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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 332 में से

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पृष्ठ 188

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६३
करता हूँ।'१
(४) करनी तथा कथनी में एकता :- सांसारिक व्यक्तियों की सामान्य प्रवृत्ति
होती है कि वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। परोपदेश-कुशल तो बहुतेरे होते हैं
परन्तु उपदेश के अनुसार आचरण करने वाले बहुत कम। नामदेव कहते हैं—'जब तक
आत्मा शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप, तप आदि करने से क्या लाभ।'२
'पाखण्ड-पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।३
(५) दुःखी तथा पीड़ितों के प्रति सम्वेदना :- संतों की सब से बड़ी विशेषता
है मानववाद। संत साहित्य मानववाद की भावना से ओत-प्रोत है। मानव के आधा-
त्मिक और लौकिक जीवन को सुखी बनाने के लिए उन्होंने बार-बार सन्मार्ग तथा
कल्याणकारी पथ की ओर संकेत किया है। उन्होंने वर्ग भेद की कटु आलोचना की
है। नामदेव जैसे उदारारय व्यक्ति संसार में सभी को सुख, देखने के आकांक्षी थे।
(६) हरिजनों के सुखी होने की कामना :- हरि के भक्तो के कल्याण की
कामना करते हुए नामदेव कहते हैं—'हरि के दास दीर्घायु हों। अहंकार रूपी पवन
का उनको स्पर्श न हो। वे सदा सुखी रहे। नामदेव कहते हैं कि पाडुरंग जिनकी
वाणी का निधान (थाती) बन गया है, ऐसे संत सदा सुखी हों।'४
(७) जन भाषा का प्रयोग :- संस्कृत और जन भाषा के भेद को बताते हुए
संत रज्जब ने कहा है—'वेद वाणी कूप जल है। वह कष्ट से मिलता है। साखी,
१. मन मेरो गजु जिभ्या मेरी काती। राम रमे काटो जम की फाँसी।
रांगनि रांगउ सीवनि सीवउ। राम नाम बिनु घरीअ न जीवउ॥
—स० ना० हिं० पृ०, पद १८।
२. काहे कू कीजै ध्यान जपना। जो मन नाही सुध अपना॥टेक॥
साँप काँचली छाड़े, विष नहो छाड़े। उदिक मै वग ध्यान मांडे॥
—सं० ना० हिं० पृ०, पद २३।
३. पाषंड भगति राम नहीं रीझै। बाहरि अंधा लोक पतीजै॥
—सं० ना० हिं० पृ०, पद २१
४. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला। माझिया सकला हरिच्या दासा।
कल्पनेची बाधा न हो कोणे काली। हे संत मंडळी सुखो असो॥
अहंकाराचा वारा न लागो रजसा। माझ्या विष्णुदासा भाविकांसी।
नामा म्हणे तथा असावे कल्याण। ज्या मुखी निधान पांडुरंग॥
—सकल संत गाथा, अभंग ८५३।
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