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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२१४ नामदेव की हिन्दी कविता
वात्सल्य रस का विश्लेषण
स्थायी भाव —सन्तान विषयक प्रेम
आलंबन —नामदेव
आश्रय —विट्ठल
उद्दीपन —नामदेव का रूठना,
विट्ठल से दूध पीने के लिए हठ करना ।
अनुभाव —नामदेव का पुलकित होना, विलाप करना,
विट्ठल से बातें करना, आह भरना ।
संचारी —निर्वेद, ग्लानि, शंका, दीनता आदि ।
नामदेव भक्त और भगवान् का सम्बन्ध माता और बालक का-सा मानते हैं । वे
कहते हैं—'हे विट्ठल ! तू मेरी मैया है और मैं तेरा बालक हूँ । मुझे स्तन पान करा ।'¹
'विट्ठल रूपी माता पुत्र वत्सल है । उसका अन्तःकरण बहुत कोमल है । उसका
स्मरण करते ही वह अपने भूखे बालक को स्तन पान कराती है ।'²
अपने एक हिन्दी पद में नामदेव कहते हैं—'बालक यदि रोदन भी करे तो
माता उसको विष कैसे पिला सकती है ?'³
'मेरो माता तथा पिता तू ही है । हे हरि !

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१५
शांत रस
संसार की असारता, उसको वस्तुओ की नश्वरता तथा परमात्मा के स्वरूप का
ज्ञान होने से चित्त को ऐसी शांति मिलती है जो संसार के विविध सुखो के उपभोग से
कभी नही मिलती । इसी शांति का वर्णन पाठक या श्रोता के हृदय में 'शांत' रस की
उद्भावना करता है ।
नामदेव एक साक्षात्कारी संत थे । अतः अपने आराध्य पंढरी के विट्ठल के प्रति
उनके हृदय में असीम अनुराग था । इस तथ्य के आधार पर शांत रस की निष्पत्ति इस
प्रकार होगी—
(१) स्थायी भाव—निर्वेद, संसार के विषयों से उदासीन होना ।
(२) आलंबन—विट्ठल अथवा भगवान के अवतार ।
(३) उद्दीपन—गुरु उपदेश, मंदिर का द्वार घूमना,
भगवान का दूध पीना आदि ।
(४) अनुभाव—गद्गद होना, सिहाना आदि अनुभाव है ।
(५) संचारी भाव—स्मरण, हर्ष, सभी के प्रति सौहार्द आदि ।
अपने एक अभंग में नामदेव कहते है कि 'यह संसार क्षणभंगुर है, असार है ।
पानी के पृष्ठभाव पर दिखाई देने वाले बुलबुले देखते-देखते नष्ट हो जाते हैं । यही हाल
इस संसार का है । वह जादूगर के इन्द्रजाल के समान है । संसार असार है सार रूप
केवल हरि का नाम है ।'१
हिंदी के एक पद में अपने मन को संसार की अनित्यता से सचेत करते हुए
कहते हैं—'रे मन ! संसार माया जाल है । तू आवागोन के फेर में फँसा हुआ है, काल
का पंजा सदैव तेरे सिर पर है । यौवन रूपी धन पर तू गर्व न कर । आत्मा शरीर रूपी
पिंजरा छोड़ जायेगी तो केवल मुट्ठी भर राख रह जायेगी । हे त्रिलोचन ! तू यहाँ चार
दिन का मेहमान है ।'२
१. जली बुडबुडे देखता देखता । क्षण न लागता दिसेनाती ।
तैसा हा संसार पाहता पाहता । अंतकाली हाता काय नाही ॥
गारुडयाचा खेल दिसे क्षण भर । तैसा हा संसार दिसे खरा ।
नामा म्हणे तेथें कांही नसे बरे । क्षणाचें हे सर्व हरें आहे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १६५७ ।
२. रे मन पंछीया न परीस पिंजरे । संसार माया जाल रे ।
येक दिन मै तीन फेरा । तोहि सदा झंपै काल रे ॥ टेक ॥
धन जोबन रूप देखि करि । गरब्यो कहाँ गंवार रे ।
कुंभ काचौ नीर भर्यो । बिनसता नहो बार रे ॥ १ ॥

