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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 332 में से

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पृष्ठ 148

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा
भारतीय दर्शन
इस संसार में आकर जीवन संग्राम में अपने को विजयी बनाना प्रत्येक मनुष्य
का कर्तव्य है। अन्य जीवित प्राणियों के समान मनुष्य भी अपने को जीवित बनाये
रखने के लिए अपने परिवेश से निरंतर संघर्ष करता रहता है। परन्तु वह विवेक-प्रधान
जीव होने के कारण प्रत्येक अनुष्ठान के अवसर पर अपनी विचार शक्ति का उपयोग
करता है। शांत चित्त से विचार करने पर प्रतीत होगा कि प्रत्येक मानव दृश्य या
अदृश्य जगत् विषयक कतिपय श्रद्धाओं, विचारों तथा कल्पनाओं का एक समुदाय मात्र
है। निखिल मानवीय कार्य विधानों की आधारशिला मानवीय विचार है। गीता कहती
है कि श्रद्धाओं के अनुरूप ही मनुष्य होता है।१ उसकी कार्य प्रणाली निश्चित होती है
तथा उसी के अनुरूप उसे फल की उपलब्धि होती है। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य की
एक दृष्टि होती है, उसका एक दर्शन होता है।
सृष्टि विभिन्न रूपा होकर भी एक है। अंग्रेजी में इसका नाम ही युनिव्हर्स
(Universe) है जिसे हिंदी में एकात्म काव्य कहा जा सकता है। वेद तो इसे देव का
काव्य कहता है। काव्य की संगीतात्मक, भावात्मक एवं कल्पनात्मक एकता उसके जनक
चेतन तत्त्व की एकरूपता को प्रकट करती है। इसी प्रकार सृष्टि का काव्यत्व
(Harmony) उसके एक स्रष्टा होने का संकेत देता है जो चेतन है।२ ब्रह्म विद्या में
इन सभी बातों पर विचार किया जाता है।
अध्यात्म विद्या भारतीय मनीषियों की प्रतिष्ठा की वस्तु रही है। सभी ज्ञान
तथा विषयों में इसे सर्वोत्कृष्ट कहा जाता रहा है। कठोपनिषद् में इस विद्या के संबंध में
लिखा है—
'ब्रह्म विद्या बहुतों को तो सुनने को भी नहो मिलती और बहुत से इसे सुनकर
समझ ही नहो पाते। इस गूढ़ अध्यात्म विद्या का वर्णन करनेवाला भी कठिनाई से
१. यो यच्छ्रद्धः स एव सः । गीता १७।३
२. भक्ति का विकास, डॉ० मुंशीराम शर्मा, पृ० ११ ।