सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६१
पत्नी (जीव) का पति (ब्रह्म) के प्रति कैसा प्रेम होना चाहिए इसके लिए
नामदेव ने क्षुधा ओर तृषातुर, लोभी एवं कामी व्यक्ति और माता तथा सुत के प्रेम का
आदर्श उपस्थित किया है ।¹ आदि वैष्णव भक्ति के अनुरूप ही है ।
भगवान का लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप
भगवान् के लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप की प्रतिष्ठा वैष्णव मत की विशे-
षता है । नामदेव में भी यह विशेषता पाई जाती है । वे कहते हैं कि हे ईश्वर ! तुम्हारी
कृपा से पत्थर समुद्र पर तैर उठे थे । फलस्वरूप तुम्हारा स्मरण करने से भक्त भव-
सागर क्यो न तर जायेंगे ?²
इस प्रकार यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि नामदेव वैष्णव मत से प्रभावित
है जिसके फलस्वरूप उन्होंने वैष्णवों के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की ।
(ख) महाराष्ट्रीय वारकरी संप्रदाय—महाराष्ट्र का भागवत धर्म जो वारकरी
ग्रन्थ के नाम से प्रसिद्ध है पूर्ण रूप से वैदिक है। यह वारकरी पंथ चतुर्व्यूह के सिद्धान
को बिलकुल नही मानता । अद्वैत ज्ञान के साथ भक्ति का मंजुल सम्मिलन वारकरी पंथ
की विशेषता है । इस पंथ के देवता श्री विट्ठल (थो पाडुरंग) हैं जो श्रीकृष्ण के बाल
रूप माने जाते हैं ।
वारकरी संप्रदाय का उदय
इस संप्रदाय का उदय कब हुआ इस विषय में विद्वानो के भिन्न-भिन्न मत हैं।
संत तुकाराम की शिष्या बहिणाबाई ने एक अभङ्ग में³ वारकरी पंथ के मंदिर के
१. जैसी भूखै प्रीति अनाज । तृषावंत जल सेती काज ।
जैसी पर पुरखारत नारी । लोभी नर धन का हितकारी ।
जैसी प्रीति बारिक अरन माता । ऐसा हरि सेती मनु राता ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ४८ ।
२. देवा पाहन तारीअले ।
—राम कहत जन कस न तरे ॥१॥ सं० ना० हिं० प०, पद १४६ ।
३. संत कृपा झाली । इमारत फळा आली ॥१॥
ज्ञानदेवे रचिला पाया । उभारिले देवालय ॥२॥
नामा तयाचा किंकर । तेणे केला हा विस्तार ॥३॥
जनार्दन एकनाथ । ध्वज उभारिला भागवत ॥४॥
भजन करा सावकाश । तुका झालासे कळस ॥५॥
—भागवत संप्रदाय, पृ० ५७२
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