सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०५
गाया जाय यह हे नहीं जानता ।'१ कारण यह है कि उन्होंने सचेष्ट होकर काव्य रचना
नहीं की। उनकी कविता सहज-स्फूर्त थी।
काव्य कला है अतः उसके कला पक्ष तथा भाव पक्ष पर विचार करना आवश्यक
हो जाता है । पहले हम नामदेव की कविता के भाव पर विचार करेंगे ।
आत्मनिवेदनपरक काव्य
वारकरी पंथ की नव विधा२ भक्ति ने जिस प्रकार 'कीर्तन' संस्था को जन्म
दिया उसी प्रकार उसने संत कवियों की उज्ज्वल परंपरा को जन्म दिया। 'श्रवण कीर्तन'
आदि आठ प्रकार की भक्ति करने पर भी जब भक्तों के हृदय को शांति नहीं मिली तब
उन्होंने अपने इष्टदेव के सामने आकुल निवेदन करना प्रारंभ किया। यह आकुल निवे-
दन एक प्रकार का आत्मनिवेदन ही था जिसने आत्मनिवेदन-परक काव्य को अर्थात्
Lyrical poetry को जन्म दिया।
संत काव्य और भक्ति
भक्ति संत काव्य का स्थायी भाव है। संत कवि प्रथमतः संत थे, भक्त थे
तदनंतर कवि। संत ज्ञानेश्वर ने आत्मनिवेदन-परक शैली में जो अभङ्ग रचना की वह
कविता करने के उद्देश्य से नहीं अपितु अपनी आंतरिक वेदना तथा व्याकुलता अपने
इष्टदेव के समक्ष निवेदन करने के उद्देश्य से। अभङ्ग रचना के पीछे सन्त नामदेव का
भी यही उद्देश्य था। ज्ञानेश्वर योगी थे परन्तु नामदेव एक विह्वल प्रेमी भावुक भक्त।
उनका सारा काव्य उनके आर्त हृदय का आविष्कार है।
डॉ० श्री० व्यं० केतकर३ के अनुसार संस्कृत में आत्म-निवेदन-परक काव्य का जो
अभाव था उसकी इन सन्त कवियों की रचनाओं से पूर्ति हुई। उच्च कोटि का भाव-
काव्य अथवा गीति काव्य (lyrical poetry) इन सन्त कवियों की रचनाओं में ही
अवतरित हुआ।४
१. कोण वेल काय गाणे। हे तो भगवंता मी नेणे।
वारा वाहे भलतया। तैसी माझी रंग छाया।
टाल मृदंग दक्षिणेकडे। माझे गाणे पश्चिमेकडे ॥
—सकल सन्त गाथा, अभङ्ग १५१६
२. श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ भागवत
—सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
३. महाराष्ट्रीयांचे काव्य परीक्षण, पृ० ३५।
४. सन्त काव्य समालोचन : डॉ० गं० ब० ग्रामोपाध्ये, पृ० २१२।