२१६ नामदेव की हिन्दी कविता
करुण रस
प्रिय व्यक्ति के पीड़ित या गत होने, प्रिय वस्तु के वैभवविहीन होने अथवा
अप्रिय व्यक्ति वा अनिष्ट वस्तु के प्राप्त होने से हृदय को जो क्षोभ या क्लेश होता है
उसी की व्यंजना से करुण रस की उत्पत्ति होती है।
(१) स्थायी भाव—शोक
(२) आलंबन—संत ज्ञानेश्वर का समाधि-ग्रहण
(३) आश्रय—संत जन
(४) उद्दीपन—उनके सहवास की स्मृतियाँ
(५) अनुभाव—रोना, प्रलाप, विवर्णता, स्तंभ आदि ।
(६) संचारी—निर्वेद, ग्लानि, स्मृति, विषाद, चिंता, दैन्य आदि ।
'ज्ञानदेव की समाधि' नामक प्रकरण में करुण रस चरम उत्कर्ष को पहुँच गया
है। नामदेव ने बड़ी तन्मयता से इस घटना का वर्णन किया है। ज्ञानियों का वह राजा,
योगियों का सखा जीवित समाधि ग्रहण करेगा, यह ज्ञान-रत्न फिर दिखाई न देगा इस
कल्पना से नामदेव विचलित हुए ।
'जैसे मछली पानी के बिना तड़पती है वैसे ही ज्ञानदेव के वियोग की कल्पना से मैं
व्याकुल हो रहा हूँ। दश-दिशाएँ उदास हैं मानो वे भी शोक कर रही हों। मेरे
प्राण ज्ञानेश्वर के लिए तड़प रहे हैं। एक महान् योगी के प्रयाण से मुझे ऐसा लगता
है कि मेरा सब कुछ लुट गया। मैं शोक-सागर में डूब गया ।' '
भनत नामदेव सुनूँ हो तिलोचन । घटि दया ध्रम पालि रे ।
पाहुना दिन च्यारी फेरा । सुकृत राम संभारि रे ॥ २ ॥
—सं० ना० हि० प० पद ७५ ।
१. कासावीस प्राण मन तलमली ।
जैसी का मासोली जीवनाविण ॥ १ ॥
दाही दिशा वोस वाटती उदास ।
करिताती सोस मनामाजी ॥ २ ॥
धातियेली घोण प्राण आला कंठी ।
ज्ञानदेवा साठी तलमली ॥ ३ ॥
नामा म्हणे देवा वाटतसे खंती ।
चालली विभूती योगियांची ॥ ४ ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०५६ ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१७
'चील जब घोंसले को सदा के लिए छोड़ जाती है तब उसके बच्चे अनाथ हो
जाते हैं। संत ज्ञानेश्वर के महानिर्वाण पर सारे संत अनाथ हो गये।' १
नामदेव की कविता का कला पक्ष
गीति काव्य—आधुनिक गीतिकाव्य पश्चिम की देन है। नामदेव का प्रत्येक
अभंग गीति अथवा गीति काव्य का सुन्दर आदर्श प्रस्तुत करता है। गीति काव्य वेदना
का विस्फोट है। वर्डस्वर्थ ने 'भाव' को प्रधानता देते हुए लिखा है कि 'काव्य शांति के
समय स्मरण किए हुए प्रबल मनोवेगों का स्वच्छंद प्रवाह है।' ३ वर्डस्वर्थ की यह परि-
भाषा समग्र काव्य की अपेक्षा गीति काव्य पर अधिक खरी उतरती है।
श्रीमती महादेवी वर्मा की २ गीत की परिभाषा भी गीति काव्य के स्वरूप पर
प्रकाश डालने में समर्थ है।
एक आलोचक के अनुसार 'भावों अथवा 'मनोवेगों' के आवेशपूर्ण आग्रह को
आत्माभिव्यंजन कहते हैं। गीति काव्य में प्रत्यक्ष आत्माभिव्यंजन का अवसर होता है।
प्रगीत, गीत अथवा गीति काव्य को हम गेय मुक्तक कहेंगे। अंग्रेज़ी में इसे 'लिरिक'
( lyric ) कहते हैं। अंग्रेज़ी आलोचना संबंधी ग्रन्थों में 'लिरिक' के गेय तत्त्व पर
जोर दिया गया । ४
गीति काव्य में स्वतः स्फूर्ति (spontaniety) की मात्रा कुछ अधिक होती है।
मनोवेग अथवा भावावेश उसका प्रेरक होता है।
गीति काव्य का कवि जो कुछ कहता है अपने निजी दृष्टिकोण से लिखता है।
१. नामा म्हणे देवा घार गेली उडोन ।
बालें दानादान पडियेली ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०६७।
2. Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings. It
takes its origin from emotion recollected in tranquility.
३. साधारणतः गीत व्यक्तिगत सीमा में तीव्र सुखदुःखात्मक अनुभूति का वह शब्द-रूप
है जो अपनी ध्वन्यात्मकता में गेय हो सके।
—महादेवी का विवेचनात्मक गद्य, पृ० १४७।
4. Lyric poetry, as the name implies, is poetry originally intended
to be accompanied by the lyre or by some other instrument of
music. The term has come to signify any out-burst in song
which is composed under a strong impulse of emotion or inspi-
ration.
—Judgment in Literature—p. 97.

२१८ नामदेव की हिन्दी कविता
उसमें निजीपन के साथ रागात्मकता रहती है। यह रागात्मकता आत्मनिवेदन के रूप
में प्रकट होती है। रागात्मकता में तीव्रता बनाये रखने के लिए उसका अपेक्षाकृत छोटा
होना आवश्यक है। आकार की इस संक्षिप्तता के साथ भाव की एकता और अन्विति
लगी रहती है। छोटेपन की सार्थकता भाव की अन्विति में है। गीति काव्य में विवि-
धता रहती है किंतु वह प्रायः एक ही केन्द्रीय भाव की पुष्टि के लिए होती है। यह
केन्द्रीय भाव प्रायः टेक में रहता है और बार-बार दुहराया जाता है। इस प्रकार
प्रभाव घनीभूत होता रहता है और भाव की अन्विति भी हो जाती है।
गीति काव्य के इन लक्षणों पर नामदेव के अभंग पूरे उतरते हैं। गीति काव्य
में कवि आत्माविष्कार करता है। यही कारण है कि नामदेव की रचना आत्मलक्षी,
विषयोगत (subjective) है। अंग्रेजी के सुविख्यात निबंधकार ए० जी० गार्डिनर का
यह कथन 'It is myself portray' नामदेव की कविता पर पूरी तरह से लागू
होता है।
स्वयं नामदेव ही अपनी कविता के विषय हैं। घर के लोगो द्वारा उनकी विट्ठल
भक्ति का विरोध, मुक्ताबाई द्वारा उनकी भर्त्सना, 'तीर्थावली' में उनका और ज्ञानेश्वर
का वार्तालाप, आत्मसुख की प्राप्ति की उनकी व्याकुलता आदि अवसरों पर नामदेव
द्वारा रचित अभंग उनके भावुकता भरे हृदय के साक्षी हैं।
नामदेव का अलंकार विधान
अप्रस्तुत योजन काव्य का अभिन्न अंग है। काव्य के दो पक्ष होते हैं—भाव तथा
कला पक्ष। ये दोनो अन्योन्याश्रित हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना सम्भव नहीं
है। काव्य में कलात्मकता और रमणीयता का संचार करने का समस्त श्रेय और दायित्व
अप्रस्तुत योजना पर है। कवि के लिये अप्रस्तुत योजना की शक्ति प्रकृति का बड़ा
भारी वरदान है।
नामदेव के लिए काव्य रचना एक साधन था, साध्य नहीं। फिर भी उनकी
कविता में अलंकार स्वतः सिद्ध हैं। उनकी रचनाओ में केवल उन्ही अलंकारों का बाहुल्य
है जिन की योजना, कवि की प्रतिभा अज्ञात रूप से भावो को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए,
किया करती है। उनके काव्य में उपमा, रूपक अनुप्रासादि अलंकारों की प्रचुरता का
यही कारण है।
शब्दालंकार
अनुप्रास—अनुप्रास के कितने ही उदाहरण नामदेव की कविता में अनायास ही
मिल जाते हैं—

