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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 332 में से

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पृष्ठ 151

१५६ नामदेव की हिन्दी कविता
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत
भारतवर्ष आदि काल से ही एक धर्म प्रधान देश रहा है। यहाँ के ऋषियों ने
समय समय पर धर्म तथा दर्शन की विस्तृत विवेचना की है। मध्ययुग के पूर्व भी यहाँ
अनेक आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत प्रचलित थे। इनमें प्रमुख
शंकराचार्य का अद्वैतवाद तथा मायावाद था। उन्होंने जैनों, बौद्धों तथा मंडन मिश्र
आदि कर्मकांडियों से शास्त्रार्थ करके अपने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया। उनके
अनुसार सब कुछ ब्रह्म है। यह संसार असत्य है, भ्रम है। १ जिस प्रकार हम अँधेरे में,
रस्सी को देखकर साँप की कल्पना कर भयभीत होते हैं उसी प्रकार इस संसार को,
असत्य जान ममता, मोह के बंधन में पड़कर हम दुःख भोगते हैं। उनके अनुसार जीव
और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं। जीव ब्रह्म का ही रूप है जो माया के कारण ब्रह्म से,
भिन्न प्रतीत होता है। इस प्रकार शंकराचार्य 'अहं ब्रह्मास्मि' के सिद्धांत को माननेवाले,
थे। उन्होंने बौद्ध दर्शन के स्थान पर अपने दार्शनिक सिद्धांतों को रखा जो अब तक
किसी न किसी रूप में चले आ रहे हैं।
वैष्णव आचार्यों की परम्परा में सर्वप्रथम नाम नाथमुनि का आता है। नाथ
मुनि का आविर्भाव नवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध अथवा दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ काल
में हुआ। कहा जाता है कि सर्वप्रथम उन्होंने ही आठवार भक्तों के पदों का संकलन
किया। उनकी परम्परा में पुण्डरीकाक्ष एवं राम मिश्र नामक दो अन्य आचार्य हुए।
तत्पश्चात् यामुनाचार्य तथा प्रसिद्ध स्वामी रामानुजाचार्य इस सम्प्रदाय के आचार्य हुए।
रामानुजाचार्य के पश्चात् भी थी सम्प्रदाय की परम्परा आगे चलती रही। इनकी चौथी
या पांचवी शिष्य परम्परा में सुप्रसिद्ध स्वामी रामानंद हुए। २
शंकराचार्य ने जिस अद्वैतवाद का निरूपण किया था वह भक्ति के सन्निवेश के
लिए उपयुक्त न था। अतः स्वामी रामानुजाचार्य ने एक अन्य मत विशिष्टाद्वैत की
स्थापना की। जिसके अनुसार जीव (चित्) और जगत् (अचित्) ब्रह्म के ही
विक्षेप हैं। माया उसी ब्रह्म की शक्ति है। जीव भक्ति द्वारा ब्रह्म का चिरंतन सामीप्य
प्राप्त कर लेता है जो उसका परम लक्ष्य है। जैसा कि अद्वैतवाद में माना जाता है,
जीव अपने अस्तित्व को ब्रह्म में खो नहीं देता।
न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।
आत्मा वा रे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि ।
आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम् ।
—बृहदारण्यकोपनिषद् २।४।५ ।
१ ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ।
२ हिन्दी साहित्य की भूमिका डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ४७ ।