सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्माण का बड़ा आलंकारिक वर्णन किया है जो इतिहास की घटनाओं से विरोध नही
खाता । परन्तु यहाँ ज्ञानदेव द्वारा 'पाया' (नींव) रखने का मतलब यह नही है कि
उन्होने इस मत का प्रारम्भ किया । यथार्थ बात तो यह है कि ज्ञानदेव के पूर्व ही इस
सम्प्रदाय के भक्तों की स्थिति थी परन्तु वे इधर-उधर बिखरे हुए थे । इन सब को
एक सूत्र में संगठित कर पथ को व्यवस्थित रूप देने का स्तुत्य कार्य ज्ञानेश्वर ने किया
इसीलिए वे इस संप्रदाय के मान्य आचार्य हैं । कृष्ण भक्ति के प्रचार के निमित्त ज्ञानदेव
ने अपने भ्राता निवृत्तिनाथ तथा सोपानदेव एवं भगिनी मुक्ताबाई के सहयोग से जो
महनीय कार्य किया उसके कारण आज भी महाराष्ट्र में अद्वैतवाद के साथ कृष्ण-भक्ति
का मनोरम सामंजस्य दिखाई देता है ।
प्रसिद्ध है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठलपंत ने संन्यास ले लिया था परन्तु
अपने गुरु रामानन्द के आग्रह से फिर वे गृहस्थी में प्रवृत्त हुए । इन्हीं के पूर्वोक्त चार
संतानें हुईं । इनकी गुरु परम्परा नाथ संप्रदाय के आचार्यों से संबद्ध मानी जाती है ।
गोरखनाथ के शिष्य गैनीनाथ ने निवृत्तिनाथ को स्वयं कृष्ण भक्ति की दीक्षा दी थी
और निवृत्तिनाथ ने फिर अपने दोनों अनुजों तथा भगिनी मुक्ताबाई को स्वयं दीक्षा
देकर अध्यात्म मार्ग का पथिक बनाया । निवृत्तिनाथ का कथन है कि प्राणियों का उद्धार
कर्ता वह श्रीधर है । कर्म सहित ब्रह्म साक्षात् श्रीकृष्ण मूर्ति है । वह रूप इस भूमंडल पर
सचमुच पांडुरंग रूप है, जो पुण्डलीक के निर्धार से यहाँ खड़ा है ।१ निवृत्तिनाथ की
शिक्षा में योग के साथ भक्ति का मंजुल मिश्रण था ।
वारकरी मत के सिद्धांत
(१) विट्ठल—वारकरी मत में सर्वश्रेष्ठ देवता पंढरीनाथ है जो बालकृष्ण के
ही रूप है । इस प्रकार यह कृष्णोपासक संप्रदाय है । यह विट्ठल संप्रदाय सं० १२६६
(ई० स० १२०६) के लगभग पंढरपुर में प्रचारित हुआ । इसके प्रचारक कन्नड संत
पुंडलीक कहे जाते है । विट्ठल संप्रदाय, वैष्णव तथा शैव संप्रदायों का मिश्रित रूप है ।
इस प्रकार विट्ठल संप्रदाय के संत विष्णु और शिव में कोई अन्तर नही मानते । विट्ठल
की उपासना विष्णु के अवतार वासुदेव कृष्ण की उपासना से ही आरम्भ हुई पर
१. प्राणिया उद्धार सर्व हा श्रीधर ।
ब्रह्म हें साचार कृष्णमूर्ती ।
तें रूप भीवरें पांडुरंग खरें ।
पुण्डलीक निर्धारि उभे असे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग २३० ।