ्ग की भक्ति
करता रहूँगा। हे पांडुरङ्ग ! मे तेरी सौगंध लेकर कहता हूँ कि मै तेरे चरण कभी न
छोड़ूँगा। हे केशवराज ! तू मेरा यह प्रण निभा दे।'¹ इस अभङ्ग में तड़प के साथ
निर्धार भी व्यक्त हुआ है।
अन्य एक अभङ्ग में नामदेव कहते है—'हे विट्ठल ! तेरी मार्ग प्रतीक्षा करते
करते मेरी आँखें थक गईं। मेरा कंठ रुँध गया है। तू मेरी माता है अतः तुरन्त आ।
तू पक्षिणी है, मैं अंडज हूँ। मैं क्षुधा से पीड़ित हूँ। तू मुझे भूल-सी गई। तू मेरी हिरणी
है, मैं तेरा बालक हूँ। अतः मुझे दर्शन देकर मेरा भव-पाश दूर कर।'² इस
अभङ्ग में हृदय की व्याकुलता उपमाओं के द्वारा व्यक्त हुई है।
कभी-कभी नामदेव अपने आराध्य-देव के प्रति रोष भी प्रकट करते हैं। यथा—
'तू पतित पावन है ऐसी तेरी कीर्ति सुनकर मैं तेरे द्वार पर आया था। पर अब यह
१. देह जावो अथवा राहो। पांडुरङ्गी दृढ़ भावो।
चरण न सोडी सर्वथा। तुझी आण पंढरीनाथा।
हृदयी अखंडित प्रेम। वदनी तुझे मंगल नाम।
नामा म्हणे केशवराजा। केला नेम चालवी माझा।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १५८१।
२. तूं माझी माउली मी वो तुझा तान्हा। पाजी प्रेम पान्हा पांडुरंगे।
तूं माझी पक्षिणी मी तुझे अंडज। चारा घाली मज पांडुरंगे।
तूं माझी हरिणी मी तुझे पाडस। तोड़ी भव पाश पांडुरंगे॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १५११।

२०८ नामदेव की हिन्दी कविता
देखकर कि तू पतित पावन नही है, मैं लोट रहा हूँ। हे देव! तुम इतने उदार हो कि
बिना लिए कुछ देने नही। तुम जैसे कृपण से मैं क्या याचना करूँ? मालूम नही तेरा
नाम पतित पावन किसने रखा?'' उपर्युक्त अभङ्ग मे प्रेम के साथ व्यङ्ग्य भी प्रकट
हुआ है।
सत नामदेव की रग रग मे उनका आराध्य विठ्ठल समाया हुआ था। वे
उसके अनन्य भक्त थे। विठ्ठल से अधिक इस ससार की कोई वस्तु उन्हे प्रिय नही थी।
वे कहते है— 'न मुझे वैकुण्ठ की चाह है, न कैलास की आकाङ्क्षा। मैने अपनी सब
आकाक्षाए विठ्ठल के चरणो मे अर्पित कर दी है। न मुझ सतान चाहिए, न धन मान,
मेरे लिए तो एक विट्ठल का प्यार ही सब कुछ है।'२
नामदेव विठ्ठल की आराधना मे कितने तल्लीन, कितने तन्मय हो गये थे।
कहत हे— हे पुरुषोत्तम ! मै तेरे प्रेम के कारण तुझमे ही लीन हो गया हूँ। मै देह हूँ
तू उसमे रहने वाला आत्मा है। इस प्रकार हम दोनो एक ही है।'३
नामदेव विठ्ठल की अपेक्षा उसकी भक्ति को अधिक महत्त्व देते थे। वे कहते
हे— हे प्रभु ! तू आप्तकामी है पर तेरे चरण तुझसे भी अधिक मधुर हे। तू परा और
अपरा से परे है। तेरे चरण तेरी महानता के प्रतीक है। मैं अपने मन सहित तेरे चरण
चिंतन के आनंद में डूब गया हूँ और अनेक प्रयत्न करने पर भी मेरा चित्त तेरे चरणो
से अलग नही हो पाता। मेरी वासनाएँ मिट चुकी हैं। हे विठ्ठल ! तू मुझे अपने सेवक के
१. पतित पावन नाम ऐकुनी आलो भी द्वारा। पतित पावन न होसी
म्हणुनी जातो माघारा।
घेतो तेव्हा देसी ऐसा अससी उदार। काय धरूनि देवा तुझे
कृपणाचे द्वार।
सोडी देवा ब्रीद आता न होसी अभिमानी।
पतितपावन नाम तुझे ठेवियले कोणी ?
