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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 332 में से

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पृष्ठ 143

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४७
एक ऐसो आश्चर्यजनक घटना घटी कि जिसका वर्णन नही किया जा सकता ।
चोटी की आँखो में गजेन्द्र समा गया । कोई कहता है कि वह (परमात्मा) पास ही है
तो कोई कहता है कि दूर । पानी में रहने वाली मछली खजूर के पेड़ पर चढ सकती
है ? कोई कहता है कि वह इंद्रियों के अधीन है तो कोई कहता है कि यह मुक्त है ।
मूर्ख को वह सहज समाधि द्वारा प्राप्त नही हो सकता । कोई वेद पुराणा का स्मरण
करने के लिए कहता है । सद्गुरु ने निर्वाण पद का वर्णन किया । नामदेव कहते है कि
जिस परम तत्त्व की रूपरेखा नहीं है उसका वर्णन मै कैसे कर सकता हूँ ?'१
'पंडितो इस पद का अर्थ बताओ । मै जब सात वर्ष का था तब मेरी माता पाँच
वर्ष की थी । अगम्य तथा अलक्ष्य का विचार कर देखो । खरगोश ने कुत्ते को छिराया ।
जल की मछली आकाश पर चढ़ गई । गाय बाघ का पीछा कर रही है । बूंद मे
समुद्र नाचता है और बूंद समुद्र में समा गई । नामदेव का एकमात्र सहारा तू ही है ।
तू अलक्ष्य है । मुझे देखा नही जा सकता ।'२
'आहिस्ता आहिस्ता भोजन कैमे किया जाय, यह कहा नही जा सकता । हम
खायें और निर्मल होवें । पहले मै अपनी माता को ही खा गया । तत्पश्चात् सगे जामात
को खा गया । सूर्य को निगल गया तब चंद्र को उगल दिया । फिर मैं श्वशुर को खा
जाऊँगा । तत्पश्चात् पंच लोक निगल जाऊँगा । नामदेव कहते हैं कि यह सिद्धो का
योग है ।'३
१. अदबुद अचंभा कथ्या न जाई । चोटी के नेत्र कैसे गजिंद्र समाई ।
कोई बोले नेरे कोई बोले दूरि । जल की मछली कैसे चढ़ै पजूरि ॥ १ ॥
कोई बोले इंद्री बाध्या कोई बोले मुक्ता । सहजि समाधिन चीन्हे मुगधा । २ ।
कोई बोले वेद सुमृत पुराना । सतगुरु कथीया पद निरवाना ॥ ३ ॥
कहै नामदेव परम तत है ऐसा है । जाके रूष न रेख वरण कहो कैसा ॥४॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६ ।
२. पांडे एह अरथि लगाई ।
सात वरस को मांहि हो । तब पाँच वरस की माई ॥ टेक ॥
अगम अलेप विचारि देषौ । ससु स्वान छिपाई ।
मीन जलको गगन चढीयी । बाघ पेदे गाई ॥ १ ॥
समंद भीतरि बूँद जावै । बूँद समंद समाई ।
नामदेव के एक सोई । अलप लख्यो न जाई ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०४ ।
३. धोरे धीरे पाइबो कचन न जेवो । आपन पैबो तब नूमल ह्वै बो ॥
पहली पेह्रौं आई माई । पीछे पेह्रौं सगा जंवाई । १ ॥