सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
DevanagariHindipublished332 पृष्ठ
पृष्ठ 152, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 152नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५७
नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५७
आचार्य रामानुज के महान् व्यक्तित्व के कारण वैष्णव सम्प्रदाय की लोक-
प्रियता बहुत बढ़ी। उन्होंने शंकराचार्य के मायावाद का खण्डन किया तथा यह सिद्ध
किया कि ब्रह्म की एकता अद्वितीय नहीं है अपितु वह चिन्मय आत्मा तथा जड़ प्रकृति
से विशिष्ट है। १
अन्य वैष्णव आचार्यों का लक्ष्य भी शंकराचार्य के मायावाद तथा विवर्तवाद से
पीछा छुड़ाना था जिसके अनुसार भक्ति अविद्या ठहरती है। शंकराचार्य ने केवल निरू-
पाधि निर्गुण ब्रह्म की ही पारमार्थिक सत्ता स्वीकार की है। वल्लभाचार्य ने ब्रह्म में
सर्व धर्म माने हैं। सारी सृष्टि को उन्होंने लीला के लिए ब्रह्म की आत्मकृति कहा है।
अक्षर ब्रह्म अपनी आविर्भाव तथा तिरोभाव की अचिन्त्य शक्ति से जगत् के रूप
में परिणत होता है और उससे परे भी रहता है। ब्रह्म सत्, चित्, तथा आनन्द से युक्त
है। जीव में आनन्द का तथा जड़ में चित् तथा आनन्द दोनों का तिरोभाव रहता है।
माया कोई वस्तु नहीं। श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं जो पुरुषोत्तम कहलाते हैं। वे अपने
भक्तों के लिये 'व्यापी वैकुण्ठ' में (जो विष्णु के वैकुण्ठ से ऊपर है) अनेक प्रकार की
क्रीड़ाएँ करते रहते हैं। भगवान् की इस 'नित्य लीला सृष्टि' में प्रवेश करना ही जीव
की सबसे उत्तम गति है। शंकर ने निर्गुण को ही ब्रह्म का पारमार्थिक रूप कहा था
और सगुण को व्यावहारिक या मायिक। किन्तु वल्लभाचार्य ने बात उलटकर सगुण
रूप को ही असली पारमार्थिक रूप बताया और निर्गुण को उसका अंशतः तिरोहित
रूप कहा।
प्रायः सभी वैष्णव आचार्यों ने (मध्व, निम्बार्क, रामानुज, विष्णु स्वामी)
वेदान्त सूत्रों के प्रतिपादित अद्वैतवाद को लेकर चलते हुए मूल सिद्धान्तों में कुछ छोटे-
मोटे परिवर्तन भी किये हैं। फलस्वरूप अलग-अलग सिद्धान्तों की स्थापना हुई। वास्तव
में सभी ने सिद्धान्त की दृष्टि से अद्वैतवाद को माना है किन्तु साथ ही साथ व्यवहार
की दृष्टि से द्वैतद्वैतवाद का भी सहारा लिया है।
विदेशी दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रभाव
वैष्णव आचार्यों के दार्शनिक सिद्धान्तो के अतिरिक्त तत्कालीन मुसलमान
सभ्यता के कारण विदेशी दार्शनिक सिद्धान्तो का भी प्रचार हुआ। मध्ययुग में हिन्दू
और बौद्ध धर्म के बाद इस्लाम धर्म की ही मान्यता और प्रतिष्ठा थी। शासक वर्ग का
धर्म होने के कारण उसका प्रसार व प्रचार और भी अधिक बढ़ा। शासक वर्ग का धर्म
शासित वर्ग को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित करता है। यद्यपि सन्त लोग
१. भारतीय दर्शन : डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४६५।