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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 332 में से

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पृष्ठ 201

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०७
स्वाभाविक था। उनके उपलब्ध अभंग आत्मनिष्ठा अथवा आभ्यंतरता से ओतप्रोत है।
यो भी कहा जा सकता है कि विषयीनिष्ठ (Subjective) काव्य के वे आदर्श है। संत
नामदेव का आत्मविष्कार वर्णन से परे है। अतः उनके अभंगों की सरसता, प्रासादिकता
और मधुरता बेजोड़ है। वे सर्वसाधारण जनता के लिए रचे गए थे। अतः उनकी
रचना सरल और सुगम है।
आर्तता : नामदेव के काव्य का प्रेरणा स्रोत
जब नामदेव ने भावुकता भरे हृदय से हठ किया कि विट्ठल उनके हाथ से दूध
पियें तभी उनके हृदय की आर्तता कविता-सरिता के रूप में प्रवाहित हुई। जैसे मछली
पानी के बाहर तड़पने लगती है वैसे नामदेव अपने इष्टदेव पांडुरङ्ग के दर्शन के लिए
तड़पते थे। उनकी यह तीव्र तड़प उनके सैकड़ों अभंगों में मुखरित हुई है। एक अभङ्ग
में वे कहते हैं—'चाहे मेरे प्राण निकल जायें या रहे मैं दृढ़तापूर्वक पाडुरङ्ग की भक्ति
करता रहूँगा। हे पांडुरङ्ग ! मे तेरी सौगंध लेकर कहता हूँ कि मै तेरे चरण कभी न
छोड़ूँगा। हे केशवराज ! तू मेरा यह प्रण निभा दे।'¹ इस अभङ्ग में तड़प के साथ
निर्धार भी व्यक्त हुआ है।
अन्य एक अभङ्ग में नामदेव कहते है—'हे विट्ठल ! तेरी मार्ग प्रतीक्षा करते
करते मेरी आँखें थक गईं। मेरा कंठ रुँध गया है। तू मेरी माता है अतः तुरन्त आ।
तू पक्षिणी है, मैं अंडज हूँ। मैं क्षुधा से पीड़ित हूँ। तू मुझे भूल-सी गई। तू मेरी हिरणी
है, मैं तेरा बालक हूँ। अतः मुझे दर्शन देकर मेरा भव-पाश दूर कर।'² इस
अभङ्ग में हृदय की व्याकुलता उपमाओं के द्वारा व्यक्त हुई है।
कभी-कभी नामदेव अपने आराध्य-देव के प्रति रोष भी प्रकट करते हैं। यथा—
'तू पतित पावन है ऐसी तेरी कीर्ति सुनकर मैं तेरे द्वार पर आया था। पर अब यह
१. देह जावो अथवा राहो। पांडुरङ्गी दृढ़ भावो।
चरण न सोडी सर्वथा। तुझी आण पंढरीनाथा।
हृदयी अखंडित प्रेम। वदनी तुझे मंगल नाम।
नामा म्हणे केशवराजा। केला नेम चालवी माझा।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १५८१।
२. तूं माझी माउली मी वो तुझा तान्हा। पाजी प्रेम पान्हा पांडुरंगे।
तूं माझी पक्षिणी मी तुझे अंडज। चारा घाली मज पांडुरंगे।
तूं माझी हरिणी मी तुझे पाडस। तोड़ी भव पाश पांडुरंगे॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १५११।