—सकल सत गाथा, अभङ्ग १७३१।
२ आम्हा स्वर्ग सुख मानू जैसा ओक। देखोनिया तुझा पद्धरीये।
न लगे वैकुंठ न वांधू कैलास। सर्वस्वांची आस देवा पायो ॥
—सकल सत गाथा, अभङ्ग ४४१।
३. नामा म्हणे पुरुषोत्तमा। स्वयें जड़लो तुझ्या प्रेमा।
मी धुडो तू आत्मा। स्वयें दोन्ही।
—सकल सत गाथा अभङ्ग १५२६।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०६
रूप में स्वीकार कर ।'१
नामदेव के मराठी काव्य की आत्मा उनकी हिंदी रचनाओ में भी संक्रमित हुई
और रस भी ज्यों का त्यों प्रवाहित हुआ है। इसके अतिरिक्त अवस्था के अनुसार और
भ्रमण, चिंतन और सामयिक परिस्थिति के परिणाम-स्वरूप उनके विचारो में जो प्रौढ़ता
सहिष्णुता तथा उदारता आ गई थी अर्थात् उनके विचारो मे जो प्रगल्भता आ गई थी
उसका निचोड़ हमें उनकी हिंदी रचना में मिलता है।
नामदेव अपने हृदय की व्याकुलता को 'तालाबेली' शब्द से व्यक्त करते है। यह
व्याकुलता उस प्रकार की है जिस प्रकार की गाय को बछड़े के बिना या मछली को
पानी के बिना होती है।२
एक अन्य स्थल पर ये कहते है कि जिस प्रकार विषयी नर परनारी से प्रेम कर
तड़पता है उसी प्रकार की मेरी 'तालांबली' ( परमात्मा से मिलने की तीव्र
उत्कंठा) है।३
भक्त के प्रेम की तीव्रता का परिचय या अनुभूति नामदेव लोकानुभूत दृष्टांतो
से कराते हैं—'जैसे भूखे को भोजन प्रिय है, जैसे प्यासा जल को ही अपनी प्रमुख
आवश्यकता मानता है, जैसे मूर्ख को अपना कुटुम्ब ही प्रिय है, नामदेव कहते है कि
उपर्युक्त के समान ही नारायण के प्रति मेरी भक्ति और निष्ठा है।'४
१. बाहेरी भीतरी तुजचि मी देखे । वित्त तेणे सुखे वेडावले ।
संत संगे मज पालट हा झाला । पाहता विठ्ठला रूप तुझें ।
मीपणासहित आनंदी बुडालों । न निघे कांही केलें चित्त माझें ।
नामा म्हणे एक उरली से वासना । स्वामी सेवकपण देई देवा ।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १६६८ ।
२. मोहि लागी तालाबेली
बछरे बिनु गाइ अकेली ।
पानीआ बिनु मीनु तलफे
ऐसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद २६ ।
३. जैसे बिखै हेत परनारी, ऐसे नामे प्रीति मुरारी ॥
ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कोड़ा डारत फिरे जुआरी ॥
—वही, पद ५८ ।
४. जैसो भूखे प्रीति अनाज । तुषावंत जल सेती काज ।
मूरिप नर जैसे कुटुम्ब पराइन । ऐसी नामदेव प्रीति नराइण ॥ १ ॥
१४

२१० नामदेव की हिन्दी कविता
संत नामदेव के हिंदी पदो में मधुरा भक्ति की धारा प्रबलता से बहती है ।
अपने आराध्य प्रभु रामचन्द्रजी की बावली बहू बनकर उन्हें रिझाने के लिए नामदेव
शृङ्गार करना चाहते हैं। अपने प्रियतम से मिलने के लिए वे इतने धृष्ट एवं आतुर बन
गये हैं कि उनको लोकनिंदा का भी भय नही। वे तो उनसे डंके की चोट पर मिलना
चाहते हैं।१
उस एक मात्र राम के प्रति ही अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हुए नामदेव
कहते हैं—'जिस प्रकार नाद को श्रवण कर मृग उसमें निरत हो जाता है और मरते
दम तक उसका ध्यान नही टूटता, जिस प्रकार बगुला मछली की ओर दृष्टि लगाये
रहता है, स्वर्णकार सोने का गहना गढ़ते समय एक चित्त रहता है, जिस प्रकार कामी
पर स्त्री की ओर दृष्टिपात करता है और जुआरी अपनी कौडी के फेरे में रहता है
उसी प्रकार मेरी भी दृष्टि उसी एक 'राम' की ओर लगी हुई है। जहाँ देखता हूँ वहाँ
वही है। उसके सिवा और कुछ भी नही है।'२
नामदेव मूलतः भक्त थे। सिर से लेकर पैर तक भक्त। उनका जीवन भक्ति से
सराबोर था। ऐसा भक्त जिसके लिए भगवान ने अपने प्रण को छोड़ दिया, पूरे भक्ति
साहित्य में शायद ही मिले। इस भक्तिभाव का बड़ी ईमानदारी से उन्होंने अपनी हिंदी
रचनाओं में आविष्कार किया है। अपनी भक्ति की प्रामाणिकता का वर्णन करते हुए
नामदेव कहते हैं—'हे परमात्मा ! मुझे तू अपनी भक्ति प्रदान कर। मुक्ति को लेकर
