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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 332 में से

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पृष्ठ 202

२०८ नामदेव की हिन्दी कविता
देखकर कि तू पतित पावन नही है, मैं लोट रहा हूँ। हे देव! तुम इतने उदार हो कि
बिना लिए कुछ देने नही। तुम जैसे कृपण से मैं क्या याचना करूँ? मालूम नही तेरा
नाम पतित पावन किसने रखा?'' उपर्युक्त अभङ्ग मे प्रेम के साथ व्यङ्ग्य भी प्रकट
हुआ है।
सत नामदेव की रग रग मे उनका आराध्य विठ्ठल समाया हुआ था। वे
उसके अनन्य भक्त थे। विठ्ठल से अधिक इस ससार की कोई वस्तु उन्हे प्रिय नही थी।
वे कहते है— 'न मुझे वैकुण्ठ की चाह है, न कैलास की आकाङ्क्षा। मैने अपनी सब
आकाक्षाए विठ्ठल के चरणो मे अर्पित कर दी है। न मुझ सतान चाहिए, न धन मान,
मेरे लिए तो एक विट्ठल का प्यार ही सब कुछ है।'२
नामदेव विठ्ठल की आराधना मे कितने तल्लीन, कितने तन्मय हो गये थे।
कहत हे— हे पुरुषोत्तम ! मै तेरे प्रेम के कारण तुझमे ही लीन हो गया हूँ। मै देह हूँ
तू उसमे रहने वाला आत्मा है। इस प्रकार हम दोनो एक ही है।'३
नामदेव विठ्ठल की अपेक्षा उसकी भक्ति को अधिक महत्त्व देते थे। वे कहते
हे— हे प्रभु ! तू आप्तकामी है पर तेरे चरण तुझसे भी अधिक मधुर हे। तू परा और
अपरा से परे है। तेरे चरण तेरी महानता के प्रतीक है। मैं अपने मन सहित तेरे चरण
चिंतन के आनंद में डूब गया हूँ और अनेक प्रयत्न करने पर भी मेरा चित्त तेरे चरणो
से अलग नही हो पाता। मेरी वासनाएँ मिट चुकी हैं। हे विठ्ठल ! तू मुझे अपने सेवक के
१. पतित पावन नाम ऐकुनी आलो भी द्वारा। पतित पावन न होसी
म्हणुनी जातो माघारा।
घेतो तेव्हा देसी ऐसा अससी उदार। काय धरूनि देवा तुझे
कृपणाचे द्वार।
सोडी देवा ब्रीद आता न होसी अभिमानी।
पतितपावन नाम तुझे ठेवियले कोणी ?
—सकल सत गाथा, अभङ्ग १७३१।
२ आम्हा स्वर्ग सुख मानू जैसा ओक। देखोनिया तुझा पद्धरीये।
न लगे वैकुंठ न वांधू कैलास। सर्वस्वांची आस देवा पायो ॥
—सकल सत गाथा, अभङ्ग ४४१।
३. नामा म्हणे पुरुषोत्तमा। स्वयें जड़लो तुझ्या प्रेमा।
मी धुडो तू आत्मा। स्वयें दोन्ही।
—सकल सत गाथा अभङ्ग १५२६।