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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 332 में से

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पृष्ठ 197

नामदेव की रचनाओ का साहित्यिक मूल्यांकन २०३
नामदेव बड़ी लीनता में कहते हैं, 'मैं बहुश्रुत नही हूँ। ज्ञानशील भी नही हूँ।
मैं भगवद्भक्तों का दीन दास हूँ।' १
'मे कलाओं का जानकार नही हूँ। हे श्रीहरि ! मे कला की बारीकियो को भी
नही जानता।' २
नामदेव का विचार था कि काव्य रचना के लिए व्युत्पन्नता की आवश्यकता नहीं
है। अपनी 'तीर्थावली' के अभंगों में एक स्थान पर रसिकों से वे कहते हैं-'मेरी रचना
प्राकृत में-मराठी में होने के कारण उसको किसी प्रकार हीन न समझा जाय। उसको
उपनिषदों का सार-स्वरूप ब्रह्म-रस समझ कर उसका सादर सेवन किया जाय।' ३
सच्चे वैष्णव का परिचय कराते हुए नामदेव कहते हैं कि 'वेदाध्ययन करने वाले
वैदिक, कथावाचक, गुणी जन, यज्ञ करने वाले याज्ञिक तथा तीर्थाटन करने वाले यात्री
अपने-अपने व्यवसाय संभाल सकेंगे परन्तु मन में भक्तिभाव न होने के कारण वे सच्चे
वैष्णव न हो सकेंगे।' ४
आचार्य शुक्ल की कविता की यह ५ परिभाषा उसके स्वरूप पर पर्याप्त प्रकाश
डालने में समर्थ है। शेष सृष्टि के साथ मानव का घनिष्ठ संबंध है पर ज्यों-ज्यों उसके
जीवन की जटिलता बढ़ती जाती है, सृष्टि के साथ मानव हृदय के रागात्मक संबंध के
टूटने की संभावना बढ़ने लगती है। नामदेव की कविता इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान
की वृद्धि कविता के ह्रास का कारण होती है। विद्वत्ता से व्याकरण शुद्ध तथा चमत्कृति
पूर्ण कविता लिखी जा सकती है। नामदेव की कविता सहज-स्फूर्त तथा मर्मस्पर्शी है।
उन्होंने यह बात प्रमाणित कर दी कि काव्यशास्त्र के नियमों से अनभिज्ञ भी काव्य रचना
कर सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति
और चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छंद, अलंकार, शब्द-शक्ति तथा अन्य काव्य
गुण।
(३) परिश्रम (अभ्यास)-अभ्यास में गुरु द्वारा कवित्व की शिक्षा तथा
१. नव्हे बहुश्रुत नव्हे ज्ञानशील। सकल संत गाथा, अभंग ६२४।
२. कलावंतांच्या कलाकुसरी। त्या मी नेंणें गा श्रीहरी। अ. २०१४।
३. नव्हे हे प्राकृत पाठांतर कवित्व। हा उपनिषद् मथितार्थ ब्रह्म रस। अ. ६७०।
४. नामा म्हणे नाम केशवाचे घेसी। तरीच वैष्णव होसी अरे जना।
--सकल संत गाथा, अभंग १८४२।
५. 'कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंध
की रक्षा और निर्वाह होता है।'
--चिंतामणि 'कविता क्या है' शीर्षक निबंध पृ० १६१।