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१६
(१) असुदान गजदान ऐसो दानु नित नित हि कीजे । पद ६१
इसमें 'असुदान गजदान' में 'द' तथा 'न' की तथा 'दानु नित नित ही' में 'न'
की एक एक बार आवृत्ति है ।
(२) देवा बेनु बाजे गगन गाजे । शब्द अनाहद बोने ॥ पद ६५
इस काव्य पंक्ति के प्रथमार्ध 'न' तथा 'ज' की दो बार आवृत्ति हुई है तथा
द्वितीयार्ध में 'द' की दो बार ।
उपर्युक्त दो उदाहरणों में अनेक वर्णों की एक बार और कभी दो बार समता
हो जाने से छेकानुप्रास अलंकार हो गया है ।
(३) जोगी जन न्याइ जुगे जुगि जीवै । (पद ६७)
ज कार का तालु स्थान होने से यह श्रुत्यनुप्रास है ।
श्रुत्यनुप्रास वहाँ होता है जहाँ कण्ठ, तालु आदि किसी एक ही स्थान से उच्च-
रित होने वाले वर्णों में समानता पायी जाय ।
उपमा
निम्नलिखित पद में उपमाओं की सुन्दरता देखिए—
ऐसो रामराई अंतरजामी । जैसे दरपनमहि बदन पछानी ॥
बसै घटाघट लीपन छीपै । बंधन मुकता जातु न दोपै ॥
पानी माहि देखु मुखु जेहा । नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥
परमेश्वर सर्वव्यापी है परन्तु जैसे शीशे में देखने वाले को अपना मुँह प्रतिबि-
बित हुआ दिखाई देता है वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को सर्वत्र परमेश्वर के दर्शन होते हैं । सिद्ध
अथवा ब्रह्मज्ञानी को जाति की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए । वह जाति-पाँति के बंधन
के परे होता है । जैसे जल में अपना प्रतिबिंब दीख पड़ता है वैसे ही बंधन-मुक्त को सब
प्राणियों के हृदय में परमात्मा दिखाई देता है ।
कम से कम नामदेव तो अपने स्वामी विट्ठल का दर्शन सब जगह करते हैं ।
अभेद-भक्ति की अनुभूति कितनी बढ़िया उपमाओं के द्वारा कराई गई है । संत नामदेव
जितने ऊँचे भक्त थे उतने ही ऊँचे कवि भी थे ।
नामदेव को अपने इष्टदेव के दर्शन की उत्कंठा लगी हुई है । इसे वे 'तालावेली'
शब्द से परिचित कराते हैं, जिसका अर्थ है व्याकुलता । यह ऐसी व्याकुलता है जिसमें
तीव्रता है—आतुरता है । वे कहते हैं—
मोहि लागी तालावेली
बछरे बिन गाइ अकेली
पानीआ बिनु मीनु तलफै
ऐसे नाम-रामा बिनु बापुरो नामा ॥

२२० नामदेव की हिन्दी कविता
यह तालाबेली उस प्रकार की है जिस प्रकार गाय को बछड़े के बिना होती
है और मछली को पानी के बिना होती है।
नामदेव ने उपमानो का चयन जन जीवन से किया है। इसलिए उनकी उपमाएँ
आकर्षक बन पड़ी है।
रूपक
जैसे जैसे सत नामदेव की आध्यात्मिक योग्यता बढ़ती गई वैसे ही उनकी
काव्य प्रतिभा भी प्रौढ़ होती गई। वे आध्यात्मिक रूपको से अपनी कविता को सजाने
लगे। यहाँ उनके पदो को उद्धृत करने के मोह का संवरण नही किया जाता।
बढ़िया रूपको का आस्वाद लीजिये—
मन मेरे गजू जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटउ जम की फासी ॥
कहा करउ जाती कहा करउ पाती ॥
राम को नाम जपउ दिनराती ॥
रागनि रागउ सीवनि सीवउ ॥
रामनाम बिनु घरीअ न जीवऊ ॥
भगति करउ हरि के गुन गावउ ॥
आठ पहर अपना खसम धिआवऊ ॥
सुइने की सुई रूपे का धागा ॥
नामे का चितु हरि सउ लागा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ४।
सत नामदेव दर्जी थे अतः उन्होंने दर्जी के व्यवसाय से संबद्ध रूपक उपर्युक्त पद
में प्रयुक्त किया है। वे कहते है कि मन रूपी गज और जिह्वा रूपी कैंची की सहायता
से मैं यम की फाँस धीरे धीरे काट रहा हूँ। जाति पाँति से मुझे कोई सरोकार नहीं।
दिन रात में कपड़ा सीने तथा रंगने का व्यवसाय करता हूँ परन्तु राम नाम का स्मरण
किये बिना में एक क्षण भी नही रह सकता। मेरी सुई सोने की है तथा धागा रूपे का
है। मेरा मन हरि की ओर लगा है। नीचे के पद में एक अधिक सरस रूपक का
आस्वाद लीजिये —
लोभ लहरि अति नीझर वाजे । कइआ डूबे केसवा ॥
ससार समुद्रे तारि गोविंद । तारिले बाप बीठुला ॥
अनिल बेड़ा हऊ खेवि न साकऊ । तेरा पारु न पाइआ बीठुला ॥
होहु दइआलु सतिगुरु मेलि । तू मोकऊ पारि उतारे केसवा ॥

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२१
नामा कहै हऊ तरि भी न जानऊ।
मोकऊ बाह देहि बाह देहि बीठुला ॥
हे प्रभो ! संसार रूपी सागर में लोभ रूपी लहरें इतनी भयावह है और उनकी
आवाज इतनी आतंकपूर्ण है कि मेरी नाव उनमें डूब जाने का भय लगता है । नामदेव
कहते हैं कि हे विट्ठल ! मैं तैरना नहीं जानता । तू मुझे बाँह दे । कितने समुचित रूपकों
द्वारा नामदेव अपना आशय व्यक्त करते हैं ।
दृष्टांत
नामदेव ने दुरूह-तम दार्शनिक तथा आध्यात्मिक अनुभूतियों को बोधगम्य
बनाने के लिए दृष्टांतों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया है ।
(१) ऐसे रामहि जानौ रे भाई ।
जैसे भृङ्गी कीट रहै ल्यो लाई ॥टेक॥ पद ५७
एकांतिक भक्ति किस प्रकार की जाय, यह एक दृष्टांत द्वारा समझाते हैं ।
नामदेव कहते है—'हे भाई ! जैसे भृङ्गी कीट से लौ लगाये रहती है वैसे तुम राम से
लौ लगाओ ।'
(२) ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कोडा डारत फिरै जुआरी ॥
ज्यूँ पासा डारै पववारा । सोना घड़ता हरै सोनारा ॥ पद ५८
ईश्वर भक्ति में चित्त किस तरह एकाग्र हो, यह बात नामदेव दृष्टांतों द्वारा
समझाते हैं ।
जैसे कोई कामात्त परस्त्री की ओर देखता है, जैसे कोई जुआरी बड़े शोक से
पांसा डालता है, जैसे सुनार सोने का जेवर बनाते समय उसमें से थोड़ा-सा सोना
उड़ा लेता है, उसी प्रकार हमारा सारा ध्यान परमात्मा पर केंद्रित हो ।
नामदेव की उपमाओं की भाँति उनके दृष्टांत भी जन-जीवन से संगृहीत हैं ।
ये दृष्टांत व्यापार-साम्य और गुण-साम्य संपन्न होने के कारण प्रभावशाली और रोचक
बन गये हैं ।
विभावना
विभावना में कारणान्तर की कल्पना की जाती है । गगन-मण्डल (मस्तक) के
सहस्राधार में प्राणों के पहुँचने पर अनहद-नाद का और अमृत के झरने का कैसा
अनुभव होता है, इसे विभावना द्वारा समझाते हैं—
"अणमड़िया मंदलु बाजै
बिनु सावन घनेहरू गाजै
बादल बिनु बरखा होई ।" —सं०ना० हिं० प०, पद १५४ ।

