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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 332 में से

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पृष्ठ 204

२१० नामदेव की हिन्दी कविता
संत नामदेव के हिंदी पदो में मधुरा भक्ति की धारा प्रबलता से बहती है ।
अपने आराध्य प्रभु रामचन्द्रजी की बावली बहू बनकर उन्हें रिझाने के लिए नामदेव
शृङ्गार करना चाहते हैं। अपने प्रियतम से मिलने के लिए वे इतने धृष्ट एवं आतुर बन
गये हैं कि उनको लोकनिंदा का भी भय नही। वे तो उनसे डंके की चोट पर मिलना
चाहते हैं।१
उस एक मात्र राम के प्रति ही अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हुए नामदेव
कहते हैं—'जिस प्रकार नाद को श्रवण कर मृग उसमें निरत हो जाता है और मरते
दम तक उसका ध्यान नही टूटता, जिस प्रकार बगुला मछली की ओर दृष्टि लगाये
रहता है, स्वर्णकार सोने का गहना गढ़ते समय एक चित्त रहता है, जिस प्रकार कामी
पर स्त्री की ओर दृष्टिपात करता है और जुआरी अपनी कौडी के फेरे में रहता है
उसी प्रकार मेरी भी दृष्टि उसी एक 'राम' की ओर लगी हुई है। जहाँ देखता हूँ वहाँ
वही है। उसके सिवा और कुछ भी नही है।'२
नामदेव मूलतः भक्त थे। सिर से लेकर पैर तक भक्त। उनका जीवन भक्ति से
सराबोर था। ऐसा भक्त जिसके लिए भगवान ने अपने प्रण को छोड़ दिया, पूरे भक्ति
साहित्य में शायद ही मिले। इस भक्तिभाव का बड़ी ईमानदारी से उन्होंने अपनी हिंदी
रचनाओं में आविष्कार किया है। अपनी भक्ति की प्रामाणिकता का वर्णन करते हुए
नामदेव कहते हैं—'हे परमात्मा ! मुझे तू अपनी भक्ति प्रदान कर। मुक्ति को लेकर
मै क्या करूँगा ? यदि तू अपनी भक्ति न देगा तो मैं अपने शरीर को नष्ट कर दूंगा।
जैसे पर पुरिषा रत नारी । लोभी नर धन कौ हितकारी ।
कामी पुरिष काम रत नारी । ऐसी नामदेव प्रीति मुरारी ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ११५ ।
१. मैं बउरी मेरा रामु भतारु ।
रचि रचि ताकउ करउ सिगारु ॥
भले निंदऊ भले विंदऊ लोगू ।
तनु मनु राम पिआरे जोगू ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१४ ।
२. ऐसे राम ऐसे हेरा । राम छाडि चित अनत न फेरो ॥ टेक ॥
ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कौडा डारत फिरै जुवारी ॥ १ ॥
ज्यूँ पासा डारै पसवारा । सोना घढता हरै सोनारा ॥ २ ॥
जत्र जाउँ तत्र तू ही रामा । चित चिंट्ट्या प्रणवै नामा ॥३॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५८ ।