सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० नामदेव की हिन्दी कविता
एवं आडंबर की निंदा की है। वे कहते हैं कि 'जब तक अपना मन शुद्ध नहीं तब तक
ध्यान और जप किस काम के ?'१ 'छापा, तिलक तथा तुलसी की माला गले में पहनने
से क्या फायदा ? जब हृदय कोयले जैसा काला हो ?'२
संत साहित्य की चौथी विशेषता है जातीयता । मध्ययुगीन संतों ने अपनी वाणी
द्वारा समस्त देश को एक महान् सांस्कृतिक चेतना में बाँध दिया । इस महान् सांस्कृतिक
चेतना के फलस्वरूप जातीयता का विकास हुआ । नामदेवादि संतों ने भाषा के द्वारा
जातीयता का प्रसार और प्रचार किया । कबीर,३ रज्जब४ आदि संतों ने दिखा दिया
कि भाषा की क्या आवश्यकता है और उसका महत्व क्या है । उन्होने उही छंदो का
प्रयोग किया जिनसे जनता परिचित थी । वास्तव में वे जीवन भर जनता के लिए जिये
और मरे ।
संत साहित्य की पाँचवी विशेषता प्रगतिशीलता है । संतों के काव्य के दो विषय
हैं—(१) आध्यात्मिक और (२) लौकिक । संतों से पूर्व उच्च वर्ग का स्वत्व था । मोक्ष
पर उन्हीं का अधिकार था । पर इन संतों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में एक क्रांति उपस्थित
कर दी । नामदेव अपने आप को संबोधित करते हुए कहते हैं—'हे नामा ! तू षट् कर्मों
का अनुसरण करने वाले ब्राह्मणों से सरोकार न रख । तेरी भक्ति नष्ट हो जायेगी ।'५
इस प्रकार परंपरागत आध्यात्मिक विचार धारा में संतों ने प्रगति का भी समा-
वेश किया जो समय और देश के लिए अतीव अभीप्सित था ।
जनता को प्रबुद्ध करने के लिए उन्होंने 'संतो' शब्द का प्रयोग किया । जहाँ
जनता को संबोधित किया गया है, उपदेश दिया गया है वहीं भाव की गंभीरता कम है
१. जो सग राम नामे हित न भयो ।
तौ सग मेरी-मेरी करता जनम गयो ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २२ ।
२. गलि पहिरै तुलसी की माला । अंतरगति कोइलासा काला ॥
—सं० ना० की० हिं० प०, पद २४ ।
३. संस्कीरति है कूप जल, भाषा बहता नीर ।
४. बेद सु वाणी कूप जल दुख सूं प्रापति होय ।
सबद साखि सरवर सलिल सुख पीवै सब कोय ॥
—संत काव्य ।
५. लोक कहै लोकाइ रे नामा ।
षट दरसन कै निकटि न जाइबो । भगति जाइगी जाइ रे नामा ॥
—सं० ना० की हिं० पदा०, पद १७ ।