२२२ नामदेव की हिन्दी कविता
बिना मढा मृदंग बजता है, बिना सावन के, बिना बादल के वर्षा होती है।
सचमुच नामदेव के अलंकार अनुभूति को रूप देने के लिए हैं—हृदयंगम कराने
के लिए हैं : इनमें कही चमत्कारिता नही है ।
उदाहरण
काल हमारे सुख का कभी भी अंत कर सकता है। मछली पानी में रहती है।
वह समझती है कि वह सुरक्षित और सुखी है, परन्तु अचानक जाल रूपी काल में फँस
जाती है। उसका सुख तिरोहित हो जाता है । इसे 'उदाहरण' से स्पष्ट करते हैं—
जैसे मीनु पानी में रहे
काल जाल को सुधि नही लहै ।
—पञ्जाबातील नामदेव
मधुमक्खी मधु का संचय करती है, क्या वह उसका उपभोग ले पाती है ?
गाय अपने बछड़े के लिए दूध का संचय करती है, पर क्या वह उसके बच्चे को मिल
पाता है ? अहीर गला बाँधकर उसे दुह लेता है :—
जिउ मधुमाखी संचै अपार
मधु लीनो मुखि दीनी छारु ।
गउ बाछरुऊ संचै खीरु
गला बांधि दुहि लैहि अहीरु ।
—पंजाबातील नामदेव ।
इसीलिए नामदेव कहते हैं कि अपने या अपने कुटुम्बियों के लिए धन-संचय
करने में क्यो अपने जीवन को गँवाते हो ? निर्भय होकर भगवान का भजन करो।
मारवाडी को जैसे पानी प्यारा है और ऊँट को जैसे वनस्पति प्रिय है उसी
तरह मुझे मेरा विठ्ठल प्यारा है—
मारवाडि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥
—सं० ना० हि० प०, (२०२)
कितने अनुभूत और सूक्ष्म-भरे उदाहरण हैं ।
उत्प्रेक्षा
नामदेव ने अपने भावो की व्यंजना में सादृश्यमूलक अलंकारों का आश्रय
अधिक लिया है अतः उनकी रचनाओ में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग नही के बराबर
हुआ है।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२३
चित्र विधान
जो काम चित्रकार अपनी तूलिका से करता है वह रेखाचित्रकार शब्दों से
करता है। नामदेव ने कुछ घटनाओं (प्रसंगों) तथा व्यक्तियों के कलापूर्ण रेखा-चित्र
अंकित किये हैं।
प्रसंग वर्णन
कृष्ण का मृत्तिका भक्षण :- कुछ गोप बालक यशोदा से कृष्ण के मृत्तिका
भक्षण की बात कहते हैं। इसपर यशोदा उनको डांटती है। श्रीकृष्ण के खुले मुंह में
जब वह ब्रह्मांड का दर्शन करती है तब आश्चर्यचकित हो जाती है। १
इसके अतिरिक्त "तीर्थयात्रा' के दिनों में नामदेव का अपनी भक्ति के जोरपर
सूखे कुएँ में से पानी निकालना, ज्ञानेश्वर की समाधि, नामदेव का भक्ति गर्व परिहार
आदि प्रसंगों का नामदेव ने कलापूर्ण अंकन किया है।
व्यक्ति चित्र
नामदेव द्वारा धनी-मानी, सगे-सम्बन्धी, धर्मभ्रष्ट, ब्राह्मण, ढोंगी साधु, संत
सज्जन आदि के अंकित चित्र बड़े ही मनोज्ञ हैं।
बगला भक्तों की आलोचना करते हुए नामदेव कहते हैं कि 'नारायण से इनका
मन नही लगता। इनसे संयम का पालन नहीं होता। तालाब में प्रवेश कर शरीर को
स्वच्छ करते है पर इनका अंतःकरण अशुद्ध ही रहता है।"२
आडंबर का भंडा फोड़ करते हैं कि 'वह गुणसागर गोपाल छल-कपट से नहीं
मिलता। गोपीचंद का टीका लगाना तथा गले में माला पहनाना दिखावा मात्र है।'
१. मुलें सांगताती। माती खातो गे श्रीपती ॥
लाकूड घेऊनि हातांत। माती खातो का पुसत ॥
भावा भुललासे खरा। कांपतसे थरथरा ॥
मुख दिये उघडोनि। दावी तेव्हा चक्रपाणी ॥
ब्रह्मांडे देखिली। नामा म्हणे वेड़ी झाली ॥
—अभंग ६६।
२. नराइन सू मन न रंजे। संजम चूके अरु ध्रत पडे।
जलहर पैसि पषाले काया। अंतरि मैल न लउ उतरे ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १०३।

