सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 193, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन १६६
ने संतों का काव्यादर्श सुन्दरतापूर्वक व्यक्त किया है।¹
काव्य के मूल्यांकन के दो प्रकार
किसी भी काव्य का मूल्यांकन दो प्रकार से होता है—साहित्यिक और सामा-
जिक। काव्य समाज के लिए लिखा जाता है अतः उसके सामाजिक पक्ष को भुलाया नहीं जा
सकता। संतों ने साहित्य में अमर स्थान पाने के लिए नहीं बल्कि जनता को प्रबुद्ध
करने के लिए काव्य रचना की। उनमें लोक मंगल या परोपकार की भावना सदैव
जागृत थी। प्रथम हम नामदेव की कविता के सामाजिक पक्ष पर विचार करेंगे।
नामदेव की कविता का सामाजिक पक्ष
संत साहित्य की सर्वप्रथम विशेषता है मानवता को प्रमुखता देना। संत नाम-
देव की कविता भी मानवता के भाव से ओतप्रोत है। वे एक आर्त भक्त थे। परोपकारी
संत थे। उनका अन्तःकरण परदुःखकातर था। अज्ञ जनों के लिए उनके हृदय में अपार
करुणा थी। ऐसे अज्ञ जनों का उद्धार करने की प्रार्थना करते हुए वे कहते हैं, 'ये
संसारी, विषयासक्त तथा पामर जीव परब्रह्म की भक्ति का आनन्द क्या जानें? ईश्वर से
विमुख होने के कारण, समक्ष प्रत्यक्ष अमृत का कलश होने पर भी ये उसकी मिठास
नहीं जानते। ऐसे लोगों के उद्धार की नामदेव प्रार्थना करते हैं।'²
संत साहित्य की दूसरी विशेषता मानववाद है। मानववाद का मूल लक्ष्य है
संसार के सभी जीवों के कष्ट को मिटाना और मानव के अस्तित्व को स्वीकार
करना। मानववादी नामदेव संसार को सुखी और प्रसन्न देखना चाहते हैं। वे प्रार्थना
करते हैं कि 'हरि के दासों को दीर्घायु प्राप्त हो और संत जन सदा सुखी हों।'³
संत साहित्य की तीसरी विशेषता है धार्मिकता। संतों ने धर्म-विषयक विचार
धारा और धारणा में क्रांति उपस्थित कर दी। नामदेव ने स्थान-स्थान पर बाह्याचार
१. सकल कवित्त का अर्थ है सकल बात की बात।
दरिया सुमिरन राम का कर लीजै दिन रात॥
—दरिया साहब का बानी, पृ० ६।
२. तैसी चूक लीजै रे जग जीवना।
अनभवह्या बिना ऐसी लपी न कुरुसनां ॥टेक॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १४८।
३. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला। माझिया सकळा हरिच्या दासा।
कल्पनेची बाधा न हो कोणो काळी। हे संत मंडळी सुखी असो॥
—सकल संत गाथा।