सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव पांडुरंग की ओर भावाकुल अंतःकरण से देखते थे। उसके लिए उनके
हृदय में जो आत्मीयता थी उसका पारावार नहीं था। नामदेव में कहीं उससे मिलने की
'तालाबली' है तो कहीं मिलन सुख का उल्लास। उनमें उत्कृष्ट भावना की हिलोर है।
पुत्र का अपनी माता पर, पत्नी का अपने पति पर, मित्र का अपने मित्र पर इतना प्रेम
न होगा जितना नामदेव का पांडुरंग पर था।
नामदेव की कविता में हमें भावातुर हृदय की आकुलता, आशंकित हृदय की अशां-
तता, विट्ठल की आहट पाते ही हर्षातिरेक से हृदय का नर्तन, यह आहट आभास में
परिवर्तित होने पर दारुण निराशा आदि विविध भावनाओं की झाँकियाँ मिलती हैं।
प्रिन्सिपल वा० ब० पटवर्धन¹ ने नामदेव की कविता को बायरन, शैली तथा
वर्डस्वर्थ आदि पाश्चात्त्य कवियों की कविता से तुलना कर प्रमाणित किया कि भावोद्रेक
में वह इन कवियों की कविता से किसी प्रकार कम नहीं है। नामदेव के अभंग भावो-
त्कटता के सुंदर उदाहरण हैं।
इस प्रकार मराठी में भाव गीत ( गीति काव्य ) की परंपरा नामदेव आदि
संत कवियों से प्रारम्भ होती है।
संत नामदेव की अभंग रचना
नामदेव की उद्भट भक्ति के कारण लोग उनको बाल-भक्त कहने लगे। जैसे-जैसे
दिन बीतते गये उनका भावुक मन विट्ठल भक्ति की ओर अधिकाधिक आकर्षित होता
गया। अपने इष्टदेव पांडुरंग के सान्निध्य में रहकर वे निरंतर भक्त-रस से सरा-
बोर अभंगों की रचना एवं गायन कर भक्ति में निमग्न रहने लगे। उनका कीर्तन सुनने
के लिए जनता सागर जैसी उमड़ पड़ती थी। उनके प्रेम, राग, मित्रता और पूजा का
विषय भगवान पांडुरंग ही बने मानो वे उससे एकरूप हुए थे। इस एकरूपता, उत्कटता
और आर्तता के स्रोत से उनके अभंगों की सृष्टि हुई जिसका विस्तृत वर्णन अब हम
करेंगे।
नामदेव शीघ्र कवि थे। उनका हृदय अतीव संवेदनशील था। उनकी भक्ति का
आवेग अवर्णनीय था। ऐसी दशा में उनके द्वारा प्रचुर मात्रा में अभंगों की रचना होना
- 'In the field of lyric of devotion—of the lyric of divine love-of
Romance of piety and love of the spirit, Maharashtra literature
stands unrivalled even perhaps unequalled, unapproached and
unapproachable.'
—Philological Lectures by Prof. W. B. Patwardhan
(Lecture No. 2)