सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६७
यही एक ब्रह्म अपूर्व, अद्वितीय, अनन्तर और अबाह्य है। १
ब्रह्म एक ही है दूसरा नहीं। २
यह निखिल जगत् ब्रह्म ही है। ३
सकल विश्व ब्रह्म ही है। ४
वह माया से विश्व का सृजन करता है। ५
अद्वैत वेदांत दर्शन ने ब्रह्म ही को पारमार्थिक सत्य कहा है। शंकराचार्य का
कथन है।—जिसका स्वरूप सदा सर्वदा अखण्ड रूप में एक ही सा बना रहे वही
पारमार्थिक सत्ता हो सकती है। ६
नामरूपात्मक जगत् सत्य रूपेण सत्य है अर्थात् ब्रह्म सर्वव्यापी, अखण्ड, एकरस
सब में है अतः ये उसकी विद्यमानता के कारण सत्य है किन्तु विकार-जनित होने से
अपने विशेष नाम व रूपधारी स्वरूप में असत् है क्योंकि ये सब देश, काल और अवस्था
के द्वारा बाधित हो जाते हैं। ७
उपर्युक्त ब्रह्म सम्बन्धी विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्म विश्व का
मूल तत्त्व है। वह निर्गुण, अव्यक्त, अचिंत्य, निराकार तथा अनिर्वचनीय है। व्यक्त
रूप में वही सृष्टिकर्त्ता, धर्त्ता, संहारक आदि भी है।
नामदेव द्वारा ब्रह्म वर्णन
ब्रह्म के सर्व शक्तिमान तथा सर्वव्यापक रूप के पर्याप्त प्रमाण नामदेव के पद
साहित्य में मिलते है।
नामदेव के अनुसार ईश्वर एक है जो सर्वव्यापक और सर्वपूरक है। जिधर
१. तदेतत् ब्रह्म अपूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम् ।
—बृहदा. २।५।१६ ।
२. ब्रह्म एकमेवाद्वितीयम् ।
—छान्दोग्य. उप, ६।१।१।
३. एकमेव सत् नेह नानास्ति किंचन ।
—बृहदा. उप. ३।८।८।
४. सर्वं खल्विदं ब्रह्म ।
—छांदोग्य. उप. ३।१४।१।
५. माया सृजते विश्वमेतत् । —श्वेता. उप, ४।६।
६. एक रूपेण हि अवस्थितो योऽर्थः स परमार्थः ।
—शांकर भाष्य २।१।११।
७. सर्वं च नामरूपादि सदारमनेव सत्यं विकारजातं स्वतस्तु अनृतमेव ।
—छान्दोग्य० उप० ६ । ३ । २ ।