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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 332 में से

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पृष्ठ 150

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५५
इस भारतीय दर्शन की धारा सुदूर वैदिक काल से अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित
होती चली आ रही है। इस धारा में कभी भी विराम नही आया। लगातार ब्रह्म,
जीव और माया के संबंध में विचार होता चला आ रहा है। सभी दर्शनों ने लगभग
यही निष्कर्ष दिया है कि ब्रह्म कोई अलभ्य तथा अलौकिक और अद्भुत पदार्थ नहीं है
प्रत्युत प्रत्येक प्राणी अपने भीतर नियामक (अंतर्यामी) आत्मा के रूप में उसी की
सत्ता का अनुभव किया करता है। इसी लिए ब्रह्म का साक्षात्कार करने तथा उसे
पहचानने का सबसे बड़ा उपाय है आत्मा को पहचानना और उसका साक्षात्कार
करना।
आत्मा की श्रेष्ठता
जगत् के समस्त प्रिय पदार्थों में श्रेष्ठ पदार्थ आत्मा ही है। प्रियतम होने के
कारण ही पुत्रवत्सला, करुणामयी माता की भाँति श्रुति उपदेश देती है कि आत्म तत्व
का साक्षात्कार करो।१ मुक्ति की कल्पना में पर्याप्त मतभेद होने पर भी विभिन्न
दार्शनिक इस विषय में नितांत एकमत है। आत्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना ही
मोक्ष है।२
आत्मा का ज्ञान कराना, चाहे वह ब्रह्म से भिन्न हो या अभिन्न हो प्रत्येक दर्शन
का लक्ष्य है। इस संदर्भ में दार्शनिक-शिरोमणि याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को
जो आध्यात्मिक उपदेश दिया वह भारतीय धर्म तथा दर्शन के इतिहास में सदा अमर
रहेगा। उन्होंने कहा 'पति के लिए पति प्यारा नही है बल्कि आत्मा के लिये। पत्नी
के लिए पत्नी प्यारी नही है, बल्कि आत्मा के लिए। पुत्र के लिए पुत्र प्यारा नही है
बल्कि आत्मा के लिए। संसार की समस्त वस्तुएँ अपने लिये प्यारी नही होती बल्कि
आत्मा के लिए। अतः सबसे प्रिय वस्तु आत्मा ही है। इस लिए इस आत्मा का प्रत्यक्ष
करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए तथा निदिध्यासन (सतत्
ध्यान करना) चाहिए। क्योकि आत्मा के दर्शन से, श्रवण से, मनन से तथा विज्ञान
से सब कुछ जाना जा सकता है।’३
१. आत्मा वा अरे दृष्टव्यः ।
—बृहदारण्यकोपनिषद् ५।१।१५।
२. आत्मन. स्वरूपेणावस्थितिः मोक्षः ।
३. न वा अरे पत्यु. कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।
न वा अरे पुत्राणा कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया
भवन्ति ।