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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 332 में से

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पृष्ठ 145

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४६
यदि इस उलटबांसी की इन दो पंक्तियों पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाय तो
पता चलेगा कि कबीर जिस 'घड़े' की ओर संकेत कर रहे हैं वह किसी ऐसी वस्तु का
प्रतीक है जो नष्ट कर देने पर ही समुचित उपयोग में लायी जा सकती है। वह वस्तु
(नर-देह) मानव-जीवन से भिन्न नहीं है जिसमें आमूल परिवर्तन लाने पर ही जीवन्मुक्त
की सहज दशा उपलब्ध हो पाती है।
'कबीर ग्रन्थावली' के अंतर्गत उलटबासी का एक अन्य पद इस प्रकार आता
है : 'हे अवधू ! जागते समय नीद मे नही आना चाहिए। ऐसा करना चाहिए जिसमें
न तो हम काल का ग्रास बनें, न हमारा शरीर जरा के कारण जीर्ण हो सके। इसके
लिए चाहिए कि गंगा उलट कर समुद्र को सोख ले, चंद्रमा सूर्य को निगल जाय, रोगी
नव ग्रहों को मार डाले और जल में बिंब प्रकाशित हो उठे। डाल के पकड़ने से मूल
नही दीख पड़ता और मूल के पकड़ने पर फल की प्राप्ति हो जाती है। बाँबी उलटकर
सर्प को लग जाती है और पृथ्वी महारस का पान करती है। गुफा में बैठे रहने पर
सारा संसार दीखने लगता है, बाहर कुछ भी नही सूझ पड़ता। मनुष्य उलटकर बाण
चलाने वाले को ही मार डालता है और यह आश्चर्य विरला ही बूझ पाता है औंधा
घड़ा जल में नही डूबता, सीधा रहने पर पूरा-पूरा भर जाता है और जिसके प्रति
जगत् घृणा प्रदर्शित करता है उसी के प्रसाद से निस्तार होता है।'
एक और उलटबासी को अर्थ-सहित देखिये—
'ऐ भाई ! एक अचंभा देखो। सिंह खड़ा गाय को चरा रहा है। पहले पुत्र
हुआ और तत्पश्चात् माता हुई। गुरु शिष्य के पांव पकड़ रहा है। जल में रहने वाली
मछली पेड़ पर जाकर जनती है। मुर्गे ने बिल्ली को पकड़ कर खा लिया। बैल तो
खड़ा ही रहा और गोनी गृह में प्रवेश कर गई। बिल्ली कुत्ते को दबोच ले गई। पेड़
१. अवधू जागत नीद न कीजै।
काल न खाइ कल्प नही व्यापै देही जरा न छीजै ॥ टेक ॥
उलटी गंग समुंद्र हि सोखै ससिहर सूर गरासै।
नव ग्रिह मारि रोगिया बैठै, जल मे ब्यंब प्रकासै ॥
डाल गह्या थै मूल न सूझै, मूल गह्या फल पावा।
बंबई उलटि सरप कौ लागी, धरणि महा रस खावा।
बैठि गुफा मे सब जग देख्या, बाहरि कछु न सूझै।
उलटै धन कि पारथी मान्यौ, यहु अचिरज कोई बूझै।
औंधा घड़ा न जलमै डुबै, सूधा सूभर भरिया।
जाकौ यहु जग धिणा करि चालै, ता प्रसादि निस्तरिया।
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १४१-१४२।