सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 198

२०४ नामदेव की हिन्दी कविता
संशोधनादि आते हैं। इसमें प्रधानतया काव्य के बाह्यांगों का ही विचार होता है।
कवित्व शक्ति परमात्मा की देन है। 'ठोक-पीट कर कवि नही बनाया जा सकता।'१
नामदेव का यह कथन यथार्थ का द्योतक है।
नामदेव को अपनी रचनाओं का सस्कार करने का कदाचित् ही अवसर मिला
हो । वे रस-सिद्ध कवि थे। भावावेग में उनके मुख से जो उद्गार निकल पड़े वे कविता
के साँचे में ढल कर ही निकले। उनके आध्यात्मिक गुरु विसोबा खेचर थे२ परंतु उनसे
काव्य प्रेरणा ग्रहण करने का उनकी कविता में कही उल्लेख नहीं है। कवित्व तथा
कीर्तन की प्रेरणा उन्हें सत ज्ञानेश्वर से मिली थी। यह कथन सम्मत हो सकता है।
(४) भावात्मकता—प्रतिभा, व्युत्पन्नता तथा परिश्रम (अभ्यास) की अपेक्षा
कविता के लिए महत्वपूर्ण प्रेरक तत्त्व भावात्मकता है। आचार्य शुक्ल के अनुसार कविता
की निर्मिति में भावो का महत्त्वपूर्ण स्थान है।३ नामदेव की भाव विह्वलता का वर्णन
करतेहुए गोणाई विट्ठल से कहती है,—'तेरा नाम संकीर्तन करते हुए वह आनन्दातिरेक से
नाचता है, डोलता है, सिसकता है और अहर्निश तेरा नाम लेता है।'४ स्वयं नामदेव
एक स्थान पर कहते हैं—'विट्ठल प्रेम मेरे रोम-रोम में समाया है। कीर्तन करते समय
मै प्रेमानंद से नाचने लगता हूँ।'५ नामदेव के इन उद्गारों से उनकी भावोत्कटता प्रमा-
णित होती है।
काव्य निर्मिति के इन प्रमुख कारणों के अतिरिक्त उत्प्रेक्षा, अपूर्व कल्पनाशक्ति,
ग्रहण, धारणा, मनन आदि अनेक कारण साहित्य-शास्त्रियो ने दिये हैं। इन सब कारणों
को लेकर नामदेव ने रचना की हो सो बात नही। साहित्य शास्त्रोक्त काव्य कल्पना और
नामदेवादि संतो की काव्य कल्पना में पर्याप्त अंतर है।
नामदेव की अपनी कोई विशिष्ट काव्य दृष्टि नही थी। काव्य कारणों संबंधी
उनकी विस्मृति असाधारण थी । वे कहते हैं—'हे भगवंत ! किस समय कौन-सा गीत
१. 'शिकवोनि काय कवि होती ?'—सकल संत गाथा
२. निज वस्तु दाविली माझी मज ।'—अभंग १३६० ।
३. 'अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम ही कविता है। जब किसी कारण से
हृदय के भाव हृदय में नही समाते और वे शब्दों का रूप धारण कर बाहर आते
हैं तब उसे कविता कहते हैं, चाहे वह पद्य में हो अथवा गद्य में।'
४. हासे नाचे प्रेम फुंदतु डुलतु । अहर्निशी गातु नाम तुझें ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १२८२ ।
५. प्रेम पिसें भरले अंगी। गीत संगे नाचो रंगो ।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १११६ ।