सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 206

२१२ नामदेव की हिन्दी कविता
करण की कोठरी रत्न के प्रकाश से जाज्वल्यमान हो उठी। वही बिजली भी चमकने
लगी। भगवान को दूरी नही रह गई। आत्मा उसी से प्रापूर हो गई। असख्य दीपज्योति
को मद करने वाले सूर्य्य का प्रकाश छा गया। नामा उसी में सहज समा गया।' १
जो सिद्धावस्था को पहुँचता है उसे सर्वव्यापी परमात्मा जहाँ तहाँ प्रतीत होता
है नामदेव कहते हैं—'विठ्ठल अणु-रेणु में व्याप्त है उसके दर्शन चाहे जहाँ हो सकते
हैं।'२
'मैं उस परमेश्वर की मानस पूजा करता हूँ जो मन्दिर और मसजिद में नहीं
होता।'३
उनका सेवक सेव्य भाव भी जाता रहा। ४
सचमुच नामदेव अभेद भक्ति का आस्वाद ले रहे थे। वे कहते हैं—'हे माधव !
तुम मुझसे बाजी क्यो नही लगाते ? भगवान् से भक्त और भक्त से भगवान् है, अद्वैत
का यही खेल भक्त और तुम्हारे साथ पड़ा है। तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं मंदिर हो और
तुम्हीं पुजारी हो।'५
आगे चलकर वे कहते हैं कि 'मै ही अपनी मानसिक स्थिति को भली भाँति
जानता हूँ। वह किससे कहे ? कौन उसको समझ सकेगा ? मेरे हृदय में पूर्णतया प्रभु
१. जब देखा तब गावा। तउ जन धीरजु पावा।
नादि समाइलो रे सतिगुर भेटिले देवा
जह झिलिमिलो कारु दिसंता।
तह अनहद शब्द अजंता ॥ —सं० ना० हि० प० पद २००।
२. ईभै बीठलु, ऊभै बीठलु, बीठल बिनु ससारु नहो ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिउ तू सरब मही ।
—पंजाबातील नामदेव, पद ३।
३. हिंदू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीत ।
नामै सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सं० ना० हि० प०, पद २०८।
४. प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ३६।
५. बदहु कोन होड माधऊ मोसिऊ ।
ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १६१।