१२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सच्ची भक्ति नही ।'१
मराठी रचनाओं में ऐसे व्यक्तियों के चित्र पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। वेष-
धारी साधु छापा तिलक लगाते हैं और भोले भाले जनों को लूटते हैं।२ वे लोगों से
कहते हैं कि वे हरि के भक्त हैं पर उनका मन घर-गृहस्थी में फँसा रहता है, उससे
विरक्त नही होता ।३
नामदेव द्वारा अंकित मुक्ताबाई का चित्र बहुत सरस बन पड़ा है।४ नामदेव
द्वारा वर्णित प्रसंग तथा उनके बनाये रेखा चित्र उनकी सरल भाषा शैली के प्रमाण हैं।
नामदेव की छंदोरचना
मराठी रचनाओं में प्रयुक्त छंद—प्राचीन मराठी का सारा साहित्य आद्य कवि
मुकुंदराज से लेकर समर्थ रामदास तक पद्यात्मक ही है। 'ओवी' तथा 'अभंग' इन संत
कवियों के प्रिय छंद रहे हैं। लयबद्धता तथा गान सुलभता मराठी के अभंग की विशेप-
ताएँ हैं। इस पर ज्ञानदेव के उत्कृष्ट अभंगों का आदर्श नामदेव के सामने था ही। अत
रचना की सुकरता की दृष्टि से कहिये अथवा अनुकरणशीलता की दृष्टि से कहिये,
नामदेव ने अभंग ही को अपनाया।
अभंग की लंबाई की कोई सीमा नही होती। इसीलिए यह अभंग (अटूट)
कहलाता है। दो से लेकर दो सौ 'चौक' भी एक अभंग में आ सकते हैं। एक अभंग के
चार चरण होते हैं और साढ़े तीन चरणों का एक 'चौक' होता है। इन चरणों में अक्षर
मात्रा और गण का कोई नियम लागू नही होता।
छंद दोष
नामदेव की रचनाओं में यत्र तत्र छंद दोष पाये जाते हैं। वे स्वीकार करते हैं
———
१ कपट मैं न मिलै गोविंद गुन सागर गोपाल ।
गोपी चंदन तिलक बनावै । कठहु लावै माल ॥ टेक ॥
—स० ना० हि० प०, पद १४२ ।
२ टिळे टोपी माला दावी । भोल्या भाविकांसी गोंवी ॥
—अभंग १८३७ ।
३ लोकापुढे सांगे आम्हो हरिभक्त । न होय विरक्त स्थिति ज्याची ।
—सकल संत गाथा, अभंग १८३६ ।
४ लहानशी मुक्ताई जैसी सणकाडी ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२५

कि 'मैं बहुतश्रुत तथा ज्ञानशील नही हूँ ।'¹ अभङ्ग की रचना किस प्रकार की जाय यह
भी मैं नही जानता ।'² कारण यह है कि उन्होने छंदशास्त्र का विधिवत् अध्ययन नही
किया था । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति और
चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छंद, अलंकार, शब्द शक्ति और अन्य काव्य गुण ।
हिंदी रचनाओं में प्रयुक्त छंद
नामदेव की हिंदी रचनाओ में कुछ पद हैं और कुछ साखियां ये छोटे-छोटे छंद
हैं । श्री गुरु ग्रन्थ साहब में संगृहीत नामदेव के ६१ पदों के साथ रागों के नाम
दिये गये हैं। पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की हिंदी पदावली'
में कुछ ही पदों पर रागों के नाम दिये गये हैं, शेष पर नही । इन पदों में गउडी, चैती,
आसा, गूजरी, सोरठि, धनासरी, टोडी, तिलंगु, बिलावलु, रामकली, मारू, भैरउ,
बसंतु, सारंग, मलार, कानडा, प्रभाती आदि राग-रागनियां प्रयुक्त हैं। इस संदर्भ में
डॉ० रामचंद्र मिश्र का मत द्रष्टव्य है ।³
शैली
जैसे भाषा भावो और विचारों का वाहन है वैसे ही शैली का भी ।
क्योकि शैली भाषा के रूप में ही हमारे सम्मुख आती है । शैलीकार का एकमेव लक्ष्य
होता है अपने श्रोता, पाठक या दर्शक को प्रभावित करना । इस उद्दिष्ट की पूर्ति के
लिए शैलीकार का सारा अवधान अपनी शैली के शृंगार पर केन्द्रीभूत होता है ।
नामदेव का काव्य उत्स्फूर्त है, उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति में विलक्षण एक-
रूपता है । उन्होंने अपने एक अभंग⁴ में सांग रूपक के द्वारा पांडुरंग की षोडशोपचार
पूजा का चित्र अंकित किया है । उनकी अनुभूतियां अलंकृत होकर ही अभिव्यक्त होतो
१. नव्हे बहुश्रुत, नव्हे ज्ञानशील । —वही, अभंग ६२४ ।
२. अभंगाची कला नाहो मी नेणत ।
—श्री नामदेव गाथा, अभग, १३८२ ।
३. नामदेव के पदो में गृहीत राग-रागिनियां शास्त्रीय ध्रुपद शैली में गेय रही है
जिनकी दीर्घ परम्परा भारतीय संगीत शास्त्रो में विद्यमान है । इन रागो के अपने
रूप हैं, अपने गान-काल हैं और अपने रस है ।
—हिंदी पद परम्परा और तुलसीदास, पृ० ६५-६६ ।
४. देह देव्हारा पाट हृदय संपुट । मधी कृष्ण मूर्त बसविली ।
प्रेमाचे पाण्यानें प्रक्षालीन तुज । आत्मस्वरूप नि पांडुरंगा ।।
—अभंग, १८०२ ।
१५

