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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 332 में से

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पृष्ठ 196

२०२ नामदेव की हिन्दी कविता
यह कल्पना पुरानी है । परंतु नर देह काल (यम) का ग्रास है,१ इस कल्पना का प्रयोग
कर नामदेव उसे सजीव बना देते हैं ।'
हमारी आयु प्रति दिन घटती जा रही । नामदेव यह विचार इस प्रकार व्यक्त
करते हैं—'सूर्योदय से फिर दूसरे दिन सूर्योदय होने तक आयु का क्षय होता है । अंत
में उसका नाश होने वाला है ।'२ कितनी अन्वर्थक कल्पना है ।
अभिनव गुप्त ने में अपूर्व वस्तु निर्मिति की क्षमता रखने वाली प्रज्ञा को प्रतिभा
कहा है । वस्तु निर्मिति के अंतर्गत पात्रों का चरित्र चित्रण, कथा वस्तु, कल्पना विलास
तथा रचना सौंदर्य का समावेश होता है । बाल क्रीडा, शिवरात्र माहात्म्य, पौराणिक
चरित्र, ज्ञानेश्वर की आदि, तीर्थावली तथा समाधि में नामदेव के प्रतिभा विलास के
मनोज्ञ दर्शन होते हैं । इस दृष्टि से नामदेव की ये सूक्तियाँ उल्लेखनीय हैं—
(१) जिस स्वर्ग-सुख की प्राप्ति के लिए लोग अनेक कष्ट उठाते हैं वह सब
ज्ञानेश्वर को सहज सुलभ था ।३
(२) मुक्ताबाई के अनन्त में विलीन होते समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो सुन्दर
आकाश में विराट का पौधा अंकुरित हुआ ।४
(३) कीर्तन में भक्ति का उपदेश करते हुए आनन्द-विभोर होकर मैं नाचूँगा
और इस प्रकार भक्ति के ज्ञान का दीप जलाऊँगा ।५
(२) व्युत्पन्नता .—व्युत्पत्ति को 'काव्य प्रकाश' कार ने निपुणता कहा है । यह
दो प्रकार से प्राप्त होती है—लोकनिरीक्षण से और काव्य तथा शास्त्र के अध्ययन से ।
नामदेव अपनी कमजोरियों को बड़ी प्रामाणिकता से स्वीकार करते हैं । फिर भी अपनी
हिंदी तथा मराठी की रचनाओं में उन्होंने कम से कम छब्बीस पौराणिक कथाओं का जो
उल्लेख किया है वह उनके बहुश्रुत होने का प्रमाण है ।
————
१ शरीर काळाचे भातुकें ।
—वही, अभंग १६६४ ।
२ भानुचेनि मापें आयुष्य जें चले ।
—वही, अभंग १६३७ ।
३. वैकुंठासी शिंको लावियेली ।
—अभंग, १०५८ ।
४. अंकुरला गाभा विराटाचा ।
—सकल संत गाथा अभंग, ११८८ ।
५. नाचूं कीर्तनाने रंगी । ज्ञानदीप लावूं जगी ।
—अभंग, ११६२ ।