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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 332 में से

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पृष्ठ 203

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०६
रूप में स्वीकार कर ।'१
नामदेव के मराठी काव्य की आत्मा उनकी हिंदी रचनाओ में भी संक्रमित हुई
और रस भी ज्यों का त्यों प्रवाहित हुआ है। इसके अतिरिक्त अवस्था के अनुसार और
भ्रमण, चिंतन और सामयिक परिस्थिति के परिणाम-स्वरूप उनके विचारो में जो प्रौढ़ता
सहिष्णुता तथा उदारता आ गई थी अर्थात् उनके विचारो मे जो प्रगल्भता आ गई थी
उसका निचोड़ हमें उनकी हिंदी रचना में मिलता है।
नामदेव अपने हृदय की व्याकुलता को 'तालाबेली' शब्द से व्यक्त करते है। यह
व्याकुलता उस प्रकार की है जिस प्रकार की गाय को बछड़े के बिना या मछली को
पानी के बिना होती है।२
एक अन्य स्थल पर ये कहते है कि जिस प्रकार विषयी नर परनारी से प्रेम कर
तड़पता है उसी प्रकार की मेरी 'तालांबली' ( परमात्मा से मिलने की तीव्र
उत्कंठा) है।३
भक्त के प्रेम की तीव्रता का परिचय या अनुभूति नामदेव लोकानुभूत दृष्टांतो
से कराते हैं—'जैसे भूखे को भोजन प्रिय है, जैसे प्यासा जल को ही अपनी प्रमुख
आवश्यकता मानता है, जैसे मूर्ख को अपना कुटुम्ब ही प्रिय है, नामदेव कहते है कि
उपर्युक्त के समान ही नारायण के प्रति मेरी भक्ति और निष्ठा है।'४
१. बाहेरी भीतरी तुजचि मी देखे । वित्त तेणे सुखे वेडावले ।
संत संगे मज पालट हा झाला । पाहता विठ्ठला रूप तुझें ।
मीपणासहित आनंदी बुडालों । न निघे कांही केलें चित्त माझें ।
नामा म्हणे एक उरली से वासना । स्वामी सेवकपण देई देवा ।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १६६८ ।
२. मोहि लागी तालाबेली
बछरे बिनु गाइ अकेली ।
पानीआ बिनु मीनु तलफे
ऐसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद २६ ।
३. जैसे बिखै हेत परनारी, ऐसे नामे प्रीति मुरारी ॥
ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कोड़ा डारत फिरे जुआरी ॥
—वही, पद ५८ ।
४. जैसो भूखे प्रीति अनाज । तुषावंत जल सेती काज ।
मूरिप नर जैसे कुटुम्ब पराइन । ऐसी नामदेव प्रीति नराइण ॥ १ ॥
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