सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० नामदेव की हिन्दी कविता
उत्तर भारत में भागवत धर्म की पताका फहराने वाले पहले संत नामदेव थे।
ये परम वैष्णव थे। उन्होंने हरि के दासों (वैष्णवों) की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। संत
(वैष्णव) सदा सुखी हों। उनको दीर्घायु प्राप्त हो। उनको अहंकार का स्पर्श न हो।
पांडुरंग का नाम जिनकी वाणी के लिए थाती बन गया है, ऐसे संतजनों की नामदेव
मंगल कामना करते हैं।१
वैष्णव मत का उपादान—भक्ति तत्व
वैष्णव मत का दूसरा प्रमुख उपादान भक्ति तत्त्व है। वैष्णव धर्म की इस भक्ति
में प्रेम का विशेष महत्त्व है। वैष्णव धर्म का प्रेम प्रधान भक्ति तत्त्व नामदेव को पूर्णतया
मान्य है। उनकी भक्ति प्रेमा भक्ति है। उन्होंने स्थान स्थान पर इस भक्ति की महिमा
का वर्णन किया है—
'मै बावरी हूँ, राम मेरे पति हैं, मैं बडे मनोयोग से रच-रच कर उनके लिए
श्रृंगार करती हूँ।'२
'हे प्रभु ! तुम्हारे सामीप्य के लिए मैं व्यग्र हूँ। जैसे बछड़े के बिना गाय व्याकुल
रहती है, और पानी के बिना मछली तड़पती है—ठीक वैसे ही राम नाम के बिना
बेचारा नामदेव पीड़ित है।'३
'जैसे मारवाड़ी को जल और ऊंट को वनस्पति प्रिय है वैसे ही मेरे मन को
ईश्वर प्रिय है। जैसे पत्नी को पति प्रिय है वैसे ही ईश्वर मेरे मन को प्रिय है।'४
१. आखंड आयुष्य व्हावें तया कुळा । माझिया सकळा हरिच्या दासा ।१।
छलनेची बाधा न हो कोणे काळी । हे संत मंडळी सुखी असो ।२।
अहंकाराचा वारा न लागो राजसा । माझिया विष्णु दासा भाविकासी ।३।
नामा म्हणे तया असावें कल्याण । ज्या मुखा निधान पांडुरंग ।४।
—सकल संत गाथा, अभंग ८८३ ।
२. मैं बउरो मेरा रामु भरतारु
रचि रचि ताकउ करउ सिंगारु । —संत० ना० की हिं० प०, पद २७४ ।
३. मोहि लागी ताला बेली । बछरे बिनु गाइ अरला ।
पानीया बिनु मीनु तलफै । ऐंगे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद २६ ।
४ मारवाड़ी जेम नीरु वाल्हा, बेलि वाल्हा करहला ।
जिउ तरणी कउ कंतु वाल्हा तिउ मरे मनि रामईआ ॥
—स० ना० की हिं० प०, पद २०२।