सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन
किसी कवि की रचनाओं का आलोचनात्मक एवं विवेचनात्मक अनुशीलन करने
के पूर्व यह सर्वथा अपेक्षित होता है कि उसके काव्यादर्श का अध्ययन कर लिया जाय।
साहित्यकार के दृष्टिकोण, तथा उसके लक्ष्य के आदर्श का अध्ययन कर लेने से उसकी
चिंतन पद्धति, विचार शैली और जीवन दर्शन स्वतः स्पष्ट हो जाता है। साहित्यकार
एक जागरूक जीव होता है। उसकी चेतना, व्यापक दृष्टिकोण और दर्शन साहित्य के
पृष्ठों में प्रतिबिंबित होता है।
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के काव्य के प्रयोजन
साहित्य के प्रयोजन के विषय में आचार्यों में मतभेद है। कतिपय विद्वान
आनन्द को ही काव्य का मूल प्रयोजन मानते हैं। भामह के मत से काव्य धर्म, अर्थ,
काम, मोक्ष की प्राप्ति का साधन है।¹ 'साहित्य दर्पण' कार भामह के कथन से पूर्णतया
सहमत हैं। भरत, आनन्दवर्धन एवं अभिनव गुप्त आदि विचारक नैतिकता एवं धार्मिकता
के विकास के लिए काव्य को प्रयोजनीय मानते हैं।
पाश्चात्य लेखकों में ब्रैडले के अनुसार काव्य स्वयं अपना साध्य है। वह धर्म,
संस्कृति और शिक्षा आदि का साधन नहीं है। टॉल्स्टॉय के अनुसार काव्य की मुख्य
कसौटी नीति और धर्म है।²
१. धर्मार्थ काम मोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च ।
प्रीति करोति कीर्तिञ्च साधु काव्य निषेवणम् ॥
—भामह
2. In every age and in every human society there exists a religious
sense of what is good and what is bad, common to that
whole society and it is this religious conception that decides
the values of the feelings transferred by Art.
—What is Art (Oxford) p. 128-129.