सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० नामदेव की हिन्दी कविता
की जड़ को ऊपर रख और डाली, पत्ती आदि को नीचे कर दे। इस जड़ में फूल खिले
हैं। इस पद को जो समझ जाये, वह त्रिलोक को समझ सकता है।' १
इस पद का आध्यात्मिक पक्ष में उत्तर होगा—
ज्ञान द्वारा वाणी समृद्ध होती है। प्रथम जीव उत्पन्न हुआ और पश्चात् माया
प्रकट हुई। शब्द जीवात्मा की शरण में जाता है। कुण्डलिनी जागृत होकर मेरुदण्ड पर
चढ़कर फलवती होती है। कायाने अज्ञानी (सुग्गा या कुत्ता) को नष्ट कर दिया। पंच
प्राण तो घरे ही रह गये, स्वरूप की सिद्धि घर में बस गई। मूल तो मस्तिष्क में है
जिसमें कमल खिले हैं और शाखा आदि नीचे हैं। ऐसा शरीर में वृक्ष का बोध कर, तब
तीनों लोकों का ज्ञान प्राप्त होगा।
कबीर साहब कहते हैं कि हठयोगियों का ज्योति के दर्शन आदि का उपर्युक्त
ढंग से परिचय दे देना तथा इसी पर संतुष्ट होकर अपने को अमरत्व का अधिकारी तक
समझबैठना उनमें किसी कमी का होना सूचित करता है। आत्मोपलब्धि की सबसे
बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सफल हो जाने वाले व्यक्ति में अपनी अनुभूति को
अभिव्यक्ति के लिए क्षमता नहीं रहती।
इस प्रकार हम देखते हैं कि नामदेव के पश्चात् हिंदी निर्गुण काव्य की जो
प्रवृत्तियाँ हैं वे नामदेव की हिंदी रचनाओं में मिलती हैं। नामदेव की रचनाओं में इन
प्रवृत्तियों और तत्संबंधित विषयों पर संक्षेप में कहा गया है। नामदेवोत्तर कालीन संतों
ने इन पर विस्तारपूर्वक कहा है।
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१. एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढा सिंघ चरावै गाई ।। टेक ।।
पहले पूत पीछे भई माइ, चेला कै गुर लगे पाई ।
जल की मछली तरवर ब्याई, पड़ि बिलाई मुरगे खाई ।
बैलहि डारि गूँनि घरि आई, कुत्ता कूं ले गई बिलाई ॥
तलि करि साखा ऊपरि करि मूल, बहुत भांति जड़ लागे फूल ।
कहै कबीर या पद कौं बूझै ताकूं तीन्यूं त्रिभुवन सूझै ॥
—कबीर ग्रंथावली, पद ११, पृष्ठ ६२।