२२६ नामदेव की हिन्दी कविता
है। उनकी शैली मानो उनके भावों तथा विचारों की भाषागत अभिव्यक्ति ही है। १
आचार्य कुन्तक ने शैली का सम्बन्ध व्यक्ति के स्वभाव से स्थापित किया है।
वे कहते हैं कि शक्तिमान और शक्ति का भेद नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के सुकु-
मार आदि स्वभाव के अनुकूल ही उसकी शैली होती है। २
संत नामदेव एक सरल हृदय के व्यक्ति थे। उनकी भावुकता का परिचय उनकी
रचनाओं में सर्वत्र मिलता है। परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है, वही सब के बाहर
तथा भीतर सब कहीं व्याप्त है और उसी के प्रति एकनिष्ठ होकर रहना चाहिए। इसीको
वे अपना धर्म मानते हैं। इसी प्रकार के भावों से उनका हृदय सदा भरा रहता है और
इसी कारण वे सारे जगत् को एक उदार-चेता प्रेमी की दृष्टि से देखा करते हैं।
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नहीं लिखा। उनकी रचना
का प्रधान उद्देश्य 'स्वान्तः सुखाय' के साथ ही साथ परोपकार भी था। उसमें लोक-
मंगल पर ही अधिक बल दृग्गोचर होता है। संसार के माया-जाल में फँसे हुए अज्ञ जनों
पर उनको तरस आता था। उनके उद्धार का संकल्प वे इस प्रकार घोषित करते हैं—
'कीर्तन में भक्ति का उपदेश करते हुए आनन्द विभोर होकर मैं नाचूँगा और भक्ति के
ज्ञान का दीप इस प्रकार जलाऊँगा कि पाप रूपी अंधकार नष्ट हो जाये।' ३
'मुझे पते की बात विदित हुई। अब मैं भागवत धर्म का प्रचार करूँगा।' ४
'मैं दुख से भरा हुआ यह संसार सुख-मय करूँगा। मैं संतों के साथ कीर्तन में
अपने उपदेश-परक अभंगों का गान करते समय नाचूँगा।' ५
१. All style is gesture, the gesture of the mind and of the soul.
—Style by Walter Raleigh p. 127.
२. कवि स्वभाव भेद निबंधनत्वेन काव्य प्रस्थानभेद गाहते। वक्रोक्तिजीविति,
प्रथमोन्मेष।
३. नाचूँ कीर्तनाचे रंगीं। ज्ञानदीप लावूँ जगीं।
—सकल संत गाथा, अभंग १३६२।
४. आम्हा सापडले वर्म। करुँ भागवत धर्म।
—सकल संत गाथा, अभंग १४२६।
५. अवघाचि संसार सुखाचा करीन। जरी झाला दुःखाचा दुर्धरु हा।
संत समागमी नाचेन रंगणी। तेणे जाईल निघोनी त्रिविध ताप।
—सकल संत गाथा, अभंग १५०१।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२७
संसारी जनों को चेतावनी
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नही लिखा। उनका प्रमुख
उद्देश्य था सामाजिक प्रबोधन अथवा जागरण। लोक मंगल की भावना ही इसकी प्रेरक
रही है।
किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से सचेत अथवा सतर्क रहने का आदेश या उपदेश
चेतावनी है। नामदेव के काव्य में ऐसी चेतावनियां प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। नामदेव
अपनी अनुभूति के आधार पर कहते हैं—'हे जीव ! तू जाग, तू अपना रास्ता भूल गया
है। हे अज्ञानी ! यह औघट घाट है और तुझे दूर जाना है।'१
'हे मेरे मन ! तू गोविंद के चरणों से लो लगा। हरि को छोड़ अन्यत्र न जा।
बलिराजा के समान श्रेष्ठ राजा भी चार युग तक न जिये। 'मेरा मेरा' कहनेवाले अंत
में संसार को छोड़कर चले गये।'२
'हे नर ! मनुष्य जन्म पाकर भी तू सचेत नही होता। काल का पंजा सदैव
तेरे सिर पर है!'३
'नामस्मरण कर मैं भव सागर पार हुआ। हरिभजन के बिना तू आवागौन के
फेर से मुक्त न होगा।'४
उनकी कथन शैली की विशेषता उनके छल-हीन हृदय, निद्वंद्व जीवन एवं
आध्यात्मिक उल्लास द्वारा अनुप्राणित है और वह बिना सुझाये ही विदित हो जाती है।
ईश्वरोन्मुख होने के लिए नामदेव ने कतिपय प्रेरणाएँ दी हैं जिनके द्वारा कोई भी
व्यक्ति भगवद्भक्त हो सकता है।
१. जागि रे जीव कहा भुलाना। आगे पीछे जाना ही जाना॥
भगत नामदेव चेति अयाना। औघट घाट अरु दूरि पयोना॥
—पद १२२।
२. मन मंझा तू गोविंद चरन चित लाइ रे।
हरि तजि अनत न जाइ रे॥ टेक॥
—१०५।
३. मनिषा जनम आई र्नहि चेता। अंधे पसु गंवांरा।
तेरे सिर काल सदा सर साधै। नामदेव करत पुकारा रे नर॥
—पद ६२।
४. नामदेव उतरयो पार। चेतहु रे चेतनहार।
हरि की भगति बिन। औतरोगे बारंबार॥
—पद ६८।

