सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१३
का वास्तव्य है । मेरा मानसिक द्वन्द्व और भ्रम बिलकुल नष्ट हुआ है। मैं राम में समा
गया हूँ ।'१
अभेद भक्ति की अनुभूति कितनी बढ़िया उपमाओं द्वारा करायी गई है। 'पर-
मेश्वर सर्वव्यापी है । जैसे शीशे में देखने वाले को अपना मुँह प्रतिबिंबित दिखाई देता
है वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को सर्वत्र परमात्मा के दर्शन होते हैं ।'२
इस अनुभूति से रंगे हुए नामदेव के पद पारमार्थिक भाव-गीत ( Metaphy-
sical lyrics ) हैं ।
नामदेव की कविता में रस
नामदेव की कविता भक्ति रस परिप्लुत है । भरत की रस व्यवस्था में भक्ति
को स्थान नही था । रूप गोस्वामी तथा मधुसूदन सरस्वती ने भक्ति को रस व्यवस्था
में न केवल स्थान ही दिला दिया अपितु उसको प्रधानता भी दिलवाई । शरणागति
( Submission ) भक्ति का स्थायी भाव है । नामदेव की वाणी मानो भक्ति रस की
मंदाकिनी है । उत्कट प्रेमाभक्ति का उदाहरण देना हो तो कहेंगे 'यथा नामदेवस्य ।'
नामदेव के विट्ठल प्रेम में याचक की आर्तता तथा चातक की अनन्यता है।
उनके मराठी के अभंगों तथा हिंदी के पदों में भक्ति तथा वात्सल्य रस परस्पर विलीन
हो गये हैं । मराठी के भक्त कवियों की यह विशेषता है कि वे अपने आराध्य विट्ठल
का माता के रूप में स्मरण करते हैं । उनके लिए वह वात्सल्य सिंधु है, करुणा का
सागर है ।
यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाय तो वात्सल्य भक्ति अन्य सब
प्रकार की भक्तियों से उच्च प्रतीत होगी क्योकि वात्सल्य भाव में किसी प्रकार के
स्वार्थ की गन्ध तक नही होती । यह एक व्यापक भाव है क्योकि इसको स्थिति प्राणि-
मात्र में होती है । केवल वात्सल्य ही भक्ति का सर्व शुद्ध भाव है जिसमे न तो विरक्ति
की भावना है, न इंद्रिय सुख की कामना हो । इसमें लोक धर्म का भी उल्लंघन नही है ।
१. मनकी बिरथा मनु ही जाने कै बूझन आगे कहीए ।
अन्तरजामी रामु रमाई मैं डर कैसे चहीए ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५६ ।
२. ऐसो रामराई अन्तरजामी । जैसे दरपन महि बदन पहानी ।
बसै घटाघट लेपन छीपै । बन्धन मुकता जानु न दीसै ॥
पानी माहि देखु मुखु जैसा । नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५७ ।