मै क्या करूँगा ? यदि तू अपनी भक्ति न देगा तो मैं अपने शरीर को नष्ट कर दूंगा।
जैसे पर पुरिषा रत नारी । लोभी नर धन कौ हितकारी ।
कामी पुरिष काम रत नारी । ऐसी नामदेव प्रीति मुरारी ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ११५ ।
१. मैं बउरी मेरा रामु भतारु ।
रचि रचि ताकउ करउ सिगारु ॥
भले निंदऊ भले विंदऊ लोगू ।
तनु मनु राम पिआरे जोगू ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१४ ।
२. ऐसे राम ऐसे हेरा । राम छाडि चित अनत न फेरो ॥ टेक ॥
ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कौडा डारत फिरै जुवारी ॥ १ ॥
ज्यूँ पासा डारै पसवारा । सोना घढता हरै सोनारा ॥ २ ॥
जत्र जाउँ तत्र तू ही रामा । चित चिंट्ट्या प्रणवै नामा ॥३॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५८ ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २११
मे जन्म-जन्मांतर में भटकता रहा। अंत में तेरे नाम से मेरा उद्धार हुआ। नामदेव
कहते हैं कि हे परमात्मा ! तू मेरा सर्वस्व है। यदि तू सागर है तो मैं उस सागर में रहने
वाली मछली हूँ।'"
साक्षात्कार की अनुभूति
नामदेव ने निर्गुण निराकार के साक्षात्कार के लिए साकार प्रतिमा
का ध्यान करते हुए भावोत्कट मनः स्थिति में काव्य रचना की। डॉ० रा० द० रानडे
के अनुसार साधक के जीवन मे ऐसी ही भावुकता अपेक्षित होती है।२
कविता प्रयत्न पूर्वक नहीं बनाई जाती। बल्कि चिंतन करते-करते एक ऐसा
क्षण आता है जहाँ चिंतन संबंधी प्रत्येक अभिव्यक्ति कविता बन जाती है। नामदेव की
रचनाएँ इसी प्रकार के काव्य के अंतर्गत आती है।
नामदेव की रचनाओं में अनुभूति की घनता (density) विशेष रूप से प्रतीत
होती है। उस परम तत्त्व का साक्षात्कार होने पर नामदेव को जो अलौकिक आनंद
होता है वह उच्चरित तथा लिखित दोनों रूपों में व्यक्त करने में भाषा असमर्थ है।
भाषा भावों को व्यक्त करने में तब असमर्थ होती है जब अनुभूति घनी हो।
नामदेव कहते हैं कि मुझे परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। 'मैं चाहता हूँ कि
वाद्य बजाकर मैं भगवान से जा मिलूं। भले ही कोई मेरी स्तुति अथवा निंदा करे।
श्रीरंग (प्रभु) से मेरी भेंट निश्चित है।'३
'उन्मनी अवस्था' में उन्हें 'लय योग' की जो अनुभूति हुई उसका वर्णन वे इस
प्रकार करते हैं-'मुझे ईश्वर के दर्शन हुए और झिलमिल प्रकाश दिखाई देने लगा।
अनहद नाद सुनाई दे रहा था। मेरी आत्मज्योति परमात्म-ज्योति में समा गई। अन्तः-
१. भगति आपि मोरे बाबुला। तेरी मुकति न मांगू हरि बीठुला ॥
भगति न आपे तौ तन आडौ । कोटि करै तो भगति न छाँडौ ॥
अनेक जनम भरमतौ फिरयौ । तेरो नाँव ले ले उबरयौ ।
नामदेव कहै तू जीवन मोरा। तू सागर मैं मंछा तोरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४६ ।
2. A mystical life is supremely emotional.
—Mysticiim in Maharashtra P. 26
३. अब जीअ जानि ऐसी बनि आई। मिलऊ गुपाल नीसानु बजाई ॥
असतुति निंदा करै नरु कोई। नामैं श्रीरंगु भेटले सोई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१४ ।

२१२ नामदेव की हिन्दी कविता
करण की कोठरी रत्न के प्रकाश से जाज्वल्यमान हो उठी। वही बिजली भी चमकने
लगी। भगवान को दूरी नही रह गई। आत्मा उसी से प्रापूर हो गई। असख्य दीपज्योति
को मद करने वाले सूर्य्य का प्रकाश छा गया। नामा उसी में सहज समा गया।' १
जो सिद्धावस्था को पहुँचता है उसे सर्वव्यापी परमात्मा जहाँ तहाँ प्रतीत होता
है नामदेव कहते हैं—'विठ्ठल अणु-रेणु में व्याप्त है उसके दर्शन चाहे जहाँ हो सकते
हैं।'२
'मैं उस परमेश्वर की मानस पूजा करता हूँ जो मन्दिर और मसजिद में नहीं
होता।'३
उनका सेवक सेव्य भाव भी जाता रहा। ४
सचमुच नामदेव अभेद भक्ति का आस्वाद ले रहे थे। वे कहते हैं—'हे माधव !
