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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 332 में से

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पृष्ठ 161

१६६ नामदेव की हिन्दी कविता
केंद्र स्थल में हैं स्वयं भगवान् श्रीहरि विट्ठल । सम्प्रदाय का मुख्य मंत्र है—'राम कृष्ण
हरि ।'
यह सम्प्रदाय चैतन्य सम्प्रदाय के समान युगल उपासना में कृष्ण के साथ राधा
को सम्मिलित नहीं करता बल्कि उसके स्थान में रुक्मिणी को महत्त्व देता है। इसका
सुपरिणाम यह हुआ कि महाराष्ट्र में कृष्ण भक्ति का नितांत समुज्ज्वल तथा उदात्त रूप
दृष्टिगोचर होता है। यहाँ उस विकृत रूप का दर्शन नहीं होता जो उत्तर भारत के
कतिपय प्रांतों में अश्लीलता की कोटि तक पहुँच कर भावुकों के लिए उद्वेग-जनक
होता है ।
इस प्रकार वैष्णव धर्म परम्परा का प्रभाव नामदेव पर पर्याप्त मात्रा में है।
उनके पूर्व जो वैष्णव आचार्य हुए, जिनका विशेष प्रचार उत्तरी भारत में था, नामदेव
पर उनकी विचार-धाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। एक ओर नामदेव
महाराष्ट्रीय वारकरी परम्परा के प्रतिनिधि हैं तो दूसरी ओर उत्तरी भारत की वैष्णव
भक्ति परम्परा के । उनमें दोनों परम्पराओं का अभूतपूर्व समन्वय दिखाई पड़ता है ।
नामदेव की रचनाओं में प्राप्त उनके दार्शनिक विचार
सन्त नामदेव महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वारकरी सम्प्रदाय के अनुयायियों में से थे। इस
कारण वारकरी सम्प्रदाय के दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन उनकी रचनाओं में पाया
जाना स्वाभाविक है । इस सम्प्रदाय के सन्तों में निर्गुण सर्वात्म-स्वरूप अद्वैत ब्रह्म के
प्रति पूरी निष्ठा पाई जाती है किन्तु सगुण मूर्ति के समक्ष वे कीर्तन भी किया करते थे ।
ब्रह्म (ईश्वर दर्शन)
ब्रह्म परम्परा—पारमार्थिक तत्त्व, परम तत्त्व, अन्ततम सत् एवं परम अस्तित्व
को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है ।
उपनिषदों में ब्रह्म की पूर्ण प्रतिष्ठा है । तैत्तिरीयोपनिषद् में—इस सम्पूर्ण
विश्व की उत्पत्ति, गति, पालन और स्थिति तथा इस सम्पूर्ण जगत् के लय के कारण
को ब्रह्म कहा गया है ।१
ब्रह्म ही पूर्ण है, सब कुछ वही है, वह सब प्रकार से पूर्ण है ।२
१. यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, यतो जातानि जीवन्ति ।
यत् प्रयन्ति अभिसं विशन्ति तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म ॥
—तैत्तिरीयोपनिषद् ३ । १ ।
२. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
—ईश. शांतिपाठ