२३८ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव का नाम महाराष्ट्र के विख्यात 'संत पंचायत' अर्थात् पाँच प्रमुख संतो
के समुदाय में लिया जाता है। उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध संत कबीर ने उनके प्रति
श्रद्धा के भाव प्रदर्शित करते हुए कहा है—'जिस प्रकार पहले युगों में भक्त उद्धव,
अक्रूर, हनुमान, शुकदेव तथा शंकर हुए थे उसी प्रकार कलि काल में नामदेव तथा
जयदेव का आविर्भाव हुआ था।'१
संत नामदेव में संत ज्ञानेश्वर जैसा काव्यरचना का भाव जागृत नहीं था। वे
विद्वान नहीं थे। उनका साहित्यशास्त्र का अध्ययन भी नहीं था। परन्तु उनका हृदय
स्वाभाविकता से कवि का था। वे अतीव संवेदनक्षम थे। दूसरों के प्रति उनके हृदय में
तड़पन, दया और प्रेम था। अतः उनके अभंगों की आत्मा भावना है न कि कल्पना।
भावोद्भूत काव्य रस प्रधान होता है न कि अलंकृत। 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' के
अनुसार यह श्रेष्ठ काव्य है। यह पूर्णतया कोमल है। सुकुमारता इसकी प्रकृति है। यह
भक्ति, शांत और करुण रस से ओतप्रोत है। यह उचित शब्दालंकार तथा अर्थालंकार
को धारणा करता है परन्तु कृत्रिम अलंकारों की अपेक्षा स्वाभाविक सुकुमारता तथा
मधुरता की ओर वह अधिक झुका है। संत नामदेव के फुटकर अभङ्ग उनके हृदय में
न समा सकने वाले भक्ति-भाव और प्रेम-रस से लबालब हैं। वे तो भक्ति रस की वर्षा
से सारे महाराष्ट्र को आप्लावित करने को आतुर थे। इसीलिए संत ज्ञानेश्वर ने
कहा था कि 'नामदेव का सरल कथन भी कवित्व है और उसका रस अद्भुत तथा
निरुपम है।'२
अन्य एक स्थान पर वे कहते हैं—'हे नामदेव ! तुम्हारे रस भरे वचन सागर
से भी अथाह हैं। उनके अनुशीलन से नित नया आनंद प्राप्त होता है।'३ इससे अधिक
क्या प्रशंसा हो सकती है ?
पिछली शताब्दी के मार्मिक समीक्षक स्व० प्रो० वा० ब० पटवर्धन ने नामदेव
१. जागे सुक उद्धव अक्रूर हणवंत जागे से लंगूर ।
संकर जागे धरन सेष, कलि जागे नामा जैदेव ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३०२ ।
२. परि नामयाचे बोलणें नव्हे हे कवित्व । हा रस अद्भुत निरुपमु ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२७ ।
३. सिंधूनि सखोल सरस तुझे बोल । आनंदाची डोल नित्य नवी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ६२५ ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१६
की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।१
संत नामदेव का असाधारण कर्तृत्व
संत नामदेव एक महान् भगवद् भक्त हुए। महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के
वे प्रभावशाली प्रवर्तक थे। इस संप्रदाय के संतों के वे आद्य चरित्रकार हैं। 'नाम वेद'
के प्रमुख प्रचारक हैं। प्रेमाभक्ति के प्रणेता हैं। सांप्रदायिकों के श्रद्धा स्थान हैं।
कीर्तन प्रथा के तो एक प्रकार से वे अध्वर्यु ही हैं।
१३ वीं शताब्दी में उत्तरी भारत पर मुसलमानों का आतंक छाया हुआ था।
ऐसी परिस्थिति में नामदेव ने भागवत धर्म का झंडा उत्तर भारत मे फहराया। वे
निर्गुण मत के प्रथम प्रचारक तथा हिंदी गीत शैली के प्रथम गायक कहे जा सकते हैं।
उन्होंने अपने उपदेशों से कबीर तथा अन्य परवर्ती संतों का मार्ग प्रशस्त किया। इस
संदर्भ में आचार्य विनयमोहन शर्मा२ तथा प० परशुराम चतुर्वेदी३ के मन्तव्य उल्लेखा-
नीय हैं।
१. 'नामदेव की कविता में हमें उस प्रकाश के रोमांच का अनुभव होता है जो समुद्र
या धरती पर कभी नहीं उतरा। उसमें हमे उस स्वप्न के दर्शन होते हैं जो इस
मिट्टी के धरती पर कभी नही झलका, उस प्रेम की प्रतीति होती है जिसने वासना
को कभी उत्तेजित नही किया। उसमे वो करुणा, विश्वास और भक्ति का रोमांच
है तथा मानव आत्मा का परमात्म शक्ति के प्रति आत्मसमर्पण है। उसमें हम
भक्ति अथवा आध्यात्मिक प्रेम का रोमांच, हृदय का हृदय के प्रति संगीतमय
निवेदन और उद्वेलित भावातुर हृदय के उद्गार पाते है।'
—विल्सन फिलालॉजिकल व्याख्यान माला।
२. 'उनमें उत्तरी भारत की संत परम्परा का पूर्व आभास मिलता है। उनके परवर्ती
संतो पर निश्चय ही उनका प्रभाव पड़ा है जिसे उन्होंने सर्व भाव से स्वीकार किया
है। ऐसी दशा में उन्हे उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का प्रवर्तक मानने में हमे
कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। संभवतः हिंदी जगत् तक उनके सम्बन्ध मे
पर्याप्त जानकारी न पहुँच सकने के कारण उन्हें वह स्थान नहीं प्राप्त हो सका
जिसके वे अधिकारी हैं।'
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृ० १२६।
३. 'किन्तु इतना हम निःसंकोच भाव के साथ कह सकते हैं कि उत्तरी भारत
के संत भी नामदेव के बहुत ऋणी है और उनके लिए (तथा महाराष्ट्र के संतो
के लिए भी) सन्त नामदेव ने एक पथ प्रदर्शक का काम किया है।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १०७।

२३० नामदेव की हिन्दी कविता
उन दिनो प्रचार के इतने साधन उपलब्ध न होते हुए भी नामदेव ने जो कार्य
किया उसे देखकर हम आश्चर्यचकित होते है। उन्होंने यह सब कुछ भक्ति के प्रचार
के लिए किया, इसमें उनका कोई स्वार्थ नही था। वे परमात्मा से यही प्रार्थना करते
है कि संत सदा सुखी हो, हरि के भक्तों को दीर्घायु प्राप्त हो तथा जिनकी जिह्वा पर
पाडुरंग का नाम है, उनका कल्याण हो।
नामदेव की लोकप्रियता का प्रमाण इसीसे मिलता है कि निम्नलिखित परवर्ती
संत कवियो ने आदर के साथ उनका स्मरण किया है—
(१) गुरु परसादी जैदेव नामा। भगति के प्रेम इन्हहि है जाना।
—कबीर
(२) नामा कबीर सु फोन पे गुन राश बाँका।
भगति समानी सब घरति तजि कुल काना मा॥
—रज्जबजी
(३) जैसे नाम कबीरजो यों साधु कहाया।
आदि अंत सौ आइके राम राम समाया॥
—सुन्दरदास
(४) नामदेव कबीर जुलाहो जन रैदास तिरे।
दादू बेगि बार नहिं लागे, हरि सौं सबै खरे॥
—दादू दयाल
(५) धू प्रहलाद, कबीर, नामदेव पापंड कोई न राख्या।
बैठि इवंत नाव निज सीमा वेद भागोत यूँ भाख्या।
—बषानाजी
(६) नामदेव, कबीर, तिलोचन सधना सैनु तरे।
कहि रविदास सुनहु रे संतों, हरि जीउ ते सबै सरे।
—रैदास
'नामदेव की वाणी यद्यपि सीधी-सादी भाषा में है तथापि वह भक्ति रसमयी
और अन्तर को भेदने वाली है। उसमें हम योग साधना की निर्मलता के साथ-साथ
भक्ति की विह्वलता भी पाते हैं। हिन्दी के संत साहित्य को नामदेव महाराज की भाव
पूर्ण वाणी पर गर्व है।'
—वियोगी हरि, संक्षिप्त सन्त सुधा सार, पृ० २३।
नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की कुछ विशेषताएँ
भाषा के इतिहास में चौदहवीं शताब्दी में लिखित ब्रजभाषा की किसी अन्य

