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सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 332 में से

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पृष्ठ 149

१५४ नामदेव की हिन्दी कविता -
मिलता है और इसे जानने की इच्छा रखने वाला तो विरला ही होता है ।१
ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए की गयी जिज्ञासा- ब्रह्म जिज्ञासा कही जाती है,
इसी लिए वेदान्त ब्रह्म सूत्र का आरंभ 'अथा तो ब्रह्म जिज्ञासा' से किया गया है।
ब्रह्म विद्या अथवा ब्रह्म ज्ञान हर किसी को उपलब्ध नहीं होता। मुण्डकोप-
निषद में कहा है—
'परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही प्राप्त
हो सकता है। यह जिसको स्वीकार कर लेता है उसके लिए ही अपने यथार्थ स्वरूप
को प्रकट कर देता है।२
मुण्डकोपनिषद ने ब्रह्म विद्या को सर्व विद्या प्रतिष्ठा बतलाया है।३ भगवान्
श्रीकृष्ण ने गीता में अपनी व्यापक विभूतियों के वर्णन के अवसर पर समस्त विद्याओं में
अध्यात्म विद्या (दर्शन शास्त्र) को अपना स्वरूप बतलाकर उसकी महत्ता पूर्णरूपेण
प्रदर्शित की है।४
संक्षेप में जीव, जगत्, और परमात्मा का स्वरूप तथा उनके पारस्परिक संबंध
निश्चित करना दर्शनशास्त्र का उद्दिष्ट है। इस प्रकार दर्शनशास्त्र अंतिम सत्य
(Ultimate reality) के उद्घाटन का प्रयत्न करता है। पर इस अंतिम सत्य के
स्वरूप के संबंध में सभी दार्शनिक सहमत नहीं है।
भारतवर्ष में दर्शन तथा धर्म का, तत्त्वज्ञान तथा भारतीय जीवन का घनिष्ठ
संबंध है। ताप त्रय—आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक—से संतप्त मानव
की शांति के लिए, क्लेशमय संसार से आत्यंतिक दुःख निवृत्ति के लिए भारत में दर्शन
शास्त्र का आविर्भाव हुआ है। दर्शन शास्त्र के द्वारा सुचिंतित आध्यात्मिक तथ्यों पर ही
भारतीय धर्म की दृढ़ प्रतिष्ठा है।
१ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥
—कठोपनिषद् १।२।२।
२ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥
—मुण्डकोपनिषद् ३।२।३ ।
३ स ब्रह्म विद्यां सर्व विद्या प्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठ पुत्राय प्राह ।
—मुण्डकोपनिषद् १।१।
४ अध्यात्म विद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ।
—गीता १०।३२