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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 332 में से

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पृष्ठ 154

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५६
विष्णु अन्य देवताओ की अपेक्षा मानवोचित गुणो से विभूषित है । उनमें अत्यन्त व्या-
पकत्व, अतुलनीय पराक्रम, विश्व धारण सामर्थ्य, अमृतत्व, पोषण-शक्ति, अवतार-
धारणा-शक्ति आदि की प्रतिष्ठा है।
कालांतर में विष्णु के दिव्य गुणो मे वृद्धि होती गयी और वे शील, शक्ति एवं
सौंदर्य इन तीनो विभूतियो से प्रतिष्ठित किये गये । इस प्रकार विष्णु के निर्गुण एवं
सगुण दोनो स्वरूपो का विकास हुआ।
डॉ० भांडारकर के अनुसार वैष्णव मत का प्रारम्भिक नाम ऐकान्ति धर्म था । १
भगवद्गीता इसका प्रमुख आधार ग्रंथ था। इसने साम्प्रदायिक रूप धारण कर
लिया और यह पांचरात्र या भागवत् धर्म के नाम से प्रसिद्ध हो गया । आगे चलकर
नारायणीय धर्म से इसका सम्मिलन हुआ । कालांतर में उस पर योग एवं सांख्य दर्शन
का भी प्रभाव पड़ा ।
पांचवी शताब्दी में इसका प्रभाव कम हो गया । छठी तथा सातवी शताब्दी में
आलवार भक्तो के रूप में इसका पुनः स्फुरण हुआ । मध्ययुग के आचार्यों ने इसको
पल्लवित किया । रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णु स्वामी, निम्बार्काचार्य तथा वल्लभा-
चार्य आदि ने इस मत को अच्छी प्रगति दी ।
वैष्णव धर्म का अपना विस्तृत साहित्य है । महाभारत का नारायणीयोपाख्यान,
गीता, भागवत्, नारद भक्ति सूत्र, शांडिल्य भक्ति सूत्र, विष्णु पुराण, पद्म संहिता
और लक्ष्मी तन्त्र आदि इसके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं ।
वैष्णव धर्म के सभी ग्रन्थो में भगवान् के दोनो-निर्गुण एवं सगुण-स्वरूपो का
वर्णन मिलता है । निर्गुण ब्रह्म से क्रमशः सगुण भगवान् का विकास हो जाता है ।
महाराष्ट्र का वारकरी सम्प्रदाय 'भागवत् सम्प्रदाय' है । बहुत प्राचीन काल से
महाराष्ट्र भागवत् धर्म का मुख्य क्षेत्र बना हुआ है । अपनी लोकप्रियता तथा विपुल
प्रचार के कारण वारकरी पंथ महाराष्ट्र का सार्वभौम पंथ है ।
महाराष्ट्रीय संतो की परंपरा का उदय संत ज्ञानेश्वर से माना जाता है ।
वारकरी अर्थात् वैष्णव संप्रदाय के प्रधान प्रवर्तक यही माने जाते हैं । इस संप्रदाय में
पंढरपुर के विट्ठल (पांडुरंग) की उपासना पर ही सबसे अधिक बल दिया गया है ।
भगवान् विट्ठल विष्णु के ही प्रतिरूप समझे जाते हैं। इसलिए यह संप्रदाय वैष्णव संप्रदाय
कहा जाता है । संत ज्ञानेश्वर के अतिरिक्त नामदेव, एकनाथ, तुकाराम आदि अन्य
महाराष्ट्रीय संतो ने भी इस संप्रदाय का प्रचार किया ।
१. वैष्णविज्म शैविज्म एण्ड अदर मायनर रिलीजस सेक्ट्स
—डॉ० आर० जी० भांडारकर—पृ० ९८-१०० ।