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३१
रचना का उल्लेख नही मिलता । यह बात अवश्य है कि इस काल की रचना में ब्रज-
भाषा के अंकुर दिखाई पड़ने लगे थे। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि नामदेव ने चौदहवी
शताब्दी के पूर्वार्ध में ही ब्रजभाषा में पदों की रचना की है। नामदेव के पदों में यह
स्पष्ट है कि उनमें मराठी और खड़ी बोली के तत्त्व हैं किन्तु यह बिलकुल स्वाभाविक
है। ब्रजभाषा और खड़ी बोली पास-पास की भाषाएँ थी और इनका विकास भी साथ-
साथ हो रहा था । सामान्य लोग दोनों भाषाओं के मिले जुले रूप का प्रयोग करते थे ।
सन्त नामदेव ने भी उसी में अपने पदों को रचा है। मराठी उनकी मातृभाषा थी,
जिसके कई शब्द और रूप उनके हिंदी पदों में सहज ही आ गये हैं। नामदेव के सम-
कालीन अन्य कवियों की भाषा उतनी विकसित ब्रजभाषा नही है जितनी नामदेव के
पदो की । अन्य रचनाओं में अपभ्रन्श के तत्त्व काफी मात्रा में विद्यमान हैं। अतः नाम-
देव को ब्रजभाषा का प्रथम कवि कहा जा सकता है।
अब हम नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की निम्नलिखित विशेषताओं
पर विचार करेंगे :—
वाक्य रचना
नामदेव की हिन्दी में अधिकांश संज्ञाएँ वाक्य के अन्य शब्दों से अपना सम्बन्ध
बिना कारक-चिह्नों तथा परसर्गों के दिखाती हैं। जिन संज्ञाओ का कर्म के जैसा प्रयोग
हुआ है वे बिना कारक चिन्हो के प्रयुक्त हुई है—
(१) पाखंड भगति राम नहि रीझे । पद २१—पंक्ति ४ (करण कारक)
(२) दहूँ घोड़ा न चढ़ाइ हो कान्हा । पद ३६—पंक्ति ६ (अधिकरण कारक)
(३) जैसे कनकतुला चित राखिला । पद १६—पंक्ति १ (संबंध, अधिकरण)
(४) पावक दार जतन करि काढ़यो । पद ८२—पंक्ति ४ (अपादान कारक)
यद्यपि कुछ वाक्यो मे कर्म अध्याहृत (Understood) होता है फिर भी
संदर्भ से उसका अर्थ समझ में आ सकता है—
'अब मोरी छूटि परी ।' ८-२
इस वाक्याश में कर्म 'बंधन' अध्याहृत है।
कुछ संज्ञाओ के साथ गलत कारक-चिह्नो का प्रयोग किया गया है। जैसे—
(१) गुरु को सबद वैकुंठ—निसरनी । (२६-३)
सम्बन्ध कारक के कारक चिह्न 'का' के स्थान पर यहाँ संप्रदान कारक के
'को' का प्रयोग किया गया है।
निम्नलिखित उदाहरण में इसके ठीक विपरीत कारक का प्रयोग हुआ है—
(२) भाव भगति नाना विधि कीन्ही, फल का कौन करी । ८-३

  • )
    'प्रवाल' और 'जल' एक दूसरे से दूर रखे गये है । यद्यपि दोनों एक सामासिक
    शब्द हैं—'प्रवाल जल'
    (क) सामासिक पद के शब्द स्थानान्तर कर रखे गये हैं । जैसे 'सलिल मोह'
    (६-२) 'मोह का सलिल' ।

Wait, let's review:
In L8: "बड़ो" or "बडो"?
The book uses "बडो" without nuqta (very typical for older Hindi press, like "बैकुठनाथा", "स्थानो").
In L15: "स्थलों" or "स्थलो"? It is "स्थलो".
In L25: is it (५) or (२)?
Let's look at (५). In print, it really is (५). But as a number, it's obviously item 2. What should I put? I can put (५) or (२). Usually, faithful transcription represents the character on the page, but let's see if (२) is better. Wait, if a human reads it, they might think it's a 5 or a 2. Let's look closely at it: could it be a deformed २? Yes, in some Devanagari fonts, २ looks very similar to ५ if the bottom loop doesn

नामदेव की रचनाओ का साहित्यिक मूल्यांकन २३३
शैली
कुछ स्थलों पर समानार्थी शब्दो की पुनरावृत्ति हुई है—
(अ) 'आन देव फोकट बेकामा' (३०-८)
'फोकट' और 'बेकाम' समानार्थी शब्द है ।
(ब) 'नामा कहे मेरे बंध न भाई ।' (पद ५७-पंक्ति ८)
बंध (बंधु)—भाई, भाई-भाई
(क) घड़ी मूहूरति पल नाही टाई । (३७-३)
घड़ी-क्षण, मुहूर्त-क्षण
(ङ) अमृत सुधानिधि अंत न जाइला । (४५-५)
अमृत, सुधा-निधि-अमृत का खजाना
बल (emphasis) के लिए संबंधित शब्द के साथ 'ही' का प्रयोग किया गया
है। जैसे—
(१) 'आपै पवन आप ही पाणी ।' (११०-४)
(वह स्वयं पवन तथा पानी है ।)
(२) 'घट ही भीतरि न्हाउँगा । (६६-४)
(गुरु ने मेरे शरीर के भीतर मुझे अडसठ तीर्थ दिखाये उन्ही में मैं
नहाऊँगा ।)
कहो-कहीं 'पुनि' का भी प्रयोग मिलता है—
'आपै पुरिष, नारि पुनि आपै ।' (११०-५)
(वह स्वयं पुरुष तथा स्त्री है ।)
नामदेव की हिन्दी के कुछ विशिष्ट प्रयोग
नामदेव की हिन्दी में कुछ प्रयोग ऐसे है जो रूप और अर्थ दोनो में विशिष्ट है ।
कई शब्दो का ऐसे अर्थो में प्रयोग हुआ है जिनमें वे सामान्यतः प्रयुक्त नहीं होते । इसी
प्रकार कुछ प्रयोग व्याकरण और रचना को दृष्टि से विशिष्ट है ।
शब्द संग्रह : संज्ञाएँ
अधिकाई (२-३) विशेषता पयाना (११-१) लक्ष्य
कविलास (६५-१) कैलाश पालिक (१४१-४) पालना
करवा (६३-१) शरीर पूठि (६८-५) पीठ
कापट (५२-५) कपट पैज (१३१-६) दरवाजा
कालकुष्ट (२७-३) कालकूट विष वीठो (३६-१) विट्ठल