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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 332 में से

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पृष्ठ 160

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६५
(३) भगवत् रूप—वारकरी पंथ को भगवान् के दोनों रूप—सगुण तथा
निर्गुण मान्य हैं। पूर्ण सगुणोपासक होने पर वह परमात्मा को व्यापक एवं निर्गुण-
निराकार भी मानता है तथा इस निराकार ब्रह्म की प्राप्ति का साधन सगुणोपासना,
नाम स्मरण तथा भजन है।
वारकरी संतों ने ज्ञान तथा भक्ति के परस्पर सहयोग तथा मैत्री भाव पर
विशेष बल दिया है। संत एकनाथ ने भक्ति तथा ज्ञान के परस्पर संबंध की सूचना
बड़े ही रोचक उदाहरण द्वारा दी है। वे भक्ति को मूल, ज्ञान को फल तथा वैराग्य को
फूल बतलाते हैं। जिस प्रकार बिना मूल के फल उत्पन्न नहीं हो सकता और बिना
फूल के फल असम्भव है उसी प्रकार बिना भक्ति और वैराग्य के ज्ञान का उदय नहीं
हो सकता। 'भक्ति के उदर से ज्ञान उत्पन्न होता है। भक्ति ने ही ज्ञान को उसका
गौरव प्रदान किया है। अतः दोनों का मधुर समन्वय ही साधक के लिए अवश्यमेव
संपादनीय व्यापार है।'१
वारकरी पन्थ के सिद्धान्त की विशेषता
वारकरी पंथ के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाला संत तुकाराम का एक
प्रसिद्ध अभंग है जिसमें वे कहते हैं कि 'मुख से विट्ठल के नाम का उच्चारण, गले में
तुलसी की माला धारण करना तथा एकादशी का व्रत रखना—ये तीन इस पंथ के
मान्य सिद्धांत हैं।'२ इष्टदेव तो विट्ठल हैं। विष्णु के सभी अवतार मान्य हैं परन्तु
राम-कृष्ण विशेष रूप से अभीष्ट हैं। भगवान् के सगुण तथा निर्गुण रूप एक ही हैं।
ध्येय है अभेद-भक्ति, अद्वैत भक्ति अथवा मुक्ति के परे की भक्ति। अद्वैत का सिद्धांत
इस सम्प्रदाय को स्वीकार है परन्तु इस कौशल के साथ इस ध्येय को प्राप्त करना उचित
है कि अभेद को सिद्ध करके भी संसार में प्रेम-सुख बढ़ाने के लिए भेद को भी अभेद
कर रखना। इस पंथ में भक्ति और ज्ञान दोनों की एकरूपता मानी गई है, जिसके
नामा गहिवरें दाटला । पूर धरणिये लोटला ॥
—नामदेवाचा गाथा ।
१. भक्तिचें उदरीं जन्मलें ज्ञान । भक्तीनें ज्ञानासी दिधलें महिमान ॥
भक्ती तें मूल, ज्ञान तें फल । वैराग्य केवळ तेथीचे फूल ॥
—संत वचनामृत : रा० द० रानडे, पृ० १६६ ।
२. आम्ही तेणें सुखी, म्हणा विट्ठल-विट्ठल मुखीं ।
कंठी मिरवा तुलसी, व्रत करा एकादशी ॥
—भागवत सम्प्रदाय—पृ० ५१६ पर उद्धृत ।