सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

१६४ नामदेव की हिन्दी कविता
संतो को ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्म रूप बनकर जगत् में प्राणियों के भीतर अंतर्यामी
रूप से विद्यमान ब्रह्म की सेवा करनी चाहिए । इस विषय का बड़ी रोचक वर्णन संत
ज्ञानेश्वर ने किया है। उन्होने अपने 'अमृतानुभव' में एक बड़ा ही सुंदर दृष्टांत उस
सामंजस्य की तुलना के लिए दिया है । वे कहते हैं कि 'यदि एक ही पर्वत को काटकर
उसकी गुफा के भीतर देवता, देवालय तथा भक्त-परिवार का निर्माण एक साथ किया
जा सकता है, तो अद्वैत भाव के साथ भक्ति क्यों संभव नही है ?'१
'ज्ञानेश्वरी' में ज्ञानेश्वर इस तथ्य को आत्मानुभव का उदाहरण मानते हैं जो
शब्दो के द्वारा ठीक-ठीक प्रकट नही किया जा सकता । साढ़े पंद्रह के सोने में अर्थात्
खरे सोने में खरा सोना मिला देने पर ही उत्तम सुवर्ण तैयार होता है उसी प्रकार
मद् रूप होने पर ही मद्भक्ति उत्पन्न होती है । यदि गंगा समुद्र से भिन्न होती तो उसके
साथ मिलकर वह एकाकार कैसे बन जाती ?'२ इसी प्रकार भगवान् का भक्त भगवान को
अद्वैत रीति से जान कर ही उसका सच्चा भक्त बन सकता है ।
नामदेव ने इस संप्रदाय की विशेषता अद्वैत ज्ञान के साथ भक्ति का मृदुल सामंजस्य
कर बतलाई है । इन भक्तों की पूर्ण निष्ठा थी कि उपनिषदो का परब्रह्म ही विट्ठल के
रूप में प्रकट हुआ है । ज्ञान के साथ भक्ति का योग हो जाने से इनकी वाणी में अतीव
मृदुता और मधुरता आ गई है । इनका विश्वास था कि निर्गुण ब्रह्म ही नाम रूप को
ग्रहण कर भक्तो की मंगल-कामना के निमित्त इंद्रिय गम्य बन गया है। नामदेव ने
अभंगो द्वारा ब्रह्म रस तथा भक्ति रस के ऐक्य का प्रतिपादन किया है । नामदेव भगवान्
को सख्य कर पुकार रहे हैं कि 'भगवान् जल्दी आइए, पुकारते-पुकारते गला सूख गया,
शरीर पुलकित हो गया तथा अश्रु धाराओ से पृथ्वी भीग गई । हे दीन दयालु ! आने में
इतनी देर क्यों कर रहे हो ? किसी भक्त के यहाँ तो नही फँस गये ?'३
१. देव देऊल परिवारु । कीजे कोरूनि डोंगरू ॥
तैसा भक्तीचा वेव्हारु । का न व्हावा ? ॥ ४१ ॥
—अमृतानुभव ।
२. साडे पंधरा मिसलावे । तें साडे पंधराचि होआवे ।
तेवि मो आलिया समवे । भक्ति माझी ॥ ५६७ ॥
ह्वां गा सिंधूसि आनी होती । तरि गंगा कैसेनि मिलती ।
म्हणोनि मी न होता भक्तो । अन्वयो आहे ॥ ५६८ ॥
—ज्ञानेश्वरी, अध्याय १५ ।
३. येवडा वेल का लाविला । कोण्या भवताने गोविला ?
झडकरी येई गा विठ्ठला । कंठ आळविता सुकला ।