तुम मुझसे बाजी क्यो नही लगाते ? भगवान् से भक्त और भक्त से भगवान् है, अद्वैत
का यही खेल भक्त और तुम्हारे साथ पड़ा है। तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं मंदिर हो और
तुम्हीं पुजारी हो।'५
आगे चलकर वे कहते हैं कि 'मै ही अपनी मानसिक स्थिति को भली भाँति
जानता हूँ। वह किससे कहे ? कौन उसको समझ सकेगा ? मेरे हृदय में पूर्णतया प्रभु
१. जब देखा तब गावा। तउ जन धीरजु पावा।
नादि समाइलो रे सतिगुर भेटिले देवा
जह झिलिमिलो कारु दिसंता।
तह अनहद शब्द अजंता ॥ —सं० ना० हि० प० पद २००।
२. ईभै बीठलु, ऊभै बीठलु, बीठल बिनु ससारु नहो ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिउ तू सरब मही ।
—पंजाबातील नामदेव, पद ३।
३. हिंदू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीत ।
नामै सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सं० ना० हि० प०, पद २०८।
४. प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ३६।
५. बदहु कोन होड माधऊ मोसिऊ ।
ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १६१।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१३
का वास्तव्य है । मेरा मानसिक द्वन्द्व और भ्रम बिलकुल नष्ट हुआ है। मैं राम में समा
गया हूँ ।'१
अभेद भक्ति की अनुभूति कितनी बढ़िया उपमाओं द्वारा करायी गई है। 'पर-
मेश्वर सर्वव्यापी है । जैसे शीशे में देखने वाले को अपना मुँह प्रतिबिंबित दिखाई देता
है वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को सर्वत्र परमात्मा के दर्शन होते हैं ।'२
इस अनुभूति से रंगे हुए नामदेव के पद पारमार्थिक भाव-गीत ( Metaphy-
sical lyrics ) हैं ।
नामदेव की कविता में रस
नामदेव की कविता भक्ति रस परिप्लुत है । भरत की रस व्यवस्था में भक्ति
को स्थान नही था । रूप गोस्वामी तथा मधुसूदन सरस्वती ने भक्ति को रस व्यवस्था
में न केवल स्थान ही दिला दिया अपितु उसको प्रधानता भी दिलवाई । शरणागति
( Submission ) भक्ति का स्थायी भाव है । नामदेव की वाणी मानो भक्ति रस की
मंदाकिनी है । उत्कट प्रेमाभक्ति का उदाहरण देना हो तो कहेंगे 'यथा नामदेवस्य ।'
नामदेव के विट्ठल प्रेम में याचक की आर्तता तथा चातक की अनन्यता है।
उनके मराठी के अभंगों तथा हिंदी के पदों में भक्ति तथा वात्सल्य रस परस्पर विलीन
हो गये हैं । मराठी के भक्त कवियों की यह विशेषता है कि वे अपने आराध्य विट्ठल
का माता के रूप में स्मरण करते हैं । उनके लिए वह वात्सल्य सिंधु है, करुणा का
सागर है ।
यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाय तो वात्सल्य भक्ति अन्य सब
प्रकार की भक्तियों से उच्च प्रतीत होगी क्योकि वात्सल्य भाव में किसी प्रकार के
स्वार्थ की गन्ध तक नही होती । यह एक व्यापक भाव है क्योकि इसको स्थिति प्राणि-
मात्र में होती है । केवल वात्सल्य ही भक्ति का सर्व शुद्ध भाव है जिसमे न तो विरक्ति
की भावना है, न इंद्रिय सुख की कामना हो । इसमें लोक धर्म का भी उल्लंघन नही है ।
१. मनकी बिरथा मनु ही जाने कै बूझन आगे कहीए ।
अन्तरजामी रामु रमाई मैं डर कैसे चहीए ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५६ ।
२. ऐसो रामराई अन्तरजामी । जैसे दरपन महि बदन पहानी ।
बसै घटाघट लेपन छीपै । बन्धन मुकता जानु न दीसै ॥
पानी माहि देखु मुखु जैसा । नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५७ ।