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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 332 में से

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पृष्ठ 158

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६३
आगे चल कर विट्ठल और पांडुरंग में कोई अन्तर नही रह गया । पांडुरंग वस्तुतः श्वेत
अंग वाले शिव ही हैं। इस प्रकार विष्णु ही शिव है। और शिव ही विष्णु हैं। पंढरपुर
में विट्ठल की मूति शिवलिंग को शीश पर धारण किये हुए विष्णु की ही है।¹ ये
विट्ठल इस भांति एक सर्वव्यापी ब्रह्म के प्रतीक बन कर समस्त महाराष्ट्र में आराध्य
मान लिए गए। ऐसा ज्ञात होता है कि आठवी शताब्दी के शैव धर्म से ग्यारहवी
शताब्दी के वैष्णव धर्म का समझोता विट्ठल संप्रदाय के रूप में हुआ जिसके सबसे
महान् संत नामदेव हुए। ज्ञानेश्वर और नामदेव ने साथ-साथ सारे उत्तर भारत का
पर्यटन किया और अपने इस व्यापक धर्म का प्रचार किया। इस विट्ठल संप्रदाय के
अन्तर्गत अनेक संत हुए जिनमें गोरा कुम्हार, सावंता माली, नरहरी सोनार, चोखा
मेला, दासी जनाबाई, सेना नाई तथा कन्होपात्रा वेश्यापुत्री प्रमुख है।२
इस संप्रदाय में दक्षिण भारत के शैवो और वैष्णवो के बीच चलने वाले संघर्ष
का कही नाम व निशान तक नही है । कृष्णोपासक होने पर भी शिव को पूर्ण मान्यता
प्रदान करने का एक ऐतिहासिक हेतु भी है। ज्ञानदेव जो इस संप्रदाय के आदि
प्रतिष्ठापक थे स्वयं नाथ सप्रदाय में दीक्षित थे और नाथ संप्रदाय के आदि आचार्य
शिवजी ही है जो 'आदि नाथ' नाम से विख्यात है। इस प्रकार वारकरी संप्रदाय धार्मिक
मामलों में सदा उदार तथा समन्वयवादी रहा।³
(२) भक्ति तथा अद्वैत ज्ञान—वारकरी संप्रदाय की समन्वयवादी प्रवृत्ति का
दूसरा उदाहरण है अद्वैत ज्ञान तथा भक्ति का पूर्ण सामंजस्य । वारकरी पंथ आदि से
लेकर अन्त तक भक्ति-प्रधान है परन्तु उपनिषदों का 'एकमेवाद्वितीय ब्रह्म' तथा 'नेह
नानास्ति किंचन' आदि वाक्यो के द्वारा प्रतिपादित अद्वैत ब्रह्म में भी इसके अनुयायियों
की पूर्ण आस्था है। संत तुकाराम का स्पष्ट कथन है कि यह जगत् विष्णुमय है, वैष्णवों
का यही धर्म है। हरि के विषय मे भेदाभेद मानना अमंगलकारक भ्रम है।४
यह संप्रदाय निष्काम कर्म की शिक्षा सर्वतोभावेन देता है। यह पूर्ण प्रवृत्ति-
मार्गी है।
१. रूप पाहता डोलसू । सुंदर पाहता गोपवेपु ।।
महिमा वर्णिता महेसू । जेणे मस्तकी वंदिला ।।
—श्री ज्ञानेश्वर का अभंग, भागवत संप्रदाय, पृ० ५८७ ।
२. हिंदी साहित्य (द्वितीय खण्ड) पृ० १६१ ।
३. भागवत संप्रदाय ; डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ५८७ ।
४. विष्णुमय जग वैष्णवाचा धर्म ।
भेदाभेद भ्रम अमंगल ॥
—संत तुकाराम का गाथा ।