सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 205, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २११
मे जन्म-जन्मांतर में भटकता रहा। अंत में तेरे नाम से मेरा उद्धार हुआ। नामदेव
कहते हैं कि हे परमात्मा ! तू मेरा सर्वस्व है। यदि तू सागर है तो मैं उस सागर में रहने
वाली मछली हूँ।'"
साक्षात्कार की अनुभूति
नामदेव ने निर्गुण निराकार के साक्षात्कार के लिए साकार प्रतिमा
का ध्यान करते हुए भावोत्कट मनः स्थिति में काव्य रचना की। डॉ० रा० द० रानडे
के अनुसार साधक के जीवन मे ऐसी ही भावुकता अपेक्षित होती है।२
कविता प्रयत्न पूर्वक नहीं बनाई जाती। बल्कि चिंतन करते-करते एक ऐसा
क्षण आता है जहाँ चिंतन संबंधी प्रत्येक अभिव्यक्ति कविता बन जाती है। नामदेव की
रचनाएँ इसी प्रकार के काव्य के अंतर्गत आती है।
नामदेव की रचनाओं में अनुभूति की घनता (density) विशेष रूप से प्रतीत
होती है। उस परम तत्त्व का साक्षात्कार होने पर नामदेव को जो अलौकिक आनंद
होता है वह उच्चरित तथा लिखित दोनों रूपों में व्यक्त करने में भाषा असमर्थ है।
भाषा भावों को व्यक्त करने में तब असमर्थ होती है जब अनुभूति घनी हो।
नामदेव कहते हैं कि मुझे परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। 'मैं चाहता हूँ कि
वाद्य बजाकर मैं भगवान से जा मिलूं। भले ही कोई मेरी स्तुति अथवा निंदा करे।
श्रीरंग (प्रभु) से मेरी भेंट निश्चित है।'३
'उन्मनी अवस्था' में उन्हें 'लय योग' की जो अनुभूति हुई उसका वर्णन वे इस
प्रकार करते हैं-'मुझे ईश्वर के दर्शन हुए और झिलमिल प्रकाश दिखाई देने लगा।
अनहद नाद सुनाई दे रहा था। मेरी आत्मज्योति परमात्म-ज्योति में समा गई। अन्तः-
१. भगति आपि मोरे बाबुला। तेरी मुकति न मांगू हरि बीठुला ॥
भगति न आपे तौ तन आडौ । कोटि करै तो भगति न छाँडौ ॥
अनेक जनम भरमतौ फिरयौ । तेरो नाँव ले ले उबरयौ ।
नामदेव कहै तू जीवन मोरा। तू सागर मैं मंछा तोरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४६ ।
2. A mystical life is supremely emotional.
—Mysticiim in Maharashtra P. 26
३. अब जीअ जानि ऐसी बनि आई। मिलऊ गुपाल नीसानु बजाई ॥
असतुति निंदा करै नरु कोई। नामैं श्रीरंगु भेटले सोई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१४ ।