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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 332 में से

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पृष्ठ 192

१६८ नामदेव की हिन्दी कविता
आय० ए० रिचर्डस् का मत अंशतः मम्मट से मिलता है । उसके अनुसार कवि
अपनी कविता 'स्वान्त-सुखाय' या उपदेश देने के लिए करते है अथवा दोनो दृष्टिकोणो
से भी ।१
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानो के काव्यादर्शों एवं काव्य के प्रयोजनो का अध्ययन
करने पर ज्ञात होता है कि हिंदी के संत कवियो में से किसी ने भी उपर्युक्त आदर्शों
एवं प्रयोजनो मे से एक को भी स्वीकार नहीं किया ।
संतो का काव्यादर्श
नामदेव आदि संतो का काव्य इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने काव्य का
कोई प्रचलित आदर्श ग्रहण नहीं किया । काव्य, काव्य शास्त्र, छन्द, पिंगल आदि के
नियमो का न उन्होंने अध्ययन किया था न इन सब के प्रति उनकी कोई आस्था थी ।
संतों ने यह बात प्रमाणित कर दी कि काव्यशास्त्र के नियमो से अनभिज्ञ भी काव्य
रचना कर सकता है । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति
और चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छन्द, अलंकार, शब्द शक्ति और अन्य गुण ।
संतो ने यह भी सिद्ध कर दिया कि भाव ही काव्य की आत्मा है और जब
काव्य की आत्मा दृढ़ और उच्च है तब फिर बाह्यावरण और अन्य उपकरण स्वतः
जुट जायेंगे । उन्होंने सचेष्ट होकर कविता की रचना नहीं की । उनकी कविता
उस्फूर्त है ।
दत्त-चित होकर संत साहित्य का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि संतो के
साहित्य में उनके काव्यादर्शों की अभिव्यक्ति हुई है । उन्होंने काव्य को कला की दृष्टि से
से नहीं देखा, न उन्होंने काव्य एवं कवि को समाज का सम्मानित सदस्य ही माना है ।
उन्होंने काव्य को आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया । इन कवियों की
रचनाओं में उनके काव्य विषयक आदर्श निहित मिलते है ।
सभी संतो के उद्देश्य ब्रह्म का गुणगान, बाह्याचारों की अवहेलना, सहज भाषा,
सरल शैली तथा अलंकारादि विहीन जनता में प्रचलित अति साधारण छन्द हैं । संतो ने
काव्य के महत्त्व को यहाँ तक स्वीकार किया है, जहाँ तक वह ब्रह्म के स्मरण में सहायक
हो सके, अन्यथा उसकी कोई उपयोगिता नहीं है । उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की उन्नति
एवं विकास के लिए काव्य के महत्त्व को स्वीकार किया है । दरिया साहब मारवाड़ वाले
The poets either wish to instruct or to delight or to combine
the both.
—Principles of Literary critcism.